Wednesday, December 9, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 28 | विश्वास, रामसेतु और नलनील | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए " विश्वास, रामसेतु और नल-नील" ...अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
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दिनांक 09.12.2020

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

विश्वास, रामसेतु और नल-नील

            -डॉ. वर्षा सिंह

    पिछले वर्ष का एक वाकया याद आ रहा है। लगभग इन्हीं दिनों यानी दिसम्बर की घटना है। घर के बरामदे वाली बाहरी बैठक की दीवारें बारिश में उखड़ी-पुखड़ी सी हो चली थीं। मैंने एक ठेकेदार से बात कर दीवारों पर पुट्टी लगा कर पुताई करने का काम चालू करवा दिया। मुश्किल से दो दिन काम करने के बाद जब तीसरे-चौथे दिन कोई वर्कर नहीं आया तो मैंने फोन पर ठेकेदार से बात की। उसने कहीं और किसी के भवन निर्माण का बड़ा काम हाथ में लेने का ज़िक्र करते हुए मुझे एकाध सप्ताह रुकने का कह दिया। बड़ी झुंझलाहट सी हुई। इस तरह अधूरा काम बीच में छोड़ना था तो ठेका लिया ही क्यों? और बरामदे की पुताई पुट्टी का काम कोई इतना छोटा काम भी नहीं है कि उसे छोटा काम कह कर टाल दिया जाए। आख़िर यह काम भी कोई मुफ्त में तो कराया नहीं जा रहा था इसके भी पूरे पैसे किश्तों में नक़द रक़म देने के लिए तय हुए थे। क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा था। घर के बरामदे में, वह भी सामने वाली बैठक में जिस तरह आधा-अधूरा काम पड़े रहने से दीवारें और भी अधिक बदरंग दिखाई देने लगी थीं, मन में यही धुकपुक लगी रहती कि कहीं कोई मेहमान न आ जाए। वरना इस कदर बुरी हालत वाली घर के सामने की बाहरी बैठक को देखकर वे अपने मन में क्या सोचेंगे! माना कि घर का ड्राइंग रूम सुसज्जित था, फिर भी बरामदे की बाहरी बैठक का भी काफी चुस्त-दुरुस्त होना बेहद जरूरी था। घर की बाहरी बैठक का इम्प्रेशन भी मायने रखता है।
     मैं इसी उधेड़बुन में थी कि क्या करूं! अभी ठेकेदार ने एक सप्ताह तक रुकने की बात कही है, किंतु अब मुझे उसकी बात पर विश्वास नहीं रहा था। क्या पता यह एक सप्ताह एक माह दो माह या 6 माह में बदल जाए, आखिर इस तरह रंगरोगन, पुट्टी आदि कब तक यहां बरामदे में बिखरी पड़ी रहेगी और बदरंग दीवारें कब तक मुझे मुंह चढ़ाती रहेंगी। तभी अचानक मेरी एक महिला मित्र का फोन आया उसने पूछा -'वर्षा क्या हो रहा है, कैसी हो?' उसके द्वारा इतना पूछते ही मैं अपना दुखड़ा ले बैठी।पूरी बात 'ए टू जेड' मैंने उसे सुनाई। मेरी बात सुनकर मेरी मित्र ने कहा कि-'यह कोई नई बात नहीं है। अक्सर कुछ ठेकेदार इसी तरह की मनोवृति के होते हैं और अक्सर इस तरह चीटिंग करते हैं। पहले बहुत दिलचस्पी दिखा कर काम स्वीकार करते हैं और फिर बाद में कहीं ज़्यादा बड़े काम का ठेका मिल जाने पर, पहले स्वीकारे गए काम को छोटा काम बता कर इसी तरह टालमटोल करते हुए हफ्तों महीनों में पूरा करते हैं।' मैंने अपनी सहेली से पूछा कि- 'अब बताओ मैं क्या करूं ? मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा है। पता नहीं किस ख़राब मुहूर्त में मैंने इस काम की शुरुआत की। पता नहीं कहां से मेरे दिमाग में यह बात आई कि मैं उस चीटर ठेकेदार से बात करूं और उसे पुट्टी-पुताई का ठेका दूं।'
     मेरी सहेली ने मुझे ढाढस बंधाते हुए कहा कि -'वर्षा, चिंता मत करो।मैं एक व्यक्ति को जानती हूं वह और उसका एक साथी दोनों मिलकर तीन-चार दिन में पुट्टी और रंग रोगन का काम पूरा कर देंगे।'
 मैंने पूछा -'कौन है?'  तब उसने बताया कि वैसे तो उन लोगों का काम मालीगिरी का है। वे उसके घर पर लॉन और गमलों में लगे पौधों की देखरेख करने महीने में एकाध बार आते हैं, लेकिन उन्हें पुट्टी और रंगरोगन करने का भी अच्छा ज्ञान है।
    मरता क्या न करता … ज्यादा सोच विचार नहीं करते हुए मैंने अपनी उस मित्र से हां कह दी और उसने दूसरे ही दिन उन व्यक्तियों को मेरे घर भिजवा दिया।
    आते ही वे दोनों व्यक्ति काम में लग गए। फटाफट पुट्टी का काम उन्होंने शुरू कर दिया। रंग रोगन का भी काम साथ-साथ चालू कर दिया। मुश्किल से 4 दिन में पूरा का पूरा काम कंप्लीट हो गया। उन्होंने पारिश्रमिक के रूप में वैसे भी बहुत नॉमिनल राशि ही ली। कहां तो ठेकेदार हजारों की बात कर रहा था और कहां इन दोनों ने मात्र ₹1200 में पूरा काम निपटा दिया। मैं उनके प्रति बहुत शुक्रगुज़ार थी। उन्होंने संकट में आकर जिस तरह से बड़े अच्छे ढंग से पूरा काम निपटाया था वह क़ाबिले तारीफ़ था। उनका काम ठेकेदार के आदमियों से किसी भी मायने में उन्नीस नहीं बल्कि बीस ही था। बाद में जिसने भी देखा तो उसने बहुत अच्छी चिकनी पुट्टी और उस पर की गई पुताई की तारीफ़ ही की। 
   अब सोचती हूं तो लगता है कि बात विश्वास की होती है, भरोसे की होती है। यदि हम किसी पर भरोसा करते हैं और वह उस भरोसे पर खरा नहीं उतरता तो बहुत दुख पहुंचता है। भरोसा तोड़ने वाले व्यक्ति हमेशा के लिए हमारी नज़रों से गिर जाते हैं। और विश्वास निभाने वाले, भरोसा सलामत रखने वाले व्यक्ति हमेशा अपनी अच्छाई के कारण याद आते हैं। व्यक्ति कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। बड़ा ठेकेदार धोखा दे जाता है, जबकि छोटे काम करने वाले व्यक्ति छोटे काम को बड़ा काम मानते हुए बड़ी लगन के साथ करते हैं । मुझे स्मरण आ रहा है रामचरितमानस की इन पंक्तियों का -
बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर॥
बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई॥
अर्थात् चतुर नल और नील ने सेतु बाँधा। राम की कृपा से उनका यह उज्ज्वल यश सर्वत्र फैल गया। जो पत्थर आप डूबते हैं और दूसरों को डुबा देते हैं, वे ही जहाज के समान स्वयं तैरने वाले और दूसरों को पार ले जाने वाले हो गए।

   रामकथा का एक प्रमुख प्रसंग है लंका तक पहुंचने के लिए राम की वानर सेना द्वारा समुद्र पर सेतु का निर्माण करना। इस कार्य को दो वानर योद्धाओं नल और नील की मार्ग निर्देशन में पूरा किया गया था।
    दरअसल सीता को लंकापति रावण द्वारा अपहृत कर लिए जाने और सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराने हेतु राम ने समुद्र पार कर लंका जाने का निश्चय किया। राम ने सागर पार जाने का साधन न होने पर चिंता व्यक्त करते हुए अपने सभी साथियों को सभा में एकत्रित किया। जिसमें उन्होंने लंकापति रावण के भाई विभिषण जो अब तक उनकी शरण में आ चुके थे, को उनकी वानर सेना को मायावी शक्तियां सिखाने का अनुग्रह किया। ताकि वानर सेना उन शक्तियों की मदद से आकाश मार्ग द्वारा लंका पहुंच सके। किन्तु इस पर राम को उत्तर देते हुए विभिषण ने कहा कि, “हे प्रभु आसुरी माया राक्षसों के लिए तो सुलभ है, परंतु वानर तथा मानव इन्हें सरलता से प्राप्त नहीं कर सकते।” विभिषण की यह बात सुनकर राम ने उसे कोई अन्य उपाय सुझाने को कहा, ताकि वे यथाशीघ्र  लंका पहुंच सकें और सीता को रावण के चंगुल से छुड़ा सकें।
      विभिषण ने राम को सुझाव दिया कि राम स्वयं समुद्र देवता वरुण देव से रास्ता मांगें तो कार्य सुगम हो जाएगा। साथ ही उन्हें यह भी बताया कि इस समुद्र अर्थात् सागर का निर्माण राम के ही पूर्वज एवं इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर ने ही किया था। चूंकि लक्ष्मण स्वभाव से थोड़ा उग्र थे, इसलिए विभिषण द्वारा दी गई यह सलाह उन्हें पसंद नहीं आई और उन्होंने इसका विरोध करते हुए राम को अपने बाण से संपूर्ण सागर को सूखा देने के लिए कहा।
     मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने यह सुझाव नहीं मानते हुए अपने भ्राता लक्ष्मण को समझाया और कुशा के आसन पर बैठकर अन्न जल त्यागकर समुद्र देवता वरुण की आराधना प्रारंभ कर दी। तीन दिन व्यतीत हो गए किन्तु तक जब समुद्र देवता वरुण उनके समक्ष जब प्रकट नहीं हुए तो राम के धैर्य का बांध टूट गया और उन्होंने लक्ष्मण द्वारा दिए गए सुझाव को स्वीकार करते हुए धनुष पर ब्रह्मास्त्र साध लिया। राम का यह क्रोधित रूप देखकर समुद्र देवता अत्यंत भयभीत हो गए और राम के समक्ष प्रकट हो कर उनसे क्षमा याचना करने लगे। शरणागत वत्सल राम ने उसी क्षण समुद्र देवता को क्षमा कर दिया और सागर पार करने में समुद्र देवता वरुण की सहायता मांगी।
    तब वरुण ने ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता बताई। और बताया कि वानर सेना में ही नल और नील नामक दो वानर इस सागर को पार करवाने में सबसे बड़े सहायक बन सकते हैं। समुद्र देवता वरुण ने राम को बताया कि नल और नील विश्वकर्मा के पुत्र हैं, जिनके द्वारा फेंके हुए पत्थरों से सेतु का निर्माण किया जा सकता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार नल और नील को ये श्राप है कि उनके द्वारा फेंके गई कोई भी वस्तु जल में डूबेगी नहीं। नल और नील जब छोटे थे तो बालपन की शरारतों के चलते ऋषि-मुनियों को बहुत परेशान किया करते थे और अक्सर उनकी चीजों को उठा कर समुद्र में फेंक देते थे। इन दोनों बच्चों से परेशान ऋषि-मुनियों ने तंग आकर इन्हें श्राप दिया था कि जो भी चीज यह पानी में फेकेंगे वह डूबेगी नहीं। साथ ही यह भी श्राप दिया कि वे अपने इस श्राप के बारे में स्वयं किसी से कुछ भी कह नहीं पाएंगे।
यह सुन कर राम ने सेतु निर्माण के लिए रामेश्वरम में मिट्टी का शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की और नल तथा नील वानरों से सेतु निर्माण हेतु अनुरोध किया। 

तुलसीदास रचित रामचरित मानस के सुंदरकांड में सेतु निर्माण का वर्णन है जिसमें नल और नील दोनों का उल्लेख है -
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥

अर्थात् समुद्र ने राम से कहा कि हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएँगे।

सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ।।
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु॥
अर्थात् समुद्र के वचन सुनकर प्रभु श्री रामजी ने मंत्रियों को बुलाकर ऐसा कहा- अब विलंब किसलिए हो रहा है? सेतु तैयार करो, जिसमें सेना उतरे।

जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई॥
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं।।
अर्थात् जाम्बवंत ने नल-नील दोनों भाइयों को बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनाई और कहा- मन में राम के प्रताप को स्मरण करके सेतु तैयार करो, रामप्रताप से कुछ भी परिश्रम नहीं होगा।

धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा॥
सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा॥
अर्थात् विकट वानरों के समूह दौड़ जाइए और वृक्षों तथा पर्वतों के समूहों को उखाड़ लाइए। यह सुनकर वानर और भालू हूह की हुँकार करके और रघुवीर के प्रताप समूह की जय पुकारते हुए चले।

अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ।
आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ।।
   अर्थात् बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वतों और वृक्षों को खेल की तरह ही उखाड़कर उठा लेते हैं और ला-लाकर नल-नील को देते हैं। वे अच्छी तरह गढ़कर सुंदर सेतु बनाते हैं।

सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं॥
देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥
अर्थात् वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते  और नल-नील उन्हें गेंद की तरह ले लेते। सेतु की अत्यंत सुंदर रचना देखकर कृपासिन्धु राम हँसकर वचन बोले-।

परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी॥
करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना॥
अर्थात् यह भूमि परम रमणीय और उत्तम है। इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। मैं यहाँ शिव शंभु की स्थापना करूँगा। मेरे हृदय में यह महान्‌ संकल्प है।

वाल्मीक रामायण में यह उल्लेख मिलता है कि सेतु लगभग पांच दिनों में बन गया जिसकी लम्बाई सौ योजन और चौड़ाई दस योजन थी। रामायण में इस पुल को ‘नल सेतु’ की संज्ञा दी गई है। नल के निरीक्षण में वानरों ने बहुत प्रयत्न पूर्वक इस सेतु का निर्माण किया था।

राम को समुद्र देवता वरुण देव पर विश्वास था कि वे उन्हें समुद्र पार कर लंका जाने में सहायता करेंगे। किन्तु समुद्र देवता वरुण द्वारा असमर्थता प्रकट करने पर राम के सहायक बने नल और नील वानर, जिन्होंने रामेश्वरम से लंका तक रामसेतु निर्माण कर सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराने में अपनी अहम भूमिका निभाई। रामसेतु छोटे वानरों द्वारा किए गए एक बहुत बड़े काम का प्रत्यक्ष प्रमाण है। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता और न ही उसे करने वाले छोटे या बड़े होते हैं। सबसे बड़ा होता है विश्वास या भरोसा। विश्वास है तो कोई कार्य दुष्कर नहीं। 

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी काव्यपंक्तियां -

मिल कर लिखें चलो हम, विश्वास की ग़ज़ल 
कोई कहीं न गाए, संत्रास की ग़ज़ल 

है आज वेदना की सत्ता तो क्या हुआ !
होगी धरा के लब पर उल्लास की ग़ज़ल

'वर्षा' की ये दुआ है छल-छद्म ना रहे
गूंजे हरेक दिल में मधुमास की ग़ज़ल

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Wednesday, December 2, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 27 | मिथक, महिलाएं और त्रिजटा | डॉ. वर्षा सिंह

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दिनांक 02.12.2020

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

      मिथक, महिलाएं और त्रिजटा

              -     डॉ. वर्षा सिंह

     पिछले दिनों देखी एक शार्ट फिल्म का सार यही था कि फिल्म की नायिका की अंतरंग सखी ही उसे धोखा दे देती है। इसी प्रकार एक टीवी सीरियल में यह दिखाया गया था कि सीरियल की नायिका उसके आसपास की महिलाओं द्वारा रचे गए षड्यंत्र के कारण अपमानित हो कर घर छोड़ने को विवश हो जाती है। एक और टीवी सीरियल में घर के पुरुषों की दृष्टि में महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए महिलाओं के द्वारा ही आपस में तरह-तरह के षड्यंत्र किया जाना दिखाया गया था। अक्सर यह कहा-सुना जाता है कि "स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है।" विशेष रूप से सास-बहू, ननद-भाभी, जेठानी-देवरानी, सखी-सहेलियों के आपसी व्यवहार के उदाहरण देकर भिन्न-भिन्न वाकिए सुनाए जाते हैं। मुझे लगता है कि दरअसल बचपन से ही हमारे दिलों दिमाग में इस प्रकार की बातें भर दी जाती हैं, ऐसी कथा कहानियां सुनाई जाती हैं कि हम स्त्रियों के आपसी व्यवहार को हमेशा शक की नजरों से ही देखते हैं। यदि कभी महिलाओं में आपसी प्रेमभाव नजर आता है तो उसे हम आश्चर्य के तौर पर लेते हुए स्थान- स्थान पर उसका उदाहरण पेश करते हैं, जबकि अनेक प्रकरणों में भाई -भाई, चाचा -भतीजा साले- जीजा इत्यादि के आपसी संबंध बुरे होने पर भी "पुरुष ही पुरुष का दुश्मन होता है" जैसी किसी प्रकार की कोई कहावत नहीं बनाई गई है। पुरुषों के आपसी संबंध कैसे भी क्यों न हों किसी मिथक धारणाओं का आधार नहीं बनते हैं। सम्भवतः यह पुरुष सत्तात्मक सोच का ही दुश्परिणाम है। हमारे टीवी सीरियल्स, चैनलों और ओटीटी प्लेटफार्म के ज़रिए परोसे जाने वाले शोज़ आदि भी महिला को महिला का मददगार दिखाने में कोताही बरतते हैं। महिला को महिला का दुश्मन बताने वाले मिथक को बल देने वाली अनेक कथाएं गढ़ी जाती हैं। ऐसी बहुत कम कथाएं रची जाती हैं जिनमें एक महिला किसी दूसरी महिला के प्रति निःस्वार्थ भावना से सहायक सिद्ध हो। 
  यह सर्वविदित है कि महिलाओं में ममता, करुणा का भाव पुरुषों की अपेक्षा कहीं ज़्यादा ही रहता है। तो प्रश्न यह उठता है कि क्या महिलाएं, महिलाओं के प्रति बैर भावना रखती हैं और क्या वे अपना ममत्व, अपनी करुणा सिर्फ़ पुरुषों पर ही लुटाती है ? हरगिज़ नहीं। यदि किसी मिथकीय धारणा से ग्रसित हुए बिना इस बात की पड़ताल करें तो हमें महिलाओं द्वारा महिलाओं की निःस्वार्थ भावना से की गई सहायता के भी अनेक उदाहरण मिल जाएंगे।
   अभी पिछले दिनों ही यह समाचार अनेक समाचार माध्यमों में प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया था कि मुंबई की महिला वकील मृणालिनी देशमुख ने यौन उत्पीड़न और हिंसा पीड़ितों को नि:शुल्क कानूनी सहायता मुहैया कराने का बीड़ा उठाया है। वहीं भारत में चल रहे 'मीटू' अभियान के अंतर्गत स्वरा भास्कर और मलाइका अरोड़ा जैसी बॉलीवुड हस्तियां अपने अनुभवों को साझा करने वाली महिलाओं के समर्थन में आगे आई हैं। 
    3 वर्ष पूर्व की एक घटना मुझे याद आ रही है, जिसमें एक पाकिस्तानी महिला नागरिक हिजाब आसिफ ने भारत में इलाज कराने के लिए एक पाकिस्तानी सिटीजन के एप्लिकेशन पर महिलाओं के हितरक्षण में अग्रणी तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट कर मदद मांगी थी। पाकिस्तानी शख्स भारत आना चाहता है, लेकिन उसे मेडिकल वीजा नहीं मिल पा रहा है। सुषमा ने हिजाब को निराश नहीं किया और उन्होंने इस्लामाबाद में इंडियन हाई कमीशन को पाकिस्तानी सिटीजन को भारत का वीजा देने का निर्देश दिया है। सुषमा स्वराज के इस बर्ताव की तारीफ में हिजाब ने एक अन्य ट्वीट भी किया। जिसमें उसने लिखा था, "आपको मैं क्या कहूं? सुपरवुमन? या भगवान? आपकी उदारता का बखान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। लव यू मैम, मेरी आंखों में आंसू हैं, आपकी तारीफ से खुद को रोक नहीं सकती।"
     हरियाणा के फतेहाबाद ज़िले के ग्राम समैन के युवक टीनू जांगड़ा ने 2016 फेसबुक पर प्यार के बाद कजाकिस्तान की युवती झाना के साथ शादी की थी। बाद में झाना अपने ससुराल भी आ गई। लेकिन उसके बाद वीजा अवधि न बढ़ने के कारण वह वापस चली गई। इस दौरान टीनू ने तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट किया कि विदेशी बहू अपने देश में आना चाहती है। लेकिन वीजा अवधि न होने के कारण परेशानी आ रही है। जिसके बाद सुषमा स्वराज ने संज्ञान लिया और विदेशी बहू को उसके ससुराल वापस लेकर आई। 
    पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी सहित आई.पी.एस. किरण बेदी, अधिवक्ता मीनाक्षी लेखी, अभिनेत्री शबाना आज़मी, सांसद प्रिया दत्त जैसे शीर्ष नामों के अलावा ऐसी बहुत सी महिलाओं के नाम मिल जाएंगे जिन्होंने स्वयं महिला होते हुए महिलाओं के हितों की सुरक्षा के लिए उल्लेखनीय कार्य किए हैं। ज़रूरत है ऐसे कार्यों, ऐसे चरित्रों, ऐसी घटनाओं को मीडिया माध्यमों के ज़रिए उजागर करने, बार-बार सामने लाने की जिनसे आमजन भी "महिला ही महिला की दुश्मन होती है" वाले मिथकजाल से बाहर आ कर यह वाक्य कण्ठस्थ कर ले कि "महिला किसी महिला की दुश्मन कभी नहीं होती।"
    मेरे घर की ही बात लीजिए, मेरी छोटी बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह महिलाओं की निःस्वार्थ भावना से सेवा करने में सदैव अग्रणी रहती हैं। मध्यप्रदेश के सागर ज़िले की बेड़िया जाति की पीड़ित-शोषित महिलाओं, महिला बीड़ी श्रमिकों के हितरक्षण हेतु मैंने शरद को सदैव संघर्षरत देखा है। शरद की इस संघर्षशीलता का दिग्दर्शन शरद की क़िताबों - "पिछले पन्ने की औरतें" और "पत्तों में क़ैद औरतें" में आसानी से मिलता है। स्वयं की स्थायी शासकीय सेवा को तिलांजलि दे कर परिवार, समाज सहित ग़ैर स्त्रियों के हितों के प्रति चिन्तनशील रहना शरद की ख़ूबी है और इस बात का प्रमाण भी कि महिलाएं महिलाओं की दुश्मन नहीं बल्कि अच्छी मित्र होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं से शरद लगातार संपर्क करती रहती हैं। पहले स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों की यात्राओं द्वारा, और अब कोरोना काल में घर से फोन के माध्यम से शरद ग्रामीण महिलाओं के समस्याओं के निदान हेतु कौंसलिंग करती हैं। शरद का एकमात्र उद्देश्य उन महिलाओं की मदद करना रहता है जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हैं और जो जागरूक तो हैं लेकिन अपने हितार्थ क़दम उठाने में हिचकती हैं। शरद यह बख़ूबी समझती हैं कि एक स्त्री किसी दूसरी स्त्री की हृदय की बात को, उसकी भावनाओं को, उसकी पीड़ा को जितनी गहराई से समझ सकती है उतना कोई पुरुष नहीं समझ सकता। स्त्री की स्त्री के प्रति मित्रता को किसी शक के दायरे में नहीं लाना चाहिए और इस मिथक से बाहर आ जाना चाहिए कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है।
     हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी स्त्रियों के स्त्रियों के प्रति उदारता, सहिष्णुता के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। राम कथा को ही लीजिए, त्रिजटा के नाम से भला कौन परिचित नहीं होगा! रामचरितमानस के सुंदरकांड में त्रिजटा का वर्णन करते हुए तुलसीदास लिखते हैं -
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। 
राम चरन रति निपुन बिबेका॥ 
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। 
सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
  अर्थात् उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। उसकी राम के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक अर्थात् ज्ञान में निपुण थी। उसने सबों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा- सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो।

सपनें बानर लंका जारी। 
जातुधान सेना सब मारी॥ 
खर आरूढ़ नगन दससीसा। 
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
 अर्थात् स्वप्न में मैंने देखा है कि एक बंदर ने लंका जला दी। राक्षसों की सारी सेना मार डाली गई। रावण नग्नावस्था में है और एक गदहे पर सवार है। उसके सिर मुंडे हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं।

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥
अर्थात् इसके बाद वे सब जहाँ-तहाँ चली गईं। सीताजी मन में सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जाने पर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा॥

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
अर्थात् सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं- हे माता! आप मेरी विपत्ति की संगिनी हो। इस प्रकार दुखी सीता को त्रिजटा ने ढाढस बंधाया था और मातृवत् व्यवहार किया था। इसीलिये सीता त्रिजटा को माता का संबोधन देने लगीं थीं।
सीता ने त्रिजटा को माता का संबोधन दे कर प्रार्थना की थी कि - 
तजौं देह करु बेगि उपाई। 
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥
     अर्थात् जल्दी कोई ऐसा उपाय करिए कि जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्म हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता।।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥
अर्थात् काठ लाकर चिता बनाकर सजा दें। हे माता! फिर उसमें आग लगा दें। हे सयानी! आप मेरी प्रीति को सत्य कर दें। रावण की शूल के समान दुःख देने वाली वाणी कानों से कौन सुने?

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। 
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। 
अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
अर्थात् सीताजी के वचन सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। त्रिजटा ने कहा- हे सुकुमारी! सुनो, रात्रि के समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गई। …. और इस प्रकार त्रिजटा ने उस समय सीता के मन में आए अग्नि में जल कर स्वयं को नष्ट कर लेने वाले आत्महत्या के विचार को खण्डित कर दिया।

      रामकथा भारतीय संस्कृति के आदर्श का एक लिखित महाकाव्य है। त्रेतायुग की इस महागाथा में जहां पावन नगरी अयोध्या में रामराज्य में सभी नागरिक सुख और शांति से निवास करते थे। वहीं लंका में राक्षसराज रावण के राज में नागरिक उद्दंड और तामसिक मनोवृति के थे। किन्तु उसी लंका में विभीषण, मंदोदरी, त्रिजटा आदि विवेकशील, सह्दय, परोपकारी जन भी निवासरत थे।
   राक्षसराज रावण के आधिपत्य वाली लंका में राक्षसी त्रिजटा थी। यूं तो त्रिजटा भी राक्षस कुल की महिला थी, किन्तु उसकी प्रवृत्ति परहित संरक्षण के गुण से भरपूर थी। अयोध्या की कुलवधू सीता को जब राक्षसराज रावण ने अपहृत कर लंका में स्थित अशोकवाटिका में बंदिनी के रूप में रखा था, तब रावण ने अनेक राक्षस महिलाओं को सीता की सतत् निगरानी के लिए आदेशित किया था। इन्हीं  राक्षस महिलाओं की प्रमुख त्रिजटा थी। रावण ने सभी राक्षस महिलाओं को यह आदेश दिया था कि वे किसी भी तरह डरा-धमका कर सीता को रावण से विवाह करने लिए मना लें। रावण के इस आदेश के पालनार्थ सभी राक्षस महिलाएं सीता को मनाने हेतु तरह-तरह के कुटिल यत्न कर रही थीं। परोपकरी हृदय त्रिजटा से यह नहीं देखा गया। दुखी, पीड़ित, असहाय सीता की सहायता करने के उद्देश्य से उसने उपस्थित राक्षस महिलाओं को अपने एक सपने के बारे में बताया। उसने कहा कि मैने स्वप्न में देखा है कि राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ सीता को रावण के पुष्पक विमान में बिठाकर उत्तर की ओर ले जा रहे हैं। रावण नग्न है और गधे पर सवार होकर दक्षिण दिशा कि ओर जा रहा है। उसकी बीसों भुजाएं कटी हुई हैं। विभीषण को लंका का राज मिल गया है और उसके दूसरे भाई जमीन पर पड़े हुए हैं। लंका नगर पानी में डूब रहा है और एक वानर ने लंका में आग लगा दी है। राक्षसों की सेना का नाश कर दिया है। 
   
      जिन व्यक्तियों ने काशी भ्रमण किया होगा, विश्वनाथ मंदिर में दर्शन हेतु गए होंगे वे त्रिजटा माता मंदिर से परिचित होंगे। अनुश्रुतियों के अनुसार लंका युद्ध की विजय के उपरान्त त्रिजटा ने सीता से प्रार्थना की थी कि वे उसे भी अपने साथ अयोध्या ले चलें किन्तु सीता ने त्रिजटा को समझाया कि त्रिजटा काशी अर्थात् वाराणसी जाए जहां त्रिजटा को मोक्ष की प्राप्ति होगी। उस समय सीता ने त्रिजटा को यह वरदान भी दिया था कि वह काशी में हमेशा पूज्यनीय रहेगी। इसलिए आज भी काशी विश्वनाथ मंदिर के पास त्रिजटा का भी मंदिर है और भक्तगण आज भी माता त्रिजटा को फूल और हरी सब्जियां, विशेष रूप से मूली और बैंगन समर्पित करते हैं। जहां शिव जैसे अनादि देव विराजमान हैं वहीं काशी विश्वनाथ गली में ही राक्षस महिला त्रिजटा माता का मंदिर भी स्थित है। यह मंदिर साक्षी विनायक मंदिर में है। यह मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाने वाली देव दीपावली के अगले दिन त्रिजटा माता की पूजा से विशेष फल की प्राप्ति होती है। यह कहा जाता है कि वर्ष में एक दिन मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को जो त्रिजटा की पूजा करेगा उसे विशेष फल की प्राप्ति होगी। इसीलिए त्रिजटा  का एक मात्र प्राचीन मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर के पास साक्षी विनायक मंदिर मे स्थित है। राक्षसकुल की होने के बावजूद त्रिजटा माता मंदिर में महिला श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है। उनका मानना है कि जिस तरह त्रिजटा ने अशोक वाटिका में सीता की रक्षा की थी, उसी प्रकार उनकी और उनके सुहाग की भी रक्षा करेंगी। यह भी मान्यता है कि वर्ष में एक दिन माता त्रिजटा के दर्शन-पूजन मात्र से सभी दुःख-बाधाओं का नाश होता है और समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
 
     वाल्‍मीकी रामायण में भी त्रिजटा का चरित्र जन्‍म से राक्षसी होकर भी कर्म से मानवीय बताया गया है। वाल्मीकि रामायण के सुन्‍दरकांड के अनुसार अशोक वाटिका में सीता की रक्षा और सहायता करने तथा दिलासा देने का कार्य त्रिजटा ने किया था। त्रिजटा ने अन्य राक्षसियों को अपना स्वप्न सुनाते हुए रावण के कृत्य को निंदनीय बता कर रावण को भविष्य में मिलने वाले दण्ड कि वर्णन किया था। जिसे सुन कर भयभीत राक्षसियों ने सीता से बुरा व्यवहार करना त्याग दिया था - 
कृष्‍यमाणः स्‍त्रिया मुण्‍डो दुष्‍टः कृष्‍णाम्‍बर पुनः ।
रथेन स्‍वरयुक्तेन रक्तमाल्‍यानुलेपनः ॥
पिबंस्‍तैल हसन्‍नृत्‍यन्‌ भ्रान्‍ताचित्ता कुलेन्‍द्रियः ।
गर्दभेन ययों शीघ्रं दक्षिणां दिशमास्‍थितः॥

 अर्थात् एक स्‍त्री उस मुण्‍डित मस्‍तक रावण को कहीं खींचे लिये जा रही थी। उस समय मैंने पुनः देखा रावण ने काले कपड़े पहन रखे हैं । वह गधे जुते हुए रथ से यात्रा कर रहा था । लाल फूलों की माला और लाल चन्‍दन से विभूषित था। तेल पीता, हंसता और नाचता था वह गधे पर सवार होकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा था ।
         इतना ही नहीं त्रिजटा ने अन्‍य राक्षसियों को बताया कि उसने स्‍वप्‍न में मल के कीचड़ अर्थात् पंक में पड़ा देखा है। एक काले रंग की स्‍त्री जो कीचड़ में लिपटी हुई थी वह लाल वस्‍त्र पहने हुए रावण का गला बाँधकर दक्षिण दिशा में ले गई । उसने उसका भाई कुम्‍भकरण भी उसी अवस्‍था में देखा गया उसके पुत्र भी मुड़-मुड़ाये तेल में नहाये दिखाई दिये । राक्षसकुल के एक मात्र सम्मानित राजवंशी विभीषण श्‍वेत छत्र लगाये, श्‍वेत वस्‍त्र में श्‍वेत माला, श्‍वेत चन्‍दन और अंगराज धारण किए दिखाई दे रहे थे। विभीषण के पास शंख ध्‍वनि एवं नगाड़े बजाये जा रहे थे। वे चार दांत वाले दिव्‍य गज पर आरूढ़ आकाश में दिखाई दिए । त्रिजटा ने अन्य राक्षस महिलाओं को बताया कि - "मैंने स्‍वप्‍न में देखा है कि रावण की सुरक्षित लंका में राम के दूत बनकर आये हुए एक महावीर वानर ने लंका जलाकर भस्‍म कर दी है। अतः मेरी राक्षसकुलवंशी बहनों! जनकनंन्‍दिनी सीता को प्रणाम करो, वे अभिवादन करने मात्र से प्रसन्‍न हो जायेंगी तथा तुम्‍हारे जीवन की रक्षा करेंगी । तुम इन्‍हें भयभीत मत करो ।"
      त्रिजटा का चरित्र सीख लेने योग्य है। राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद एक महिला होने के नाते त्रिजटा मानवीय गुणों से परिपूर्ण थी। राम की प्रतीक्षा में व्याकुल सीता के मन में शीतलता और सकारात्‍मकता का संचार करने वाली वह ममतामयी त्रिजटा इसीलिए वन्‍दनीय तथा अनुकरणीय है। हमारे टीवी सीरियल निर्माताओं को कुटिल चरित्र वाली महिलाओं के पात्र गढ़ने के बजाए त्रिजटा जैसी सद्चरित्र महिलाओं के जीवन पर पटकथाएं लिखवा कर समाज के हितार्थ श्रेष्ठ और स्वस्थ परम्परा की नींव रखने वाले धारावाहिकों का निर्माण करना चाहिए। उन्हें इस कलियुग में त्रेतायुग की राक्षस महिला त्रिजटा के सहिष्णुतापूर्ण मानवीय आचरण का स्मरण कर महिलाओं के व्यवहार के प्रति क़ायम मिथक को तोड़ने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरे कुछ दोहे -

महिला की होती सदा, महिला अच्छी मित्र ।
दुश्मन जो दिखला रहे, मिथ्या हैं वे चित्र ।।

महिला ही है जानती, महिला-मन की थाह ।
हर विपदा से मुक्ति की, दिखलाती है राह ।।

करुणा, ममता, प्रेम की यह मूरत साकार ।
महिला है इस सृष्टि का अतुलनीय उपहार ।।

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Wednesday, November 25, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 26 | कलियुग के कर्ण : डॉ. हरीसिंह गौर | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "कलियुग के कर्ण : डॉ. हरीसिंह गौर" ...अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 25.11.2020
मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

       कलियुग के  कर्ण : डॉ. हरीसिंह गौर
                               -डॉ. वर्षा सिंह
    
        रामचरित मानस के लंकाकांड में राम-रावण युद्ध के दौरान का एक प्रसंग है। लंकापति रावण वनवासी राम से युद्ध करने अपनी विराट सेना ले कर निकल पड़ा। तब विभीषण रावण को रथ पर और राम को बिना रथ के देखकर अधीर हो गया। उसके मन में क्षण भर के लिए यह संदेह उपजा कि राम बिना रथ के रावण को भला कैसे जीत सकेंगे ! वह कह उठा -

         नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। 
         केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥
         सुनहु सखा कह कृपानिधाना। 
         जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥
 अर्थात् हे नाथ! आपके पास न रथ है, न ही तन की रक्षा करने वाला कवच है और नही पैरों में  जूते ही हैं। ऐसी स्थिति में आप उस बलवान वीर रावण पर किस प्रकार विजय प्राप्त कर पाएंगे? मित्र विभीषण की यह बात सुन कर कृपानिधान राम ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, उसके पास एक दूसरा ही विशेष रथ होता है। -

           ईस भजनु सारथी सुजाना। 
           बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
           दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। 
           बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
अर्थात् ईश्वर का भजन ही उस रथ को चलाने वाला चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है।
    यहां दान की महिमा-शक्ति को फरसे के रूप में व्याख्यायित करने वाले तुलसीदास दान को रोगहर्ता औषधि के रूप में भी निरूपित करते मिलते हैं। रामचरितमानस उत्तरकाण्ड में
गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तरों की श्रृंखला की इस चौपाई में दान को भी शामिल किया गया है  -

   नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
अर्थात् नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान ये सभी औषधियां हैं जिनसे कठिन से कठिन रोग भी ठीक हो जाते हैं।

     अथर्ववेद के अनुसार ‘सौ हाथों से धन अर्जित करो और हजार हाथों से उसका दान करो’- 
 शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर। 

      ऋग्वेद में तो ऐसे अनेक सूक्त तथा मंत्र हैं, जिनकी संज्ञा 'दानस्तुति' है। दानस्तुति का शाब्दिक अर्थ है 'दान की प्रशंसा में गाए गए मंत्र'। व्यापक अर्थ में दान के उपलब्ध में राजाओं तथा यज्ञ के आश्रयदाताओं की स्तुति में ऋषियों द्वारा गाई गई ऋचाएँ 'दानस्तुति' हैं। ऋग्वेद में कहा गया है कि धनवान को चाहिए कि वह धनार्थी को धन का दान करे, क्योंकि संपत्ति कभी एक जगह स्थिर नहीं रहती। वह रथ के पहिए के आवर्तन की भांति, कभी एक पुरुष के पास, कभी दूसरे पुरुष के पास घूमती रहती है।

   जगद्गुरु शंकराचार्य ने भी कहा है- 
           दानं परं किं च सुपात्र दत्तम्‌
अर्थात् श्रेष्ठदान वहीं है जो सुपात्र को दिया जाए। शास्त्रों के अनुसार धन की तीन गति होती है-दान, भोग और नाश। जो व्यक्ति दान नहीं करता है, और न ही उसका भोग करता है उसका धन तीसरी गति को प्राप्त हो जाता है अर्थात् नष्ट हो जाता है।
    सतयुग, त्रेता और द्वापर में एक से एक बढ़ कर दानी हुए हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों, पौराणिक कथाओं में ऐसे अनेक दृष्टांत मौज़ूद हैं जब अपने तन, मन, धन की परवाह किए बिना लोगों ने परहित में अपना सर्वस्व दान कर दिया। 
सतयुग में महर्षि दधीचि हुए। उनके पिता का नाम ऋषि अथर्वा था और माता का नाम शांति था।  दधीचि ने अपना संपूर्ण जीवन शिव की भक्ति में व्यतीत किया था। दधीचि वेद-शास्त्रों के ज्ञाता, परोपकारी और बहुत दयालु थे। उनके जीवन में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं था । वे सदा दूसरों का हित करने के लिए तत्पर रहते थे। वे इतने परोपकारी थे कि उन्होंने असुरों का संहार के लिए अपनी अस्थियां तक दान में दे दी थीं। 
   महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता की कथा भी ऐसी ही है। देवराज इंद्र ने उनकी न्यायप्रियता की कहानी सुनी तो उन्हें शंका हुई और उसने शिवि परीक्षा लेनी चाही। देवराज इंद्र और अग्नि देव ने योजना बनाई, जिसके अंतर्गत देवराज इंद्र ने बाज का और अग्नि ने कबूतर का रूप धारण कर शिवि की परीक्षा लेने का उपक्रम किया। एक दिन महाराज शिवि अपने महल के बगीचे में बैठे हुए थे। तभी उनकी गोद में एक घायल कबूतर गिरा। कबूतर का पीछा करते एक बाज भी आया। बाज ने शिवि से कहा कि हे राजन् ! कबूतर मेरा भोजन है। इसे मुझे सौंप दीजिये। महाराज शिवि ने कहा कि ये कबूतर मेरी शरण में आया है और मैं अपने शरण में आये किसी भी जीव के प्राणों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। तब बाज ने कहा कि महाराज ये मेरा आहार है और किसी के आहार को छीनना धर्म नहीं है। इसपर शिवि ने बाज को उसके आहार  व्यवस्था करने की बात कही तो बाज ने कहा की महाराज आप इस कबूतर के बराबर का मांस हमें दे दीजिये। हमें  और कुछ नहीं चाहिए।
महाराज शिवि ने निश्चय किया की कबूतर की जगह वे अपना मांस उस बाज को खिलाएंगे। क्योंकि शिवि अपने राज्य के किसी और प्राणी को मरने नहीं दे सकते थे। वहां एक तराजू मंगाया गया। उस तराजू पर एक तरफ कबूतर को बैठाया गया और दूसरी तरफ महाराज शिवि अपने शरीर से मांस काटकर  रखते गए। पर हर बार कबूतर का पलड़ा भारी रहता था। अंत में तराजू के दूसरे पलड़े पर रक्तरंजित महाराज शिवि स्वयं बैठ गए। तब दूसरा पलड़ा भारी हो गया। अब देवराज इंद्र और अग्नि देव की शंका दूर हुई और वे अपने असली रूप में आ गये। दोनों ने महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और चले गए।
     त्रेतायुग में राक्षसवंशी राजा बलि ने जब अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया तो देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु ने छलपूर्वक बलि से वापस तीनों लोक लेने की योजना बनाई। वे वामन रूप में बलि के पास पहुंचे और दान में तीन पग यानी तीन क़दम भूभि मांग ली। राक्षसकुल गुरु शुक्राचार्य द्वारा समझाने और विष्णु के छल को समझने के बावज़ूद उदारमना राजा बलि ने वामन रूप में पधारे याचक विष्णु को तीन कदम भूमि दान करने हेतु स्वीकृति दे दी। तब विष्णु ने विराट स्वरुप धरा और एक पांव में धरती, दूसरे में स्वर्ग अर्थात् देवलोक नाप लिया तथा तीसरे में पाताल लोक नाप लिया और फिर दक्षिणा देने का अनुरोध किया। अब दक्षिणा देने के लिए कुछ नहीं बचा था। तब दानवीर बलि ने अपना शरीर आगे कर दिया। विष्णु ने बलि का शरीर दक्षिणा के रूप में स्वीकार कर लिया।
       द्वापरयुग के दानवीर कर्ण की कथा सभी जानते हैं। महाभारत महाकाव्य में कर्ण की दानवीरता के अनेक प्रसंग हैं। वह अपने पास आए किसी भी याचक को कभी खाली हाथ नहीं लौटाता था, ऐसी उसकी कीर्ति थी। कर्ण प्रतिदिन सुबह स्नान के लिए नदी पर जाता था। जल में उतरकर सूर्य को अर्घ देता और स्नान के उपरांत जो भी याचक उसके पास आता, उसे वह मुंहमांगी वस्तु प्रदान करता था। महाभारत युद्ध काल में इन्द्र को अपना जन्मजात कवच और कुण्डल तथा कुन्ती को उसके पांच पुत्र जीवित रहने का वचन दान स्वरूप दे दिया था। एक और प्रसंग है कर्ण की दानवीरता का। एक दिन एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं और मेरा व्रत है कि बिना हवन किए अन्न-जल ग्रहण नहीं करता हूं। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो, मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं ही होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा। युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया। संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी। तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया। लेकिन काफी दौड़- धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, कृपया मेरे साथ चलें। ब्राह्मण यह सुनकर खुश हो गए। तब कृष्ण ने अर्जुन व भीम के साथ वेष बदलकर ब्राह्मण को संग लेकर चल दिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं। याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी सूखी लकड़ी नहीं थी। ऐसे में ब्राह्मण निराश हो गया। तभी कर्ण ने कहा, हे ब्राह्मण देव! आप निराश न हों, मैं आपको सूखी लकड़ियां अवश्य दूंगा। फिर कर्ण ने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी और  ब्राह्मण से कहा कि आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए। कर्ण ने लकड़ी ब्राह्मण के घर पहुंचाने का प्रबंध भी कर दिया। ब्राह्मण कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया। कृष्ण ने पांडवों को कर्ण की दानशीलता प्रत्यक्ष दिखला दी।
    कलियुग में दानवीरता की ऐसी कथाएं बहुत कम ही मिलती हैं। श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में कलियुग की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए दान देने की भावना का ह्रास होने की बात गोस्वामी तुलसीदास इस चौपाई के माध्यम से कहते हैं -

        दम दान दया नहिं जानपनी। 
        जड़ता परबंचनताति घनी॥
        तनु पोषक नारि नरा सगरे। 
        परनिंदक जे जग मो बगरे॥
अर्थात् इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही है । मूर्खता करना और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया है। शरीर के ही पालन-पोषण में ही नर और नारी सभी लगे रहते हैं। पराई निंदा करने वाले पूरे जगत में फैले हुए हैं।
    किन्तु मध्यप्रदेश के सागर नगर का डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कलियुग के महान दानवीर सपूत डॉ. हरीसिंह गौर की दानवीरता का प्रत्यक्ष उदाहरण है। 
      डॉ. हरीसिंह गौर का जन्म 26 नवम्बर 1870 को सागर जिले के शनिचरी नामक स्थान में एक निर्धन परिवार में हुआ था। उनके पिता मानसिंह (भूरा सिंह) पहले अवध से गादपेहरा फ़ोर्ट में रहे फिर सागर आकर बस गए। भूरा सिंह ने सागर में फ़र्नीचर का व्यापार शुरु कर दिया। उनके तीन भाई, ओंकार सिंह, गणपत सिंह और आधार सिंह तथा दो बहने लीलावती और मोहनबाई थीं। उन्होंने सागर मुख्यालय में ही स्थित गवर्नमेंट हाईस्कूल से मिडिल स्तर की शिक्षा प्रथम श्रेणी में प्राप्त की थी। छात्रवृत्ति पर मिडिल से आगे की पढ़ाई के लिए वे जबलपुर गए और वहां से महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए नागपुर के हिसलप कॉलेज में दाखिला ले लिया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में की थी। वे प्रांत में प्रथम रहे तथा छात्रवृति पर ही सन् 1889 में उच्च शिक्षा लेने इंग्लैंड गए। सन् 1892 में दर्शनशास्त्र एवं अर्थशास्त्र में ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की। फिर 1896 में एम.ए., सन 1902 में एल.एल.एम. और अन्ततः सन 1908 में एल.एल.डी. की उपाधि प्राप्त की। कैम्ब्रिज में पढ़ाई से जो समय बचता था उसमें वे ट्रिनिटी कालेज में डी लिट्, तथा एल.एल.डी. की पढ़ाई करते थे। सन् 1912 में वे बैरिस्टर होकर स्वदेश आ गये। उनकी नियुक्ति सेंट्रल प्रॉविंस कमीशन में एक्स्ट्रा `सहायक आयुक्त´ के रूप में भंडारा ज़िले में हो गई। जहां से शीघ्र ही त्यागपत्र दे कर वे अखिल भारतीय स्तर पर वकालत करने लगे और मध्य प्रदेश, भंडारा, रायपुर, लाहौर, कलकत्ता, रंगून तथा चार वर्ष तक इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में वकालत करते रहे।
    सन् 1921 में केंद्रीय सरकार ने जब दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना की तब डॉ. सर हरीसिंह गौर को विश्वविद्यालय का संस्थापक कुलपति नियुक्त किया गया। उन्हें 9 जनवरी 1925 को शिक्षा के क्षेत्र में 'सर' की उपाधि से विभूषित किया गया, तत्पश्चात डॉ. सर हरीसिंह गौर को दो बार नागपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया।
     डॉ. हरीसिंह गौर को अपनी जन्मभूमि सागर में उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने की पीड़ा सदैव उनके मन को कचोटती थी। इसी कारण द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात ही इंग्लैंड से लौट कर उन्होंने स्वेच्छा से दान दे कर अपने जीवन भर की गाढ़ी कमाई से इसकी स्थापना करायी। उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से 20 लाख रुपये की धनराशि का दान दे कर लोकहित में 18 जुलाई 1946 को अपनी जन्मभूमि सागर में सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की। डॉ. गौर ने वसीयत द्वारा अपनी निजी सम्पत्ति से 2 करोड़ रुपये दान भी दिया था। डॉ हरीसिंह गौर सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक, उपकुलपति के रूप में अपने जीवन के आखिरी समय 25 दिसम्बर 1949 तक विश्वविद्यालय के विकास के प्रति संकल्पित रहे। उनका स्वप्न था कि सागर विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड जैसी मान्यता हासिल करे। सागर विश्वविद्यालय का नाम सागर के नागरिकों की मांग पर कालांतर में डॉ. गौर के नाम पर डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय रख दिया गया। 
       आज डॉ. हरीसिंह गौर की ही देन है सागर का डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, जिसकी स्थापना एक दानवीर शिक्षाविद के द्वारा स्वेच्छा से किए गए दान के द्वारा हुई है। सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ. गौर दानवीर होने के साथ ही शिक्षाशास्त्री, ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, समाज सुधारक, साहित्यकार, कवि, उपन्यासकार, न्यायविद् एवं देशभक्त थे। वे बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाशास्त्रियों में से थे। डॉ. गौर दिल्ली विश्वविद्यालय तथा नागपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति पदों को शोभायमान करने के साथ ही भारतीय संविधान सभा के उपसभापति, साइमन कमीशन के सदस्य तथा रायल सोसायटी फार लिटरेचर के फेलो भी रहे थे। डॉ. गौर ने कानून,  शिक्षा, साहित्य, समाज सुधार, संस्कृति, राष्ट्रीय आंदोलन, संविधान निर्माण आदि में भी योगदान दिया। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों में - पीनल लॉ ऑफ़ इंडिया, सेवन लाईव्ज़, लॉस्ट सोल प्रमुख हैं।
    प्रत्येक वर्ष 26 नवम्बर गौर जयंती को सागर नगर में उत्सवी माहौल रहता है। डॉ. गौर के जन्मदिन पर सागर के नागरिकों एवं विश्वविद्यालय के वर्तमान छात्रों, शिक्षकों सहित पूरी दुनिया में निवासरत सागर विश्वविद्यालय से शिक्षा अर्जित करने वाले पूर्व सभी छात्रगण डॉ. हरीसिंह गौर का स्मरण कर उनके प्रति अपनी आदरांजलि व्यक्त करते हैं।
    
और अंत में प्रस्तुत हैं कलियुग के उन महान दानवीर डॉ. हरीसिंह गौर को समर्पित मेरा यह गीत  -

हरीसिंह गौर नाम है जिनका
सबके दिल में रहते हैं
बच्चे बूढ़े गांव शहर सब 
उनकी गाथा कहते हैं…

रोक न पाई निर्धनता भी
बैरिस्टर बन ही ठहरे
उनका चिंतन उनका दर्शन
उनके भाव बहुत गहरे
ऐसे मानव सारे दुख को 
हंसते हंसते सहते हैं ...

शिक्षा ज्योति जलाने को ही
अपना सब कुछ दान दिया
इस धरती पर सरस्वती को
तन,मन,धन से मान दिया
उनकी गरिमा की लहरों में
ज्ञानदीप अब बहते हैं.. 

ऋणी सदा बुंदेली धरती
ऋणी रहेगा युवा जगत
युगों युगों तक गौर भूमि पर
शिक्षा का होगा स्वागत
ये है गौर प्रकाश कि जिसमें
अंधियारे सब ढहते हैं..

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Dr. Hari Singh Gour

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Wednesday, November 18, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 25 | अहिंसा, परहित और शबरी | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "अहिंसा, परहित और शबरी" ...अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 18.11.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-

    बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

        अहिंसा, परहित और शबरी

                                -डॉ. वर्षा सिंह

        मेरे स्कूली दिनों में हिन्दी विषय के अंतर्गत कुछ ख़ास विषयों पर हमसे निबन्ध लेखन कराया जाता था। जैसे - साहित्य समाज का दर्पण है, मेरे प्रिय साहित्यकार, मेरे प्रिय कवि, परहित सरिस धरम नहिं भाई, विज्ञान वरदान है या अभिशाप, विद्यार्थी और अनुशासन, जनसंख्या नियंत्रण आदि-आदि। 
      उन दिनों विषय के अनुरूप प्रस्तावना से प्रारंभ हो कर निष्कर्ष तक के एक निश्चित फ्रेम में 150- 200 शब्दों में लिखे गए निबन्ध परीक्षा उत्तीर्ण करने के उद्देश्य से तैयार किए जाते थे। 
      आज विचार करने पर मैं यह पाती हूं कि इन तमाम विषयों में से "परहित सरिस धरम नहिं भाई" पंक्ति मनुष्य की धार्मिक प्रवृत्ति से कहीं अधिक मानवीय प्रवृत्ति से संबद्घ है। यह पंक्ति रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड की है। जिसमें राम अपने अनुज भरत की विनती पर साधु और असाधु का भेद बताने के बाद कहते हैं कि -
परहित सरिस धरम नहिं भाई
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।
निर्नय सकल पुरान बेद कर। 
कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।।
      अर्थात् परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम कर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं। समस्त पुराणों और वेदों का यही निर्णय अर्थात् आशय है जो मैंने तुमसे कहा है और इस बात को सभी पण्डित लोग जानते हैं।

     शिव ने हलाहल विष का पान कर दिव्य शक्ति से अपने कण्ठ में इसीलिए स्थित किया ताकि सम्पूर्ण विश्व उस विष के प्रभाव से नष्ट नहीं हो। शिव की कल्याणकारी भावना परहित का पर्याय है।
शिवमहिम्न स्तोत्र का यह स्तोत्र देखें -
अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा-
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो।
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भंग-व्यसनिनः।। 
      अर्थात् जब समुद्रमंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नों के साथ महाभयानक विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकता था। हे शिव, आपने बड़ी कृपा करके उस विष का पान किया। विषपान करने से आपके कंठ में नीला चिन्ह हो गया और आप नीलकंठ कहलाये। परंतु हे प्रभु, क्या ये आपको कुरुप बनाता है ? कदापि नहीं, ये तो आपकी शोभा को और बढ़ाता है। जो व्यक्ति औरों के दुःख दूर करता है उसमें अगर कोई विकार भी हो तो वो पूजा पात्र बन जाता है।

     सचमुच यह जगज़ाहिर बात है कि परोपकार की भावना ही वास्तव में मानव को मानव बनाती है। मानवता का भाव वही है जब कोई मानव किसी व्यक्ति, प्राणी, समाज, देश की निःस्वार्थ भाव से सहायता करे। ‘स्व’ के संकीर्ण दायरे से निकलकर ‘पर’ के उदात्त धरातल पर खड़ा मानव निःस्वार्थ भाव से जनकल्याण के कार्य करता है। हम सभी जानते हैं कि अभी पिछले दिनों कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए किये गए लॉकडाउन के दौर में अपने घर- गांव से बाहर फंसे प्रवासी मजदूरों को घर भेजने की व्यवस्था करने वाले बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद ने इसी मानवता का परिचय दिया। वे वर्तमान में भी प्रवासी मज़दूरों के हितरक्षण के प्रति जागरूक हैं।
यजुर्वेद में लिखा है -
 मित्रस्याहं भक्षुसा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।।
      अर्थात्, सभी प्राणियों के प्रति सहृदयता का परिचय देना ही जीवन का सही लक्षण है। 

    जैन धर्म की बुनियाद ही अहिंसा और परमार्थ पर आधारित है। जैन ग्रंथों में तीर्थंकर देव नेमीनाथ का वृत्तांत कुछ इस प्रकार मिलता है कि द्वापरयुग में नेमीनाथ मूक पशुओं के वध से क्षुब्ध होकर गिरनार पर्वत पर चले गए थे। वहां कठोर तप के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और मोक्ष के साथ वे तीर्थंकर कहलाए। नेमिनाथ जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में से बाईसवें तीर्थंकर थे। नेमिनाथ का जन्म सौरीपुर, द्वारका के हरिवंश कुल में श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को चित्रा नक्षत्र में हुआ था। उनकी माता का नाम शिवा देवी और पिता का नाम राजा समुद्रविजय था। जैन धर्म-ग्रंथों की प्राचीन अनुश्रुतियों के अनुसार नेमिनाथ का विवाह मथुरा के राजा उग्रसेन की पुत्री राजुलमती से तय किया गया था। विवाह हेतु जब नेमिनाथ मथुरा पहुंचे तो वहाँ उन्होंने एक बाड़े में क्रंदन करते कई पशुओं को देखा। ये सारे पशु बारातियों के भोजन हेतु मारे जाने वाले थे। यह देखकर नेमिनाथ का हृदय करुणा से व्याकुल हो उठा, उन्हें लगा कि उनके विवाह के लिए इतने पशुओं का वध किया जाएगा तो ऐसे विवाह से तो ब्रह्मचर्य जीवन ही उत्तम है। ऐसे विचार आते ही नेमिनाथ के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे विवाह का विचार छोड़कर तपस्या को चले गए। नेमिनाथ ने सौरीपुर में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को दीक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद 54 दिनों तक कठोर तप करने के बाद गिरनार पर्वत पर 'मेषश्रृंग वृक्ष' के नीचे अमावस्या को 'कैवल्य ज्ञान' को प्राप्त किया। 70 साल तक साधक जीवन जीने के बाद आषाढ़ शुक्ल की अष्टमी को नेमिनाथ ने एक हज़ार साधुओं के साथ गिरनार पर्वत पर निर्वाण को प्राप्त किया। बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ को जैन धर्म में श्रीकृष्ण के समकालीन और उनका चचेरा भाई माना जाता है। 
      ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब हिंसा के विरुद्ध, परहितरक्षण हेतु व्यक्ति उठ खड़े हुए और उन्होंने हिंसा का विरोध किया। त्रेतायुग में शबरी को ही लीजिए, वही महान भक्त शबरी जो राम को जूठे बेर खिलाए जाने हेतु जानी जाती है। इस प्रसंग के अलावा शबरी की जीवनकथा के उस अंश से बहुत कम व्यक्ति परिचित हैं, जिसमें शबरी ने भी विवाहोत्सव में होने वाले पशुओं का वध रोकने के उद्देश्य से गृहत्याग कर दिया था। शबरी भील जनजाति के राजा की इकलौती पुत्री थी। शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा था। विवाहयोग्य होने पर शबरी का विवाह एक भील कुमार से तय किया गया था। विवाह से पहले सैकड़ों बकरे-भैंसे आदि पशु बलि के लिए लाये गए थे। जिन्हें देख शबरी को बहुत मानसिक पीड़ा हुई। उसे लगा कि यह कैसा विवाह है जिसके लिए इतने सारे पशुओं की हत्या की जाएगी। मन ही मन दृढ़ निश्चय करके वह कन्या शबरी विवाह के एक दिन पहले गृह त्याग कर दंडकारण्य चली गई। वहां ऋषि मतंग ने शबरी को अपने आश्रम शरणदे कर अपनी शिष्या स्वीकार किया। अनुश्रुति है कि अन्य ऋषियों ने इसका भारी विरोध किया।  गृहत्याग कर आई भील कन्या भला ऋषि आश्रम में कैसे रह सकती है! किन्तु मतंग ऋषि ने शबरी को पितृवत् संरक्षण दे कर अपने आश्रम में जीवनपर्यंत आश्रय दिया। 
        ऋषि मतंग जब इहलीला समाप्त कर स्वर्ग लोक जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखे। परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं। उनके लिए कोई व्यक्ति उच्च या निम्न जाति का नहीं है। उनके लिए सब समान हैं। फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन विष्णु के अवतार राम इस आश्रम में अवश्य आएंगे और उनके दर्शन से शबरी को मोक्ष की प्राप्ति होगी। ऋषि मतंग के स्वर्गारोहण के बाद शबरी ईश्वर भजन में लगी रही और धैर्यपूर्वक राम के आगमन की प्रतीक्षा करती रही…. और एक दिन श्रीराम उसके आश्रम के द्वार पर आए।
           वनवास के दौरान जब सीता का हरण लंकापति रावण ने कर लिया, तब व्याकुल राम और लक्ष्मण सीता की खोज में मतंग मुनि के आश्रम तक आ पहुंचे। जहां उन्हें ज्ञात हुआ कि आश्रम में मतंग मुनि की शिष्या शबरी नामक एक वृद्ध स्त्री अपने गुरु की आज्ञा से अपने कुटिया में कई वर्षों से राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है।
      लक्ष्मण सहित राम जब वहां पहुँचे तो भाव विभोर होकर शबरी ने राम का सत्कार किया। रामचरित मानस के अरण्यकाण्ड में तुलसीदास कहते हैं -
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।
    अर्थात् शबरी ने राम को घर में आए देखा, तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया।

सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
अर्थात् कमल सदृश नेत्र और विशाल भुजाओं वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किए हुए सुंदर, साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरी लिपट पड़ी।

प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।
 अर्थात् शबरी प्रेम में मग्न हो गई, मुख से वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही है, फिर उसने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोए और फिर उन्हें सुंदर आसनों पर बैठाया।

तब उदात्त हृदय के धनी, करुणा के साक्षात स्वरूप राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया। भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है - 
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे।।
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।
 अर्थात् हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है।

        शबरी यह सुन कर धन्य हो गयी। उसकी भक्ति और विश्वास उसके इष्टदेव राम को उसके द्वार तक खींच लाया। फिर शबरी ने मीठे फलों से राम का सत्कार किया और सीता की खोज के लिए सुग्रीव तथा हनुमान के बारे में अवगत करा कर उन्हें उनसे मिलने का मार्ग बताया। तत्पश्चात् शबरी राम के आदेशानुसार मृत्युलोक को छोड़ कर मोक्षगति प्राप्त कर स्वर्ग चली गयी।

      वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में शबरी को श्रमणी कहा गया है -
तामुवाच ततो राम: श्रमणीं धार्मसंस्थिताम्।।
      उसी अरण्यकांड में शबरी को सिद्धा भी कहा है। अर्थात् अपनी आध्यात्मिक एकाग्रता से, अपने विश्वास और अपनी भक्ति के चरमोत्कर्ष पर पहुंच कर शबरी ने अपने इष्टदेव के दर्शन कर लिए।

रामचरितमानस में भी कहा गया है -
कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,
मानहु एक भगति कर नाता।
   अर्थात् राम ने कहा की हे भामिनी सुनो, मैं केवल प्रेम का नाता ही मानता हूं। परिवार, जाति का मेरे लिए कोई महत्व नहीं है।

बुंदेली लोकगीत में भी शबरी की गाथा का बहुत सुंदर चित्रण मिलता है -

प्रेम बिबस भगवान, शबरी घर आये,
लम्बी-लम्बी झाडू शबरी डगर बटोरी,
एई डगरिया आये राम, शबरी घर आये। प्रेम...
कुश की चटइया शबरी झाड़ बिछाई,
आसन लगाये भगवान, शबरी घर आये। प्रेम...
काठ की मटकिया शबरी जल भर ल्याई,
चरण पखारूं मैं भगवान, शबरी घर आये। प्रेम...
मीठी-मीठी बेर शबरी दौना भर ल्याई,
भोग लगावे भगवान, शबरी घर आये। प्रेम...
तुलसीदास आस रघुबर की,
शिव री बैकुण्ठ पठाये, शबरी घर आये। प्रेम…

    आज भी "माता शबरी का आश्रम" के नाम से प्रसिद्ध स्थल छत्तीसगढ़ के शिवरीनारायण में शिवरीनारायण मंदिर परिसर में स्थित है। शिवरीनारायण छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा ज़िले में आता है। यह बिलासपुर से 64 और रायपुर से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस स्थान को पहले शबरी के नाम पर शबरीनारायण कहा जाता था जो बाद में शिवरीनारायण के रूप में पहचाना जाने लगा। महानदी, जोंक और शिवनाथ नदी के तट पर स्थित यह मंदिर एवं आश्रम प्रकृति के सुंदर दृष्यों से परिपूर्ण हैं।

      विवाह कर गृहस्थ जीवन का सुख-भोग करने के बजाए परहित के लिए, प्राणियों की जीवनरक्षा के लिए जहां एक ओर जैन तीर्थंकर नेमिनाथ ने गिरनार पर्वत पर जा कर कठोर तपस्या कर लोककल्याण में जीवन अर्पित किया तो वहीं दूसरी ओर रामकथा की श्रमणी शबरी ने एक कन्या होते हुए भी गृहत्याग का निर्णय कर वनगमन किया और मतंग ऋषि के आश्रम में तपस्विनी का जीवन व्यतीत करना अधिक श्रेयस्कर समझा।
     विरले ही मनुष्य ऐसे मिलते हैं जो अपने जीवन में "परहित सरिस धरम नहिं भाई" को चरितार्थ करते हैं ….और इसीलिए वे सदैव पूज्यनीय, स्मरणीय और अनुकरणीय होते हैं।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी ये काव्यपंक्तियां -

सीख अगर देता है कोई, तो क्या स्वयं निभाता है ?
सही मायने में वह ज्ञानी, जिसने कर्मों में ढाला ।

"वर्षा" वे जन पूजनीय हैं जो परहित के लिए जिए,
शिव ने गले लगाया हंस कर विष से भरा हुआ प्याला ।

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Wednesday, November 11, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 24 | दीपावली, स्वच्छता और हम | डॉ. वर्षा सिंह



प्रिय ब्लॉग पाठकों,  "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "दीपावली, स्वच्छता और हम" ...अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏

हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏दिनांक 11.11.2020

बुधवारीय स्तम्भ : विचारवर्षा

      दीपावली, स्वच्छता और हम

                          -डॉ. वर्षा सिंह

      इन दिनों लगभग हर जगह… गली- मुहल्ले, घर-द्वार में साफ-सफाई, रंगाई-पुताई का काम चल रहा है। दीपावली त्यौहार ही ऐसा है कि देवी लक्ष्मी के स्वागतार्थ प्रत्येक व्यक्ति सफाईपसंद हो उठता है। यदि धन की देवी लक्ष्मी के स्वागत हेतु घर की आर्थिक स्थिति अधिक धन खर्च करने की अनुमति नहीं देती हो, पूरे घर की पुताई कराना दुःसाध्य कार्य हो तब भी पूजा का कमरा, रसोई घर, आंगन-द्वार की साफ-सफाई तो भली-भांति कर ही ली जाती है। दरअसल चौमासे यानी बरसात के चार महीने - आषाढ़, सावन, भादों और क्वांर झेल चुकने के बाद कार्तिक आते-आते अच्छे-ख़ासे घर भी रंग-रोगन, साफ-सफाई मांगने लगते हैं। ख़ास तौर पर निम्न और मध्यमवर्गीय घरों में मकड़ियां घर के कोनों पर अड्डा जमा कर जाले पूरने में ज़रा भी कोताही नहीं बरततीं। ज़मीन से सीलन निकलने की कोशिश करती है तो छत पर पानी के नन्हें-मुन्ने धब्बे एक अलग तरह का लैंडस्केप तैयार कर देते हैं। इन घरों की मज़बूरी हो जाती कि साल भर के सबसे बड़े त्यौहार पर घरों की दशा सुधरवाएं। उच्चवर्गीय मकानों, बंगलों, कोठियों में तो दीपावली पर धन-सम्पदा का प्रदर्शन भरपूर होता ही है। कुछ भी कहिए कि इसमें दो राय नहीं कि दीपावली के बहाने अप्रत्यक्ष यानी परोक्ष रूप से स्वच्छता मिशन अभियान को सफल बनाने की एक अनकही मुहिम छिड़ जाती है। यूं तो प्राचीन समय से ही भारत स्वच्छता पसंद देश रहा है, किन्तु जनसंख्या और शहरीकरण में लगातार बढ़ोत्तरी के कारण भारत में लाख प्रचार-प्रसार के बावजूद स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूकता सुस्त दिखाई देती है। 

      स्वतंत्र भारत में स्वच्छता का संचार करने हेतु महात्मा गांधी ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी स्वच्छता है। यदि कोई व्यक्ति स्वच्छ नहीं है तो वह स्वस्थ नहीं रह सकता है। बेहतर साफ-सफाई से ही भारत के गांवों को आदर्श बनाया जा सकता है। हमें अपने शौचालय को अपने ड्रॉइंगरूम की तरह साफ रखना ज़रूरी है। नदियों को साफ रखकर हम अपनी सभ्यता को जिंदा रख सकते हैं। स्वच्छता को अपने आचरण में इस तरह अपनाया जाना चाहिए कि स्वच्छता हमारी आदत बन जाए।

    दुख की बात यह है कि महात्मा गांधी के ये विचार क़िताबों में सिमट कर रह गए। स्वतंत्र भारत में चहुंओर स्वच्छता की भावना से लोगों का सरोकार घटता चला गया। यत्र-तत्र कचरा फैलाना, पान-तम्बाकू का सेवन कर कहीं भी थूकना, मल-मूत्र त्याग के लिए निश्चित स्थान का उपयोग नहीं करना, नदियों-तालाबों का गंदगी प्रवाहित करने वाले नालों के रूप में इस्तेमाल करना तो आम बात हो गई साथ ही फैक्ट्रियों से निकलने वाले ज़हरीले धुएं, पराली जलाने से उत्पन्न वायुप्रदूषण आदि के कारण "स्वच्छताप्रिय भारत" पॉल्यूटेड इंडिया" में तब्दील हो गया। 

       स्वच्छता के मामले में विदेशों की तुलना में भारत का पिछड़ता ही चला गया। तब यहां स्वच्छता अभियान की आवश्यकता महसूस की गई। उसी के तहत स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत भारतीय जनमानस में सुप्त स्वच्छता प्रेम को जगाने की कोशिश की गई। वैश्विक परिदृश्य में स्वच्छता के मामले में भारत की निरंतर बिगड़ती छवि में सुधार के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी की 145 जयंती पर 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की। इसके लिए प्रधानमंत्री ने पांच वर्षों का लक्ष्य रखा ताकि 2 अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक महात्मा गांधी की ‘स्वच्छ भारत’ की परिकल्पना साकार हो सके। यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि स्वच्छ भारत निर्माण के लिए हवा, पानी, ज़मीन सबकी स्वच्छता ज़रूरी है। यह स्वच्छता जीवन के लिए भी ज़रूरी है।

      हवा यानी वायु में जीवनदायिनी शक्ति है। इसलिए, इसकी स्वच्छता जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। स्वच्छता का सीधा संबंध स्वास्थ्य से है और स्वास्थ्य जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। वेदों में वायु का शुद्धता पर बल देते हुए कहा गया है कि जीवन के लिए शुद्ध एवं प्रदूषण रहित वायु अति आवश्यक है -

वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे

      इसी प्रकार जल जीवन का प्रमुख तत्त्व है। इसकी स्वच्छता के बिना सभी निर्रथक है। ऋग्वेद में जल की विशेषता बताते हुए कहा गया है कि - 

अप्सु अन्तः अमृतं, अप्सु भेषजं

 अर्थात्, जल में अमृत है, जल में औषधि-गुण विद्यमान रहते हैं। 

    अथर्ववेद में पानी की शुद्धता को स्वस्थ जीवन के लिए नितान्त आवश्यक माना गया है -

शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु

    अर्थात् शुद्ध जल के अभाव में जीवन नष्ट हो जाता है।

      रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने राम के निर्मल उदात्त चरित्र की उपमा हेतु निर्मल जल को चुना। बालकाण्ड की ये चौपाईयां देखें - 

लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥

प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥

    अर्थात् सगुण लीला का जो विस्तार से वर्णन करते हैं, वही राम सुयश रूपी जल की निर्मलता है, जो मल का नाश करती है और जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुंदर शीतलता है।

सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥

मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥

भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥

      अर्थात् राम सुयशरूपी जल हैं जो सत्कर्मरूपी धान के लिए हितकर हैं और राम के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वी पर गिरा और सिमटकर सुहावने कानरूपी मार्ग से चला और मानस अर्थात् हृदयरूपी श्रेष्ठ स्थान में भरकर वहीं स्थिर हो गया। वही पुराना होकर सुंदर, रुचिकर, शीतल और सुखदाई हो गया।

     हमारे देश में गंगा का जल सबसे पवित्र माना जाता है। रामचरित मानस की इस चौपाई का यही मर्म है -

गंग सकल मुद मंगल मूला। 

सब सुख करनि हरनि सब सूला॥ 

   अर्थात् गंगा समस्त आनंद-मंगलों की मूल है। वह सब सुख देने और सब दुख हरने वाली है।

     इसीलिए राम स्वयं गंगा को प्रणाम करते हैं - 

उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु विसैषी।।

       किन्तु वर्तमान में गंगा का जल भी शुद्ध नहीं रहा है। "नमामि गंगे" परियोजना के माध्यम से गंगा का पानी साफ़ करने मुहिम ज़ारी है। वर्ष 2014 में केंद्र सरकार द्वारा इस परियोजना की शुरुआत गंगा नदी के प्रदूषण को कम करने तथा गंगा नदी को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से की गई थी। परिणाम अभी भी प्रतीक्षित हैं।

      पानी, हवा, वातावरण की स्वच्छता के साथ ही अंतःकरण की स्वच्छता यानी आंतरिक शुद्घि भी आवश्यक है, जो विवेक से उत्पन्न होती है और विवेक धर्म, आध्यात्म और चिन्तन के माध्यम से आता है। बाह्य स्वच्छता के समान ही अंतःकरण की शुद्घता भी महत्वपूर्ण है। सभी के प्रति प्रेम, सम्मान और परोपकार का भाव रख कर स्वयं का अंतःकरण स्वच्छ किया जा सकता है। परपीड़ा, परनिंदा, हिंसा के भाव स्वयं के अंतःकरण को दूषित बना देते हैं। रामचरितमानस की यह चौपाई परनिंदा करने वाले मनुष्यों के प्रति प्रहार करती है -

सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥

      अर्थात् जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। 

दीपावली पर्व की तैयारी में अपना घर-द्वार चमकाते समय अक्सर लोग भूल जाते हैं कि अपना अंतःकरण भी स्वच्छ रखें तभी देवी लक्ष्मी प्रसन्न हो कर आतिथ्य स्वीकार करेंगी। बचपन में मैंने संस्कृत पाठ में उज्जैयिनी के यशस्वी राजा  विक्रमादित्य की एक कहानी पढ़ी थी। वह कुछ इस प्रकार थी - विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा के कल्याणार्थ एक निमय बनाया था कि बाज़ार में जो भी वस्तु दिन भर में बगैर बिके रह जायगी शाम को उसे राजा क्रय कर लेंगे ताकि विक्रेता को हानि नहीं उठानी पड़े। राज्य के एक शिल्पकार ने लक्ष्मी और अलक्ष्मी दोनों की मूर्तियां बनायीं और उन्हें बाज़ार में बेचने बैठ गया। ज़ाहिर है लक्ष्मी की मूर्ति ऊंचे दाम पर बिक गई लेकिन अलक्ष्मी की मूर्ति के लिए कोई ख़रीददार नहीं मिला। शाम को नियमानुसार बिना बिकी सामग्रियों के साथ अलक्ष्मी की वह मूर्ति भी राजा विक्रमादित्य के महल में पहुंचा दी गई। रात्रि में जब राजा विक्रमादित्य सोए तो अचानक रात्रि के दूसरे पहर में ही उनकी नींद किसी की आहट से खुल गई। राजा ने देखा कि एक सुंदर स्त्री महल से बाहर जा रही है। राजा ने पूछा तो उसने उत्तर दिया कि वह विद्या की देवी सरस्वती है। महल में अलक्ष्मी के आ जाने के कारण वह महल छोड़ कर जा रही है। राजा ने सरस्वती को नहीं रोका। फिर थोड़ी देर बाद एक और सुंदर स्त्री महल से बाहर जा रही है। राजा ने उससे भी पूछा तो उसने उत्तर दिया कि वह धन की देवी लक्ष्मी है। महल में दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी के आ जाने के कारण वह अब वहां नहीं रह सकती। अतः महल छोड़ कर जा रही है। राजा ने लक्ष्मी को भी नहीं रोका। 

इसी तरह अन्य देवी- देवतागण भी अलक्ष्मी के आगमन से रुष्ट हो कर अपना परिचय देते हुए महल से चले गए। राजा ने किसी को नहीं रोका। 

          अंत में श्वेत वस्त्रधारी एक दिव्य पुरुष जब महल से जाने लगा और राजा द्वारा पूछने पर उसने कहा कि "मैं धर्म हूं। चूंकि महल में अभाग्य, अकाल और दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी का वास हो गया है अतः मैं भी यहां से जा रहा हूं।'' इस दफ़ा राजा ने उस पुरुष के पैर पकड़ लिए और उससे महल में ही रहने की विनती करने लगा। धर्म ने चकित हो कर पूछा कि "राजन, जब अन्य सभी देवी-देवता कूच कर गए तब तो तुमने किसी को नहीं रोका। मुझे ही क्यों रोक रहे हो ?"

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया कि "हे धर्म, यदि आप मेरे साथ हैं तो मुझे किसी की परवाह नहीं, लेकिन यदि आपने मेरा साथ छोड़ दिया तो मेरा जीवन व्यर्थ है। बिना धर्म के बुद्धि, विवेक, धन-सम्पदा, राज्य-सत्ता सब व्यर्थ है। मैंने राजधर्म के पालन करते हुए ही बिना बिकी वस्तु के रूप में अलक्ष्मी को महल में स्थान दिया है। अर्थात मैंने आपका पालन किया, इसलिये आप महल छोड़ कर मत जाएं।"

       विक्रमादित्य की राजधर्म का पालन करने  वाली बात का मर्म समझ कर धर्म वापस महल में लौट आया और उसने वचन दिया कि वह विक्रमादित्य को छोड़ कर कभी नहीं जाएगा। इसके बाद विक्रमादित्य ने देखा कि वे सभी देवी-देवता एक-एक कर महल में वापस लौट कर आ रहे हैं जो महल छोड़ कर चले गए थे। राजा ने उनसे उनकी वापसी का कारण पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि "जहां धर्म का वास होगा वहां हमें तो वास करना ही पड़ेगा। धर्म को छोड़ कर हम नहीं जा सकते।"

     धर्म अंतःकरण की स्वच्छता के लिए ज़रूरी है। बाह्य और आंतरिक वातावरण - जहां दोनों स्वच्छ रहते हैं वहां लक्ष्मी स्वयंमेव निवास करती हैं। 

      आईए, इस दीपावली पर हम संकल्प लें कि सिर्फ़ दीपोत्सव पर ही नहीं बल्कि हम पूरे वर्ष भर भीतर-बाहर से स्वयं स्वच्छ रहकर देश को स्वच्छ बनाए रखेंगे। और तब स्वच्छता के लिए किसी सरकारी मिशन, योजना, परियोजना की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

और अंत में प्रस्तुत है मेरी ये काव्यपंक्तियां -

स्वच्छता के दीप की न रोशनी कभी हो कम

पास अपने आ सके कभी नहीं ज़रा भी तम

मान हो, सम्मान हो, भय न हो किसी का भी

हंसी-ख़ुशी रहें सभी, न हो किसी की आंख नम

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मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-

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