Wednesday, November 25, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 26 | कलियुग के कर्ण : डॉ. हरीसिंह गौर | डॉ. वर्षा सिंह

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दिनांक 25.11.2020
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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

       कलियुग के  कर्ण : डॉ. हरीसिंह गौर
                               -डॉ. वर्षा सिंह
    
        रामचरित मानस के लंकाकांड में राम-रावण युद्ध के दौरान का एक प्रसंग है। लंकापति रावण वनवासी राम से युद्ध करने अपनी विराट सेना ले कर निकल पड़ा। तब विभीषण रावण को रथ पर और राम को बिना रथ के देखकर अधीर हो गया। उसके मन में क्षण भर के लिए यह संदेह उपजा कि राम बिना रथ के रावण को भला कैसे जीत सकेंगे ! वह कह उठा -

         नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। 
         केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥
         सुनहु सखा कह कृपानिधाना। 
         जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥
 अर्थात् हे नाथ! आपके पास न रथ है, न ही तन की रक्षा करने वाला कवच है और नही पैरों में  जूते ही हैं। ऐसी स्थिति में आप उस बलवान वीर रावण पर किस प्रकार विजय प्राप्त कर पाएंगे? मित्र विभीषण की यह बात सुन कर कृपानिधान राम ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, उसके पास एक दूसरा ही विशेष रथ होता है। -

           ईस भजनु सारथी सुजाना। 
           बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
           दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। 
           बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
अर्थात् ईश्वर का भजन ही उस रथ को चलाने वाला चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है।
    यहां दान की महिमा-शक्ति को फरसे के रूप में व्याख्यायित करने वाले तुलसीदास दान को रोगहर्ता औषधि के रूप में भी निरूपित करते मिलते हैं। रामचरितमानस उत्तरकाण्ड में
गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तरों की श्रृंखला की इस चौपाई में दान को भी शामिल किया गया है  -

   नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
अर्थात् नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान ये सभी औषधियां हैं जिनसे कठिन से कठिन रोग भी ठीक हो जाते हैं।

     अथर्ववेद के अनुसार ‘सौ हाथों से धन अर्जित करो और हजार हाथों से उसका दान करो’- 
 शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर। 

      ऋग्वेद में तो ऐसे अनेक सूक्त तथा मंत्र हैं, जिनकी संज्ञा 'दानस्तुति' है। दानस्तुति का शाब्दिक अर्थ है 'दान की प्रशंसा में गाए गए मंत्र'। व्यापक अर्थ में दान के उपलब्ध में राजाओं तथा यज्ञ के आश्रयदाताओं की स्तुति में ऋषियों द्वारा गाई गई ऋचाएँ 'दानस्तुति' हैं। ऋग्वेद में कहा गया है कि धनवान को चाहिए कि वह धनार्थी को धन का दान करे, क्योंकि संपत्ति कभी एक जगह स्थिर नहीं रहती। वह रथ के पहिए के आवर्तन की भांति, कभी एक पुरुष के पास, कभी दूसरे पुरुष के पास घूमती रहती है।

   जगद्गुरु शंकराचार्य ने भी कहा है- 
           दानं परं किं च सुपात्र दत्तम्‌
अर्थात् श्रेष्ठदान वहीं है जो सुपात्र को दिया जाए। शास्त्रों के अनुसार धन की तीन गति होती है-दान, भोग और नाश। जो व्यक्ति दान नहीं करता है, और न ही उसका भोग करता है उसका धन तीसरी गति को प्राप्त हो जाता है अर्थात् नष्ट हो जाता है।
    सतयुग, त्रेता और द्वापर में एक से एक बढ़ कर दानी हुए हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों, पौराणिक कथाओं में ऐसे अनेक दृष्टांत मौज़ूद हैं जब अपने तन, मन, धन की परवाह किए बिना लोगों ने परहित में अपना सर्वस्व दान कर दिया। 
सतयुग में महर्षि दधीचि हुए। उनके पिता का नाम ऋषि अथर्वा था और माता का नाम शांति था।  दधीचि ने अपना संपूर्ण जीवन शिव की भक्ति में व्यतीत किया था। दधीचि वेद-शास्त्रों के ज्ञाता, परोपकारी और बहुत दयालु थे। उनके जीवन में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं था । वे सदा दूसरों का हित करने के लिए तत्पर रहते थे। वे इतने परोपकारी थे कि उन्होंने असुरों का संहार के लिए अपनी अस्थियां तक दान में दे दी थीं। 
   महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता की कथा भी ऐसी ही है। देवराज इंद्र ने उनकी न्यायप्रियता की कहानी सुनी तो उन्हें शंका हुई और उसने शिवि परीक्षा लेनी चाही। देवराज इंद्र और अग्नि देव ने योजना बनाई, जिसके अंतर्गत देवराज इंद्र ने बाज का और अग्नि ने कबूतर का रूप धारण कर शिवि की परीक्षा लेने का उपक्रम किया। एक दिन महाराज शिवि अपने महल के बगीचे में बैठे हुए थे। तभी उनकी गोद में एक घायल कबूतर गिरा। कबूतर का पीछा करते एक बाज भी आया। बाज ने शिवि से कहा कि हे राजन् ! कबूतर मेरा भोजन है। इसे मुझे सौंप दीजिये। महाराज शिवि ने कहा कि ये कबूतर मेरी शरण में आया है और मैं अपने शरण में आये किसी भी जीव के प्राणों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। तब बाज ने कहा कि महाराज ये मेरा आहार है और किसी के आहार को छीनना धर्म नहीं है। इसपर शिवि ने बाज को उसके आहार  व्यवस्था करने की बात कही तो बाज ने कहा की महाराज आप इस कबूतर के बराबर का मांस हमें दे दीजिये। हमें  और कुछ नहीं चाहिए।
महाराज शिवि ने निश्चय किया की कबूतर की जगह वे अपना मांस उस बाज को खिलाएंगे। क्योंकि शिवि अपने राज्य के किसी और प्राणी को मरने नहीं दे सकते थे। वहां एक तराजू मंगाया गया। उस तराजू पर एक तरफ कबूतर को बैठाया गया और दूसरी तरफ महाराज शिवि अपने शरीर से मांस काटकर  रखते गए। पर हर बार कबूतर का पलड़ा भारी रहता था। अंत में तराजू के दूसरे पलड़े पर रक्तरंजित महाराज शिवि स्वयं बैठ गए। तब दूसरा पलड़ा भारी हो गया। अब देवराज इंद्र और अग्नि देव की शंका दूर हुई और वे अपने असली रूप में आ गये। दोनों ने महाराज शिवि की दानवीरता और न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और चले गए।
     त्रेतायुग में राक्षसवंशी राजा बलि ने जब अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया तो देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु ने छलपूर्वक बलि से वापस तीनों लोक लेने की योजना बनाई। वे वामन रूप में बलि के पास पहुंचे और दान में तीन पग यानी तीन क़दम भूभि मांग ली। राक्षसकुल गुरु शुक्राचार्य द्वारा समझाने और विष्णु के छल को समझने के बावज़ूद उदारमना राजा बलि ने वामन रूप में पधारे याचक विष्णु को तीन कदम भूमि दान करने हेतु स्वीकृति दे दी। तब विष्णु ने विराट स्वरुप धरा और एक पांव में धरती, दूसरे में स्वर्ग अर्थात् देवलोक नाप लिया तथा तीसरे में पाताल लोक नाप लिया और फिर दक्षिणा देने का अनुरोध किया। अब दक्षिणा देने के लिए कुछ नहीं बचा था। तब दानवीर बलि ने अपना शरीर आगे कर दिया। विष्णु ने बलि का शरीर दक्षिणा के रूप में स्वीकार कर लिया।
       द्वापरयुग के दानवीर कर्ण की कथा सभी जानते हैं। महाभारत महाकाव्य में कर्ण की दानवीरता के अनेक प्रसंग हैं। वह अपने पास आए किसी भी याचक को कभी खाली हाथ नहीं लौटाता था, ऐसी उसकी कीर्ति थी। कर्ण प्रतिदिन सुबह स्नान के लिए नदी पर जाता था। जल में उतरकर सूर्य को अर्घ देता और स्नान के उपरांत जो भी याचक उसके पास आता, उसे वह मुंहमांगी वस्तु प्रदान करता था। महाभारत युद्ध काल में इन्द्र को अपना जन्मजात कवच और कुण्डल तथा कुन्ती को उसके पांच पुत्र जीवित रहने का वचन दान स्वरूप दे दिया था। एक और प्रसंग है कर्ण की दानवीरता का। एक दिन एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं और मेरा व्रत है कि बिना हवन किए अन्न-जल ग्रहण नहीं करता हूं। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो, मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं ही होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा। युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया। संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी। तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया। लेकिन काफी दौड़- धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, कृपया मेरे साथ चलें। ब्राह्मण यह सुनकर खुश हो गए। तब कृष्ण ने अर्जुन व भीम के साथ वेष बदलकर ब्राह्मण को संग लेकर चल दिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं। याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी सूखी लकड़ी नहीं थी। ऐसे में ब्राह्मण निराश हो गया। तभी कर्ण ने कहा, हे ब्राह्मण देव! आप निराश न हों, मैं आपको सूखी लकड़ियां अवश्य दूंगा। फिर कर्ण ने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी और  ब्राह्मण से कहा कि आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए। कर्ण ने लकड़ी ब्राह्मण के घर पहुंचाने का प्रबंध भी कर दिया। ब्राह्मण कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया। कृष्ण ने पांडवों को कर्ण की दानशीलता प्रत्यक्ष दिखला दी।
    कलियुग में दानवीरता की ऐसी कथाएं बहुत कम ही मिलती हैं। श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में कलियुग की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए दान देने की भावना का ह्रास होने की बात गोस्वामी तुलसीदास इस चौपाई के माध्यम से कहते हैं -

        दम दान दया नहिं जानपनी। 
        जड़ता परबंचनताति घनी॥
        तनु पोषक नारि नरा सगरे। 
        परनिंदक जे जग मो बगरे॥
अर्थात् इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही है । मूर्खता करना और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया है। शरीर के ही पालन-पोषण में ही नर और नारी सभी लगे रहते हैं। पराई निंदा करने वाले पूरे जगत में फैले हुए हैं।
    किन्तु मध्यप्रदेश के सागर नगर का डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कलियुग के महान दानवीर सपूत डॉ. हरीसिंह गौर की दानवीरता का प्रत्यक्ष उदाहरण है। 
      डॉ. हरीसिंह गौर का जन्म 26 नवम्बर 1870 को सागर जिले के शनिचरी नामक स्थान में एक निर्धन परिवार में हुआ था। उनके पिता मानसिंह (भूरा सिंह) पहले अवध से गादपेहरा फ़ोर्ट में रहे फिर सागर आकर बस गए। भूरा सिंह ने सागर में फ़र्नीचर का व्यापार शुरु कर दिया। उनके तीन भाई, ओंकार सिंह, गणपत सिंह और आधार सिंह तथा दो बहने लीलावती और मोहनबाई थीं। उन्होंने सागर मुख्यालय में ही स्थित गवर्नमेंट हाईस्कूल से मिडिल स्तर की शिक्षा प्रथम श्रेणी में प्राप्त की थी। छात्रवृत्ति पर मिडिल से आगे की पढ़ाई के लिए वे जबलपुर गए और वहां से महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए नागपुर के हिसलप कॉलेज में दाखिला ले लिया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में की थी। वे प्रांत में प्रथम रहे तथा छात्रवृति पर ही सन् 1889 में उच्च शिक्षा लेने इंग्लैंड गए। सन् 1892 में दर्शनशास्त्र एवं अर्थशास्त्र में ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की। फिर 1896 में एम.ए., सन 1902 में एल.एल.एम. और अन्ततः सन 1908 में एल.एल.डी. की उपाधि प्राप्त की। कैम्ब्रिज में पढ़ाई से जो समय बचता था उसमें वे ट्रिनिटी कालेज में डी लिट्, तथा एल.एल.डी. की पढ़ाई करते थे। सन् 1912 में वे बैरिस्टर होकर स्वदेश आ गये। उनकी नियुक्ति सेंट्रल प्रॉविंस कमीशन में एक्स्ट्रा `सहायक आयुक्त´ के रूप में भंडारा ज़िले में हो गई। जहां से शीघ्र ही त्यागपत्र दे कर वे अखिल भारतीय स्तर पर वकालत करने लगे और मध्य प्रदेश, भंडारा, रायपुर, लाहौर, कलकत्ता, रंगून तथा चार वर्ष तक इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में वकालत करते रहे।
    सन् 1921 में केंद्रीय सरकार ने जब दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना की तब डॉ. सर हरीसिंह गौर को विश्वविद्यालय का संस्थापक कुलपति नियुक्त किया गया। उन्हें 9 जनवरी 1925 को शिक्षा के क्षेत्र में 'सर' की उपाधि से विभूषित किया गया, तत्पश्चात डॉ. सर हरीसिंह गौर को दो बार नागपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया।
     डॉ. हरीसिंह गौर को अपनी जन्मभूमि सागर में उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने की पीड़ा सदैव उनके मन को कचोटती थी। इसी कारण द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात ही इंग्लैंड से लौट कर उन्होंने स्वेच्छा से दान दे कर अपने जीवन भर की गाढ़ी कमाई से इसकी स्थापना करायी। उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से 20 लाख रुपये की धनराशि का दान दे कर लोकहित में 18 जुलाई 1946 को अपनी जन्मभूमि सागर में सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की। डॉ. गौर ने वसीयत द्वारा अपनी निजी सम्पत्ति से 2 करोड़ रुपये दान भी दिया था। डॉ हरीसिंह गौर सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक, उपकुलपति के रूप में अपने जीवन के आखिरी समय 25 दिसम्बर 1949 तक विश्वविद्यालय के विकास के प्रति संकल्पित रहे। उनका स्वप्न था कि सागर विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड जैसी मान्यता हासिल करे। सागर विश्वविद्यालय का नाम सागर के नागरिकों की मांग पर कालांतर में डॉ. गौर के नाम पर डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय रख दिया गया। 
       आज डॉ. हरीसिंह गौर की ही देन है सागर का डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, जिसकी स्थापना एक दानवीर शिक्षाविद के द्वारा स्वेच्छा से किए गए दान के द्वारा हुई है। सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ. गौर दानवीर होने के साथ ही शिक्षाशास्त्री, ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, समाज सुधारक, साहित्यकार, कवि, उपन्यासकार, न्यायविद् एवं देशभक्त थे। वे बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाशास्त्रियों में से थे। डॉ. गौर दिल्ली विश्वविद्यालय तथा नागपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति पदों को शोभायमान करने के साथ ही भारतीय संविधान सभा के उपसभापति, साइमन कमीशन के सदस्य तथा रायल सोसायटी फार लिटरेचर के फेलो भी रहे थे। डॉ. गौर ने कानून,  शिक्षा, साहित्य, समाज सुधार, संस्कृति, राष्ट्रीय आंदोलन, संविधान निर्माण आदि में भी योगदान दिया। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों में - पीनल लॉ ऑफ़ इंडिया, सेवन लाईव्ज़, लॉस्ट सोल प्रमुख हैं।
    प्रत्येक वर्ष 26 नवम्बर गौर जयंती को सागर नगर में उत्सवी माहौल रहता है। डॉ. गौर के जन्मदिन पर सागर के नागरिकों एवं विश्वविद्यालय के वर्तमान छात्रों, शिक्षकों सहित पूरी दुनिया में निवासरत सागर विश्वविद्यालय से शिक्षा अर्जित करने वाले पूर्व सभी छात्रगण डॉ. हरीसिंह गौर का स्मरण कर उनके प्रति अपनी आदरांजलि व्यक्त करते हैं।
    
और अंत में प्रस्तुत हैं कलियुग के उन महान दानवीर डॉ. हरीसिंह गौर को समर्पित मेरा यह गीत  -

हरीसिंह गौर नाम है जिनका
सबके दिल में रहते हैं
बच्चे बूढ़े गांव शहर सब 
उनकी गाथा कहते हैं…

रोक न पाई निर्धनता भी
बैरिस्टर बन ही ठहरे
उनका चिंतन उनका दर्शन
उनके भाव बहुत गहरे
ऐसे मानव सारे दुख को 
हंसते हंसते सहते हैं ...

शिक्षा ज्योति जलाने को ही
अपना सब कुछ दान दिया
इस धरती पर सरस्वती को
तन,मन,धन से मान दिया
उनकी गरिमा की लहरों में
ज्ञानदीप अब बहते हैं.. 

ऋणी सदा बुंदेली धरती
ऋणी रहेगा युवा जगत
युगों युगों तक गौर भूमि पर
शिक्षा का होगा स्वागत
ये है गौर प्रकाश कि जिसमें
अंधियारे सब ढहते हैं..

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Dr. Hari Singh Gour

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2 comments:

  1. विस्तार से प्रस्तुत किया हुआ
    उपयोगी और जानकारीपरक आलेख।

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    1. आदरणीय, हार्दिक धन्यवाद आपकी इस बहुमूल्य टिप्पणी के लिए 🙏🌺🙏

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