Friday, October 2, 2020
महामानव लाल बहादुर शास्त्री | 2 अक्टूबर जन्म दिवस पर स्मरण | डॉ. वर्षा सिंह
Wednesday, September 30, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 18 | ग्लैमराइज्ड कैकेयी | डॉ. वर्षा सिंह
प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"... मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "ग्लैमराइज्ड कैकेयी" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 30.09.2020
मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-
https://yuvapravartak.com/?p=42287
बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
ग्लैमराइज्ड कैकेयी
- डॉ. वर्षा सिंह
भक्त ध्रुव की कथा में ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद, माता सुनीति और सौतेली माता का नाम सुरुचि का ज़िक्र आता है। कथा का महत्वपूर्ण भाग यह है कि राजा उत्तानपाद एक दिन राज सिंहासन पर बैठे थे। उनकी गोदी में ध्रुव का सौतेला भाई अर्थात् सौतेली माता सुरुचि का पुत्र बैठा था। ध्रुव ने भी राजा की गोदी में बैठने की ज़िद की। रानी सुरुचि ने ध्रुव को रोक दिया और कहा, ‘‘मेरा पुत्र ही राजा की गोद में बैठने का अधिकारी है, क्योंकि वह तुमसे अधिक योग्य है।’’ बालक ध्रुव बड़ा ही स्वाभिमानी था। सौतेली मां की दुत्कार से आहत हो कर बालक ध्रुव ने प्रतिज्ञा की, कि ‘मैं दूसरों के द्वारा दिए गए स्थान को ग्रहण नहीं करूंगा। मैं परिश्रम और तपस्या से अपना स्थान स्वयं बनाऊंगा तथा ऐसा स्थान प्राप्त करूंगा जो किसी और ने आज तक प्राप्त नहीं किया होगा।' ध्रुव की प्रतिज्ञा सुन कर माता सुनीति ने उसे ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का मंत्र दिया। बालक ध्रुव ने इस मंत्र का जाप करते हुए घोर तपस्या की। ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। ध्रुव ने कहा- हे प्रभु! मुझे ऐसा पद दीजिए जो सभी पदों से ऊंचा हो। जो अपना अलग महत्व रखता हो तथा जिस पद पर आज तक कोई विराजमान न हुआ हो। विष्णु ने उसे आकाश में उत्तर दिशा में समस्त तारागणों, नक्षत्रों के बीच सर्वोच्च स्थान दिया। वह ‘ध्रुव तारा’ बन कर अमर हुआ। ध्रुव तारे को सब तारों में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है। ध्रुव का नाम आज भी जितने सम्मानपूर्वक लिया जाता है जबकि उसकी विमाता सुरुचि का नाम लेते हुए घृणा के भाव मन में उत्पन्न हो जाते हैं।
यह तो थी सतयुग के भक्त ध्रुव की कथा, जिसमें सौतेली मां द्वारा अपनी सगी संतान के मोह में सौतेली संतान को अपमानित किया गया था। इसी प्रकार की एक कथा है त्रेतायुग के राजा राम की। रामकथा में राम को चौदह वर्ष का वनवास इसलिए झेलना पड़ा क्योंकि उनकी सौतेली माता कैकेयी ने अपने सगे पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनवाने के उद्देश्य से राम के पिता और कैकेयी के वचनबद्ध राजा दशरथ से वचनपूर्ति में राम का वनवास और भरत का राजतिलक मांग लिया था।
राजा दशरथ की तीन रानियां थीं- कौशल नरेश सुकौशल की पुत्री कौशल्या, कैकय नरेश अश्वपति की पुत्री कैकयी और काशी नरेश की पुत्री सुमित्रा। राजा दशरथ की इन तीन रानियों में से कैकेयी विवाह से पहले महर्षि दुर्वासा की सेवा किया करती थी। कैकेयी की सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा ने कैकेयी का एक हाथ वज्र का बना दिया। कालांतर में कैकेयी का विवाह राजा दशरथ से हो गया। उधर स्वर्ग में देवासुर संग्राम आरंभ हो गया। देवराज इंद्र ने राजा दशरथ को सहायता के लिए बुलाया। युद्ध कौशल में निपुण रानी कैकेयी भी दशरथ की रक्षा के लिए सारथी बनकर देवासुर संग्राम में पहुंच गईं। युद्ध के दौरान अचानक दशरथ के रथ के पहिए से कील निकल गई और रथ लड़खड़ाने लगा। कैकेयी ने कील के स्थान पर अपनी उंगली लगा दी, जिससे राजा दशरथ के प्राण बच गए। राजा दशरथ कैकेयी की वीरता और साहस से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कैकेयी से उसकी कोई दो मनोकामना पूर्ति करने को कहा। लेकिन कैकेयी ने वे दोनों मनोकामनाएं बाद में कभी किसी समय पूर्ति का वचन ले कर उस समय वह प्रकरण टाल दिया। बाद में कौशल्यापुत्र राम के राज्याभिषेक के समय कैकेयी की अंतरंग दासी मंथरा ने जब उन दो वचनों की पूर्ति का स्मरण दिलाते हुए भरत की भावी सुरक्षा के विषय में समझाया तो अपने हित-अहित का विचार किए बिना एक मां के हृदय ने मंथरा का सुझाव मान कर दोनों मनोकामनाएं पूर्ति हेतु दशरथ से कह दिया। कैकेयी ने दशरथ को इस वचन की बात याद दिलाकर कौशल्यापुत्र राम को चौदह वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत का राज्याभिषेक मांग लिया।
दशरथ वचनबद्ध थे। किन्तु राम के प्रति यह घोर अन्याय वे सहन नहीं कर पाए और यह वचनपूर्ति उनके प्राणों के उत्सर्ग का करण बन गई। दशरथ ने वचन तो पूरे कर दिए लेकिन उसके बाद शोकग्रस्त हो कर वे जीवित नहीं रह पाए। आज्ञाकारी, संस्कारी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम पिता की आज्ञा का पालन और माता कैकेयी की इच्छा का सम्मान करते हुए वन गमन कर गए। कैकेयीपुत्र भरत अपने बड़े भाई राम के प्रति अटूट स्नेह और गहरा आदरभाव रखते थे। उन्हें जब यह सब ज्ञात हुआ तो माता कैकेयी के इस कृत्य पर रोष प्रकट करते हुए उन्होंने राज्याभिषेक से मना कर दिया और राम के वनगमन के पश्चात राम की चरणपादुका अयोध्या ला कर उसे सिंहासनारूढ़ करके स्वयं एक सेवक की भांति चौदह वर्ष व्यतीत कर दिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने कैकेयी के जीवन को लांछित कर दिया। दासी मंथरा के सुझाव पर अमल करके पुत्रप्रेम के स्वार्थवश कैकेयी ऐसी दो मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कोपभवन में जा बैठी थी, जिसने उसके जीवन को ही कलंकित कर दिया। दशरथ जैसे स्नेहवान पति को सदैव के लिए खो कर विधवा नारी के रूप में मिला कैकेयी का जीवन, सगे पुत्र भरत से भी तिरस्कृत हुआ। रामायण के नारी पात्रों में कैकेयी का स्मरण घृणा और तिरस्कार के साथ किया जाता है। कोई भी व्यक्ति अपनी पुत्री का नाम कैकेयी रखना उचित नहीं समझता।
आदिकवि वाल्मीकि ने संस्कृत में लिखे गए 'रामायण' महाकाव्य में कैकेयी को एक ऐसी स्त्री के रूप में उल्लेखित किया है जो अपनी अनुचित मांग की पूर्ति कराने हेतु क्रोधाग्नि से तिलमिलाती हुई कोप- भवन में प्रविष्ट हो कर सम्पूर्ण अयोध्या को शोक- संतप्त बना देती है। वाल्मीकि रामायण की परम्परा में लिखे गये काव्यों और नाटकों में कैकेयी को राम-वनवास के लिए दोषी ठहराया गया है। असहिष्णु, कलंकिनी आदि अनेक सम्बोधनों का प्रयोग कर कैकेयी की निन्दा की गयी है।
'रामचरित मानस' में तुलसीदास ने अयोध्याकांड के अंतर्गत कैकेयी के पात्र को अन्त तक एकान्त- नीरव, भयावह एवं ग्लानियुक्त बनाए रखा है। कैकेयी की दैहिक सुंदरता उसके कुकृत्यों के समक्ष गौण हो गई। तुलसीदास ने अयोध्यावासियों के मुँह से उनके लिए 'पापिन' 'कलंकिनी' आदि अनेक सम्बोधनों का प्रयोग कर कैकेयी के कृत्य की भर्त्सना की है, साथ ही भरत की माता कैकेयी के प्रति रुष्टता को इस चौपाई के माध्यम से व्यक्त किया है -
कैकेई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे॥
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।
अर्थात् भरत कहते हैं कि कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करने वाले ये पामर प्राण पूरी तरह से अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं, तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा।
भरत यह भी कहते हैं कि -
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू॥
अर्थात् मेरी माता की कुमति ही पापों का मूल है। उसने हमारे हित का बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठ का कुयंत्र बनाया और चौदह वर्ष की अवधिरूपी कठिन कुमंत्र पढ़कर उस यंत्र को गाड़ दिया।
हालांकि उदात्त चरित्र के स्वामी राम ने कभी माता कैकेयी को गलत नहीं कहा। साथ ही जब भरत ने अपनी माता को कटु वचन कहे तो राम ने उन्हें रोका भी।
हमारे रामकथा सहित अनेक ग्रंथों में उन स्त्रियों को निंदनीय माना गया है और बुरी स्त्रियों के रूप में उल्लेखित किया गया है जो अपनी सगी संतानों से मोह में अपनी सौतेली संतानों के प्रति अन्याय एवं षडयंत्र करती हैं। यह इसलिए कि स्त्रियां इन कथाओं से शिक्षा ग्रहण करें, स्वयं को निंदा का कारण न बनाएं और अपने सौतेली संतानों के प्रति भी दया और ममता का भाव रखें।
किन्तु वर्तमान समय में हमारे टीवी सीरियल्स में सौतेली माताओं के चरित्र को ग्लैमराइज करके षडयंत्रों से लैस, कुटिल चालों की एक्सपर्ट के रूप में महिमामंडित किया जाता है। जिसका स्त्रियों पर ग़लत असर पड़ता है। स्वार्थपरता, निष्ठुरता, मोहांधता के दुर्गुणों से लैस खलनायिका के रूप में प्रस्तुत विमाताओं के चरित्र से प्रभावित हो कर अनेक स्त्रियां "कैकेयी" बनती जा रही हैं।
यदि टीवी सीरियल्स में ऐसी स्त्रियों को ग्लैमराइज नहीं किया जाए और सिर्फ़ एपीसोड की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से उनकी घूर्तताओं को बढ़ा-चढ़ा कर न दिखाया जाए तो वह बेहतर होगा। सीढ़ी पर तेल डालकर परिवारजन को गिराने, गीज़र से बिजली के नंगे तार जोड़ कर घातक दुर्घटना को अंजाम देने सरीखे आसान नुस्खे किसी की भी ज़िन्दगी पर भारी पड़ सकते हैं। इसलिए वास्तविक ज़िन्दगी से कैकेयी के रोल को छोटा करके कौशल्या के रोल को बढ़ाना होगा।
और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी ये काव्य पंक्तियां....
उचित और अनुचित में जिसको भेद न करना आया।
मिले न उसको राम जगत में, मिली न उसको माया।
---------------------
#PostForAwareness #विचारवर्षा
#युवाप्रवर्तक #कैकेयी #राम #रामायण #रामचरितमानस #मनोकामना #दशरथ #ग्लैमर #ध्रुव #सुरुचि #सुनीति #त्रेतायुग #सतयुग #अयोध्या #इक्षवाकु #मंथरा #बाल्मीकि #तुलसीदास
Wednesday, September 23, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 17 | अक्षरों की ब्रम्ह सत्ता | डॉ. वर्षा सिंह
Wednesday, September 16, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 16 | पितृपक्ष, रेणू और उऋण का चिंतन | डॉ. वर्षा सिंह
Friday, September 11, 2020
विचार की धुरी पर कविता | डॉ. वर्षा सिंह
Wednesday, September 9, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 15 | हमारी हिन्दी यात्रा | डॉ. वर्षा सिंह
Wednesday, September 2, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 14 | मन का तिलस्म | डॉ. वर्षा सिंह
प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"... मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "मन का तिलस्म" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 02.09.2020
मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-
https://yuvapravartak.com/?p=40375
बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
मन का तिलस्म
-डॉ. वर्षा सिंह
अभी पिछले दिनों की ही बात है, मेरी एक सहेली ने मुझे मेरे जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने के लिए व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल किया। शुभकामनाएं देने के बाद घर-परिवार की अन्य चर्चाएं होने लगीं। बच्चों की बात चली तो वह बताने लगी कि इस कोरोनाकाल में जबसे ऑनलाईन पढ़ाई हो रही है, बच्चों का पढ़ाई में मन ही नहीं लग रहा है। बाहर जाने की छूट नहीं मिलने के कारण घर के भीतर खेले जा सकने वाले इनडोर गेम्स में भी मन नहीं लग रहा है। फिर और चर्चाएं आगे बढ़ीं तो वह बोली कि कहीं घूमने नहीं जा पाने के कारण ख़ुद उसका और उसके पतिदेव का मन भी कहीं किसी काम में नहीं लगता है।… यानी मन न लगने की समस्या से मेरी उस सहेली का पूरा परिवार ग्रसित हो गया है।
यह मन नहीं लगने की समस्या इन दिनों आम है। जिससे भी बात करें वह गाहे बगाहे यह ज़रूर कह उठता है कि क्या बताऊं, फलां काम में मन ही नहीं लगता। मन… आख़िर यह मन है क्या ? मेरी विचार-श्रृंखला अनजाने ही मन के तिलस्म की गुत्थी को सुलझाने की दिशा में मुड़ गई।
कितने ही हिन्दी फ़िल्मों के गीत अचानक याद ही मुझे याद आने लगे। फ़िल्म "काजल" का मशहूर गीत " तोरा मन दर्पण कहलाए / भले, बुरे, सारे कर्मों को देखे और दिखाए" फिल्म "चित्रलेखा" का गीत "मन रे, तू काहे न धीर धरे" फिल्म "धूपछांह" का गीत "मन की आँखें खोल, बाबा, मन की आँखें खोल" ।
फ़िल्मों में मन पर केंद्रित गीतों की भरमार है। हिन्दी काव्य साहित्य में कवियों द्वारा मन के लगने, न लगने सहित मन की गति पर अनेक पद्य-पंक्तियां रची गई हैं।
रामचरित मानस, विनयपत्रिका, कवितावली, दोहावली आदि के रचयिता तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में मन की अनेक दशाओं का वर्णन किया है -
कहं लौ कहौ कुचाल कृपानिधि, जानत हों गति मन की।
तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की।
तुलसीदास का एक और चर्चित पद है-
मन पछितैहै अवसर बीते ।
दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते ॥
सहसबाहु, दसबदन आदि नप बचे न काल बलीते।हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥
इसी प्रकार मीराबाई ने अपना मन बरसाने में लगने की बात अपने इस पद में की है -
मेरो मन लाग्यो बरसाने में जहां विराजे राधा रानी।मन हट्यो दुनियादारी से जहां मिले खारा पानी।।
संत कबीर ने भी मन लगने की बात कुछ इस तरह से की है -
मन लागो मेरो यार फकीरी में ।
जो सुख पावो राम भजन में, सो सुख नाहीं अमीरी में ॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
साहिब मिले सबुरी में ॥
कबीर ने मन को सर्वोपरि बताते हुए कहा है -
मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत ।
अर्थात् जीवन में जय पराजय केवल मन की भावनाएं हैं।यदि मनुष्य मन में हार गया – निराश हो गया तो पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है। ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकते हैं – यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?
भक्त कवि सूरदास सिर्फ़ एक मन से संतुष्ट नहीं हैं, वे और अधिक मन, यथा- दस-बीस मन चाहते हैं। उद्धव और गोपियों के संवाद का सुंदर चित्रण करते हुए वे कहते हैं -
ऊधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥
तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥
अर्थात् इस संवाद में गोपियां उद्धव से कहती हैं कि उनके पास तो एक ही मन है, जो कृष्ण के विचारों में डूबा है, कृष्ण को समर्पित है। अतः दूसरी ओर ध्यान भी नहीं जा सकता, पुनः निर्गुण ब्रह्म की उपासना कैसे हो ! यदि दस-बीस मन रहता, तो अन्य विषयों का भी ध्यान आता।
मन का अपना समूचा विज्ञान है यानी मनोविज्ञान। मनोविज्ञान को अंग्रेजी भाषा में सायकॉलजी कहते है। इस शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के साइकी तथा लोगस शब्दों से हुई है । साइकी का अर्थ है आत्मा यानी सोल और लोगस का अर्थ है अध्ययन या विचार –विमर्श । इस प्रकार 16 वीं शताब्दी में ग्रीस नामक देश में दार्शनिकों ने इसके शाब्दिक अर्थ के अनुसार इसे ‘आत्मा का अध्ययन करने वाला विज्ञान' माना । और इसी शाब्दिक अर्थ के कारण मनोविज्ञान को ‘आत्मा का ज्ञान’ के रूप में परिभाषित किया जाने लगा। जी हां, मन शब्द का प्रयोग कई अर्थों में किया जाता है, जैसे- आत्मा, चित्त, मनोभाव, मानस, मत इत्यादि और यदि मनोविज्ञान के नज़रिए से देखा जाए तो मन का तात्पर्य आत्मन्, स्व या व्यक्तित्व से है। यह एक अमूर्त सम्प्रत्यय है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। हवा की तरह इसे न तो हम देख सकते हैं और न ही हम इसका स्पर्श कर सकते हैं । दूसरे शब्दों में मस्तिष्क के विभिन्न अंगों की प्रक्रिया का नाम मन है।
प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रायड के अनुसार ‘मन से तात्पर्य व्यक्तित्व के उन कारकों से होता है जिसे हम अन्तरात्मा कहते हैं तथा जो हमारे व्यक्तित्व में संगठन पैदा करके हमारे व्यवहारों को वातावरण के साथ समायोजन करने में मदद करता है।'
एक अन्य मनोवैज्ञानिक रेबर के अनुसार- ‘‘मन का तात्पर्य परिकल्पिक मानसिक प्रक्रियाओं एवं क्रियाओं की सम्पूर्णता से है, जो मनोवैज्ञानिक प्रदत्त व्याख्यात्मक साधनों के रूप में काम कर सकती है।
अत: मन की मात्र कल्पना कर सकते हैं। इसको न तो देखा जा सकता है और न ही इसका स्पर्श किया जा सकता है। मन, किसी चीज का वह व्यक्तिगत, आत्मपरक अनुभव है जो प्रतिपल परिवर्तित होता रहता है। मन की संकल्पना जटिल है और यह विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग है। बौद्ध मत में मन के लिए संस्कृत के चित्त शब्द का उपयोग होता है और इसका अर्थ अत्यंत व्यापक है। इसमें संज्ञान, धारणा, अनुभव, मूर्त एवं अमूर्त विचार, भावनाएं, सुख-दुःख की अनुभूति, ध्यान, एकाग्रता और बुद्धि इत्यादि अर्थ समाविष्ट है। जब बौद्ध मत मन का उल्लेख करता है तो इसमें सभी प्रकार की मानसिक गतिविधियां निर्दिष्ट हैं।
बचपन में मैंने एक कहानी पढ़ी थी - एक बार की बात है। बहुत से मेंढक जंगल से जा रहे थे। उन सभी का मन आपसी बातचीत में रमा हुआ था। तभी रास्ते में एक बड़ा सा गड्ढा मिला, जिसे नहीं देख पाने के कारण उनमें से दो मेंढक उस गड्ढे में गिर पड़े। गड्ढा बहुत गहरा था।
साथी मेंढकों ने गड्ढे में गिरे उन दो मेंढकों को आवाज लगाकर कहा कि इतने गहरे गड्ढे से बाहर निकल पाना असंभव है। इसलिए अब तुम स्वयं को मरा हुआ मान लो। लेकिन गड्ढे में गिरे हुए वे दोनों मेंढक अपने उन साथियों की बात को अनसुना करके बाहर निकलने के लिए और ज़ोर से उछल-कूद करने लगे। थोड़ी देर तक उछल-कूद करने के बाद भी जब गड्ढे से बाहर नहीं निकल पाए तो एक मेंढक ने बाहर निकलने की आशा छोड़ दी और वह गड्ढे में और नीचे की तरफ लुढ़क गया। नीचे लुढ़कते ही वह मर गया।
लेकिन दूसरे मेंढक ने कोशिश जारी रखी और अंततः पूरा जोर लगाकर एक छलांग लगाने के बाद वह गड्ढे से बाहर आ गया। जैसे ही दूसरा मेंढक गड्ढे से बाहर आया तो बाकी मेंढक साथियों ने उससे पूछा - जब हम तुम लोगों से कह रहे थे कि गड्ढे से बाहर आना संभव नहीं है तो भी तुम छलांग क्यों मारते रहे ? तब उस मेंढक ने जवाब दिया- दरअसल मैं सुनता सबकी हूं, लेकिन करता अपने मन की हूं और इसीलिए जब मैं छलांग लगा रहा था तो आप लोगों की आवाज़ों को मैंने अपने मन में इस तरह से महसूस किया मानों आप सभी मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं और बाहर आ जाओ कह रहे हैं। इसलिए मैंने कोशिश जारी रखी और इसीलिए मैं बाहर आ सका। मेरा सिद्धांत है कि सुनो सबकी, करो मन की।
मन की आवाज़ तभी हम सुन पाते हैं जब मन को कहीं केन्द्रित करते हैं यानी किसी कार्य विशेष में मन लगाते हैं।
ऐसी ही एक और कहानी मुझे याद आ रही है - एक जंगल में एक कौवा रहता था। वह अक्सर अन्य पक्षियों के रंगबिरंगे पंखों को देखकर अपने काले रंग के प्रति बहुत उदास हो जाता था।
एक दिन कुछ यूं हुआ कि जिस पेड़ पर कौवा बैठा था उसी पेड़ पर बगुला भी आ बैठा। कौए को चुपचाप देख बगुले ने कौए से उसकी उदासी का कारण पूछ लिया तब कौवे ने कहा- मैं जितना काला हूं, तुम उतने ही गोरे हो। मेरे इस काले रंग के कारण मुझे कोई पसन्द नहीं करता। मेरा जीवन व्यर्थ है।
बगुले यह सुन कर कहा- अरे, मैं तो ख़ुद अपने गोरेपन से असंतुष्ट हूं। मुझसे ज़्यादा सुंदर तो तोता है उसके पंख हरे-हरे हैं, उसके चोंच लाल है। काश, मैं भी तोते की तरह रंगबिरंगा होता।
कौए ने ही मन में सोचा कि बगुला कह तो सही रहा है। इससे तो ज़्यादा सुंदर तोता होता है। एक दिन कौए को रास्ते में तोता मिल गया। तब कौए ने तोते से कहा कि मैं एकदम काला हूं लेकिन तुम रंगबिरंगे बहुत सुंदर हो । कौए की बात सुन कर तोता ने कौवे से कहा- इस दुनिया में सबसे सुंदर पक्षी तो मोर है। उसके पंख कितने रंग बिरंगे और चटकीले होते हैं । उसे देख कर मैं सोचता हूं कि काश, मैं भी मोर होता। तोते की बात सुन कर कौए ने मोर से मिलने की ठानी। वह जंगल में मोर को ढूंढने लगा लेकिन पूरे जंगल में उसे कहीं भी मोर दिखाई नहीं दिया। तब किसी ने कौए को बताया कि तुम्हें यदि मोर से मिलना है तो शहर जाओ। वहां चिड़ियाघर के अंदर तुम्हें मोर मिल जाएगा। मनुष्यों ने आजकल मोर को चिड़ियाघर में रखा है।
यह बात सुन कर कौवा मोर से मिलने जंगल से उड़कर शहर के चिड़ियाघर में जा पहुंचा। वहां उसने देखा कि मोर एक पिंजरे में बंद है। कौए ने मोर से कहा कि - मोर भाई तुम कितनी सुंदर हो, तुम्हारे हरे-नीले पंख कितने चटकीले हैं। मैं मन ही मन बहुत दुखी रहता हूं। सोचता हूं कि काश, मैं भी मोर होता तो कितना अच्छा होता।
कौए की बात सुनकर मोर की आंखों से आंसू आ गए। वह बोला- हां, मैं सुंदर हूं लेकिन तुम्हारी तरह आज़ाद नहीं। मैं आसमान में उड़ नहीं सकता। पिंजड़े में बंद रहता हूं । तुम आज़ाद हो। अपने मन को समझाओ और अपने रंग से संतुष्ट रहो।
तो मित्रों, मन नहीं लगता कहने से काम नहीं चलने वाला है। यदि ख़ुश और संतुष्ट रहना चाहते हैं तो मन लगाईए। क्योंकि कहते हैं न…. मन के हारे हार है मन के जीते जीत। सारा योरोप यूनान की फौजों से संत्रस्त था। अजेय समझी जाने वाली यूनानियों की धाक उन दिनों सब देशों पर छाई हुई थी और जिस पर भी आक्रमण होता वह हिम्मत हारकर बैठ जाता और अपनी पराजय स्वीकार कर लेता।
रोम के सेनापति सीजर ने देखा कि इस व्यापक पराजय का कारण लोगों में मानसिक दुर्बलता, आत्महीनता ही है, जिसके कारण उन सभी ने स्वयं को दुर्बल और यूनानियों को बलवान स्वीकार कर लिया है। इस मनःस्थिति को बदला जाना चाहिए। अतः सीजर ने यह संदेश प्रसारित करवाया कि यूनानी फौजें तभी तक अजेय हैं, जब तक हम उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं। यदि अपने मन में सोच लो कि हम अजेय हैं तो कोई हमें हरा नहीं सकता। सीजर के संदेश का रोम की जनता पर जादू जैसा असर हुआ और अजेय समझा जाने वाले यूनान को रोम ने परास्त कर दिया।
मन का तिलस्म मन पर नियंत्रण रख कर ही बूझा जा सकता है। मन को लगाईए, मन को समझाईए, ताकि आप साबित कर सकें कि आप का मन आपकी कमज़ोरी नहीं, आपकी ताक़त है।
और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी काव्यपंक्तियां ….
मन तिलस्म है, जब तक उसको बूझा ना जाए।
सब सम्भव है यदि मन मुश्किल से ना घबराए।
-----------------
सागर, मध्यप्रदेश
#PostForAwareness #विचारवर्षा
#युवाप्रवर्तक #मन #फ्रायड #रेबर #तिलस्म #मनोविज्ञान #कोरोना #कोरोनाकाल #मेंढक #कौआ

