Friday, September 11, 2020

विचार की धुरी पर कविता | डॉ. वर्षा सिंह


कोई भी सर्जक तब तक सृजन नहीं कर सकता है जब तक कि उसमें भावनाओं का विपुल उद्वेग न हो। ये भावनाएं ही हैं जो परिस्थितियों, दृश्यों एवं संवेगों से प्रभावित होती हैं और सृजन के लिए प्रेरित करती हैं। मूर्तिकार मूर्तियां गढ़ता है, काष्ठकार काष्ठ की अनुपम वस्तुएं तराशता है और साहित्य सर्जक साहित्य की विभिन्न विधाओं में साहित्य रचता है। जीवन में अनेक तत्व हैं जो व्यक्ति को प्रभावित करते हैं- प्रेम, क्रोध, प्रतिकार, प्रतीक्षा, स्मृति, जन्म, मृत्यु, सहचार, आदि। ये तत्व मनुष्य के भीतर मनुष्यत्व को गढ़ते हैं। मनुष्यत्व मनुष्य के भीतर सभी संवेगों को जागृत रखता है। जिसके फलस्वरूप वह दूसरे के दुख में व्यथित होता है और दूसरे की प्रसन्नता में प्रफुल्लित हो उठता है। जीवन को एक उत्सव की तरह जीना भी मनुष्यत्व ही सिखाता है। साहित्य की श्रेष्ठता एवं गुणवत्ता इसी मनुष्यत्व पर टिकी होती है। वस्तुतः जीवन की समस्त चेष्टाएं दो भागों में बंटी होती हैं- स्वहित और परहित। इन दोनों के बीच मनुष्यत्व की एक बारीक सी रेखा होती है। जब यह रेखा मिट जाती है तो स्वहित और परहित एकाकार हो जाता है और यहीं मिलता है साहित्य का प्रस्थान बिन्दु। 
      दूसरे शब्दों में कहा जाए तो समष्टि और व्यष्टि का भेद मिट जाता है और व्यक्ति की भावनाएं सकल संसार के हित में विचरण करने लगती हैं तो एक श्रेष्ठ साहित्य का सृजन स्वयं होने लगता है। जब हम सकल संसार की बात करते हैं तो उसमें धर्म, जाति, वर्ग, लिंग, रंग के भेद मिट जाते हैं। धरती पर जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य समस्त सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं लैंगिक भिन्नताओं के बावजूद सिर्फ मनुष्य ही रहता है। इस यथार्थ को वही व्यक्ति महसूस कर सकता है जो माटी से जुड़ा हुआ हो, अपने अंतर्मन को तथा दूसरे के मन को भली-भांति समझ सकता हो। यूं तो यह गुण प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है किन्तु सुप्तावस्था में। साहित्य इस गुण को न केवल जागृत करता है वरन् परिष्किृत भी करता है। इसीलिए यह गुण पहले साहित्यकार को सृजन के लिए प्रेरित करता है, तदोपरांत पाठक को विचार और चिन्तन की अवस्था में पहुंचाता है।
काव्यकर्म साहित्य का सबसे कोमल कर्म है। इसमें भावानाओं का आवेग और संवेग हिलोरें लेता रहता है। इसीलिए साहित्य के क्षेत्र में प्रवृत्त होने वाले अधिकांश युवा साहित्यकार काव्य को अपनी अभिव्यक्ति एवं सृजन के पहले माध्यम के रूप में चुनते हैं। काव्य रस, छंद, लय और शाब्दिक प्रवाह के साथ आकार लेता है। इन सब में तारतम्य स्थापित करना ही काव्यकला है। जहां कला है वहां साधना तो होगी ही। इसीलिए काव्य के लिए भी साधना को आवश्यक माना गया है। काव्य मनोभावों की रसात्मक शाब्दिक अभिव्यक्ति है। जिस प्रकार एक चित्रकार दृष्य के अनुरूप रंगों को चुनता है और चित्र बनाता है, उसी प्रकार कवि मनोभावों के अनुरूप शब्दों को चुनता है और कविताएं रचता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘‘कविता क्या है?’’ शीर्षक निबन्ध में कविता को ‘जीवन की अनुभूति’ कहा है। वहीं जयशंकर प्रसाद ने सत्य की अनुभूति को कविता माना। जबकि पं. अम्बिकादत्त व्यास ने कहा कि ‘‘लोकोत्तरानंददाता प्रबंधः काव्यानाम् यातु’’ अर्थात् लोकोत्तर आनंद देने वाली रचना ही काव्य है। वस्तुतः काव्य का सीधा संबंध हृदय से होता है। काव्य में कही गईं बातें एक हृदय से उत्पन्न होती हैं और दूसरे हृदय को प्रभावित करती हैं। काव्य के दो पक्ष होते हैं - भाव पक्ष और कला पक्ष। अपनी हृदयगत भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कवि उसमें शब्द, शब्द-शक्ति, शब्द-गुण, छंद, अलंकार और गेयता जैसे कला तत्वों का सहारा लेता है जो कला पक्ष के रूप में काव्य को पूर्णता प्रदान करते हैं।

जब कोई व्यक्ति प्रेम में निमग्न होता है तब वह यही चाहता है कि उसका प्रिय उसके बारे में सोचे और उससे बातें करे। यदि बात न करना चाहे तो कम से कम संकेतों से ही अपने मनोभाव व्यक्त कर दे। ऐसे समय में कविता उसका सहारा बनती है।  श्रृंगार की लगभग सभी कविताओं में इसकी बानगी देखने को मिलती है।

Wednesday, September 9, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 15 | हमारी हिन्दी यात्रा | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आगामी हिन्दी दिवस 14 सितम्बर संदर्भित विषय पर आज पढ़िए "हमारी हिन्दी यात्रा" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 09.09.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
           हमारी हिन्दी यात्रा   
                        -डॉ. वर्षा सिंह
   
       मेरे बचपन में स्मृतियों में यह स्मृति अभी भी ताज़ा है। मध्यप्रदेश के पन्ना नगर में स्थित हमारे निवास हिरणबाग़ में हमारे पड़ोस में रहने वाले मेरे बाल मित्र अनंत शेवड़े और अजय शेवड़े खेलने जाने से पहले अपनी मां से कहा करते - 'आई, मी खेळायला जाऊ शकतो का?' 'आई, मी जातो' या 'आई, मी गो' तब मेरी समझ में नहीं आता कि ये हमारी तरह क्यों नहीं बोलते ! जो हम बोलते हैं,  ये उससे अलग क्यों बोलते हैं? तब मेरे नाना ठाकुर श्यामचरण सिंह जी, जो स्वयं भाषाविद एवं साहित्यकार थे, मुझे समझाते कि 'वे लोग महाराष्ट्रियन हैं, उनकी भाषा मराठी है इसलिए वे मराठी बोलते हैं, और हम मध्यप्रदेश के हैं हमारी भाषा हिन्दी है इसलिए हम हिन्दी बोलते हैं।' तब मैं पूछती कि उनकी और हमारी पाठ्यपुस्तकें तो एक जैसी हैं। उनमें तो हिन्दी ही है। तब नाना जी कहते कि 'चूंकि हमारे मध्यप्रदेश की राजभाषा हिन्दी है, इसलिए यहां सभी को हिन्दी में पढ़ाया जाता है।' उन दिनों भाषा संबंधी ये सारी बातें मेरी समझ में कम ही आती थीं। लेकिन धीरे-धीरे स्कूली शिक्षा ग्रहण करते हुए मैं मातृभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा में फ़र्क समझने लगी। 
      बाद के दिनों में अपने अध्ययन काल के दौरान बी.एससी. तक हिन्दी मीडियम और फिर एम.एससी. अंग्रेजी मीडियम से करने के साथ-साथ नाना जी, मामा कमल सिंह और हिन्दी की प्रतिष्ठित साहित्यकार अपनी माताजी डॉ. विद्यावती 'मालविका' के द्वारा दिए गए संस्कारों के कारण मैं भी हिन्दी में साहित्य सृजन करने लगी थी। साथ ही उर्दू, अंग्रेजी पढ़ने और बुंदेलखंड की निवासी होने के कारण आम बोलचाल में बुंदेली बोली बोलने के बावजूद हिन्दी भाषा से मुझे बेहद लगाव पहले की तरह आज भी है। मेरे लिए हर दिन हिन्दी का दिन है। जी हां, यूं तो हिन्दी 365 दिन मेरी ही नहीं वरन् हर हिन्दीभाषी, हिन्दीप्रेमी की अपनी भाषा है किन्तु प्रत्येक वर्ष सितम्बर मास में हम इसकी समग्रता का आकलन करते हुए हिन्दी मास मनाते हैं, साथ ही हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी दिवस भी।
       तो आइए पहले चर्चा करें कि आखिर भाषा किसे कहते हैं। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होती है अर्थात् भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर अथवा पढ़कर अपने मनोभावों अथवा विचारों का आदान-प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में यदि कहा जाए तो जिस साधन के द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावों को समझ सकें, उसे भाषा कहते है।
      अब बात आती है मातृभाषा, राजभाषा  और राष्ट्रभाषा में अंतर की, तो जन्म से हम जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वही हमारी मातृभाषा है। मातृभाषा के जरिए ही हमें हमारे संस्कार एवं व्यवहार का ज्ञान होता है। और जहां तक राजभाषा की बात है तो राजभाषा का शाब्दिक अर्थ है—समस्त राजकीय कार्यों में प्रयुक्त भाषा अर्थात् जन-जन की भाषा । वैसे देखा जाए तो राजभाषा एक संवैधानिक शब्द है, जिसकी परिभाषा इस प्रकार से दी जा सकती है कि - सामान्य शासन-प्रशासन, न्याय-प्रक्रिया, संसद-विधान मंडल एवं सरकारी कार्यालयों में प्रयोग हेतु संविधान द्वारा स्वीकृत भाषा एवं देवनागरी लिपि तथा भारतीय अंकों, जो कि अंतरराष्ट्रीय अंकों के रूप में मान्य हैं, का रूप ही राजभाषा है।
      जबकि राष्ट्रभाषा वह भाषा है जो एक पूरे राष्ट्र अथवा देश द्वारा समझी, बोली जाती है; तथा उस राष्ट्र की संस्कृति से संबंधित होती है। यह पूरे देश की होती है। राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद सम्पर्क के लिए आवश्यक होती है। एक राष्ट्र में समस्त राष्ट्रीय तत्वों को व्यक्त करने वाली भाषा जो राष्ट्र में भावनात्मक एकता कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हो राष्ट्रभाषा है। भारत एक ऐसा बहुभाषा-भाषी राष्ट्र है, जहां समृद्ध संस्कृति की विशाल परंपरा है, जो यहां की विभिन्न भाषाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। वस्तुतः स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा की आवश्यकता महसूस हुई। और इस आवश्यकता की पूर्ति हिंदी ने की। यही कारण है कि हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान परोक्ष रूप से राष्ट्रभाषा बनी। आज हिन्दी भाषा विश्व की तीसरी और भारत में यह सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा है। इसके मातृ भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या 50 करोड़ से भी अधिक है। यह भारत में 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक है।
        राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देश की एकता के लिए यह आवश्यक मानते थे कि अंग्रेजी का प्रभुत्व शीघ्र समाप्त हो और हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल सके। हिन्दी शब्द का सम्बंध संस्कृत शब्द सिंधु से माना जाता है। 'सिंधु' सिंध नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आस-पास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिंधु शब्द से ‘हिंदू’, हिंदी और फिर ‘हिंद’ हो गया। बाद में हिन्दी से धीरे-धीरे भारत के अधिकाधिक भागों के लोग परिचित होते गए और हिन्दी भारत की पहचान बन गई। हिन्दी विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की राजभाषा है। यह हिंदुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्दों का प्रयोग अधिक है और अरबी-फ़ारसी शब्द कम हैं। हिंदी संवैधानिक रूप से भारत की राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है।
    भाषा विद्वान यह मानते हैं कि संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है। ऋग्वेद से पहले भी संभव है कोई भाषा विद्यमान रही हो परन्तु आज तक उसका कोई लिखित रूप नहीं प्राप्त हो पाया। संस्कृत सबसे प्राचीनतम भारतीय भाषा है और क्रमानुसार संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से अवहट्ठ और अवहट्ट से प्राचीन/प्रारम्भिक हिन्दी का विकास हुआ है।
    संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा समय के साथ धीरे-धीरे परिवर्तित हो कर लगभग 500 ई.पू. के बाद तक बहुत बदल गई, जिसे ‘पाली’ कहा गया। महात्मा गौतम बुद्ध के समय में पाली लोक भाषा थी और उन्होंने पाली के माध्यम से ही अपने उपदेश दिए जो 'त्रिपिटक' में संग्रहीत हैं। संभवतः यह पाली भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही। पहली ईसवी तक आते-आते पाली भाषा और परिवर्तित हुई, तब इसे प्राकृत की संज्ञा दी गई। इसका काल पहली ई. से 500 ई. तक है। आगे चलकर, प्राकृत भाषाओं के क्षेत्रीय रूपों में अपभ्रंश भाषाएं प्रतिष्ठित हुईं। इनका समय 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है। अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यतः दो रूप मिलते है- पश्चिमी और पूर्वी। अनुमानतः 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। हिन्दी में साहित्य रचना का कार्य 1150 या इसके बाद आंरभ हुआ। कालांतर में 9 सितंबर 1850 को बनारस में जन्में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं।
      किसी भी राष्ट्र की उपलब्धियों को संग्रहित करने में राष्ट्रभाषा की महती भूमिका रहती है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क–भाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।
      समाजोत्थान के लिए समर्पित ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने लगभग दो शताब्दी पूर्व 1828 ई में कहा था कि इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है। इसी तरह 1875 ई. में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती गुजराती भाषी थे एवं गुजराती तथा संस्कृत के अच्छे जानकार थे। हिंदी का उन्हें सिर्फ़ कामचलाऊ ज्ञान था, पर अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए तथा देश की एकता को मज़बूत करने के लिए उन्होंने अपना सारा धार्मिक साहित्य हिंदी में ही लिखा। उनका कहना था कि हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। वे इस 'आर्यभाषा' को सर्वात्मना देशोन्नति का मुख्य आधार मानते थे। उन्होंने हिंदी के प्रयोग को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। वे कहते थे कि उनकी आँखें उस दिन को देखना चाहती हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लग जाएंगे।
     अरविन्द दर्शन के प्रणेता अरविन्द घोष का विचार था कि - 'लोग अपनी–अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए सामान्य भाषा के रूप में हिंदी को ग्रहण करें, तो हिन्दी सम्पर्क भाषा का दर्जा पा लेगी।'
        थियोसोफ़िकल सोसाइटी की संचालिका एनी बेसेंट ने भी हिन्दी के महत्व को व्याख्यायित किया था कि - 'भारतवर्ष के भिन्न–भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह यह कि उसका प्रचार सबसे अधिक है। वह भाषा हिंदी है। हिंदी जानने वाला आदमी सम्पूर्ण भारतवर्ष में यात्रा कर सकता है और उसे हर जगह हिंदी बोलने वाले मिल सकते हैं। भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।'
       1917 ई. में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा, 'यद्यपि मैं उन लोगों में से हूँ, जो चाहते हैं और जिनका विचार है कि हिंदी ही भारत की राजभाषा हो सकती है।' तिलक ने भारतवासियों से आग्रह किया कि वे हिंदी सीखें।
     हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने के पक्षधर लोकसभा के प्रथम उपाध्‍यक्ष एम अनंतशयनम अय्यंगर दक्षिण भारतीय एवं अहिन्दी भाषी होते हुए भी मानते थे कि - 'अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं।' 
        मेरे नाना ठाकुर श्यामचरण सिंह जी कहा करते थे कि, 'हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है। इसे जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है। अंग्रेजी की तरह इसमें कोई अक्षर साइलेंट नहीं होता। हर अक्षर की अपनी अहमियत होती है।'
     महात्मा गाँधी राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा को नितांत आवश्यक मानते थे। उनका कहना था, "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।" गाँधीजी हिंदी के प्रश्न को स्वराज का प्रश्न मानते थे— "हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।" उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सामने रखकर भाषा–समस्या पर गम्भीरता से विचार किया। 
     इसी तरह अनेक हिन्दी समर्थकों के सार्थक प्रयासों से 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। पं. गोविंदबल्लभ पंत का मानना था कि - 'हिंदी ने राजभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है।'
   आज हिन्दी समर्थकों की चर्चा करते हुए मुझे याद आ रहा है कि विद्युत विभाग की अपनी नौकरी में लेखा प्रशिक्षण के दौरान जबलपुर स्थित ट्रेनिंग सेंटर के मुख्य कक्ष में लिखे सेठ गोविन्ददास के इस सूत्रवाक्य को मैं रोज़ पढ़ा करती थी कि - 'देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है, और वह भाषा हिन्दी के अलावा अन्य कोई और नहीं हो सकती।'  और इसे पढ़ कर हिन्दी के प्रति मेरा स्नेह द्विगुणित हो उठता। सन् 1896 में जबलपुर, म.प्र. में जन्में सेठ गोविन्ददास भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सांसद तथा हिन्दी के साहित्यकार थे। उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन 1961 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। भारत की राजभाषा के रूप में हिन्दी के वे प्रबल समर्थक थे। वे सन् 1947 से 1974 तक वे जबलपुर से सांसद रहे। हिंदी के अद्वितीय सेवक सेठ गोविंद दास जब तक जीवित रहे, हिंदी के उत्थान में लगे रहे। भारत में हिंदी के उत्थान के लिए जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उनमें सेठ गोविंद दास का नाम अनन्य है। उन्होंने स्वतंत्रता के पहले और बाद में भी हिंदी के उत्थान के लिए काफी काम किया। अपने भाषणों में उन्होंने इस बात को पूरे दमखम के साथ रेखांकित किया कि हिंदी में नए शब्दों के निर्माण की स्वाभाविक क्षमता है।
        हिन्दी भारत की पहचान है। किन्तु इस तथ्य पर भी गौर करना आवश्यक है कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की भाषाओं से संबंधित है। मूल संविधान में इस अनुसूची में चौदह भाषाएं दर्ज थीं। बाद में हुए संशोधनों के आधार पर अब इस अनुसूची में बाईस भाषाएं शामिल हैं और इन 22 भारतीय भाषाओं में हिन्दी भी एक है। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा तो मिल गया है किन्तु देश की आज़ादी के बाद से 73 वर्ष की लम्बी यात्रा के बावजूद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया है।
     आइए हम दुआ करें कि हम सबकी लाड़ली इस हिन्दी भाषा को यदि राष्ट्रभाषा का भी स्थान मिले तो यह हम भारतवासियों के लिए गर्व की बात होगी। सचमुच हिन्दी अनेकता में एकता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसने जिस ख़ूबसूरती से संस्कृत, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी आदि के शब्दों को आत्मसात किया है, वह हमारे देश के मूलचरित्र को भलीभांति प्रतिबिम्बित करता है यानी अनेकता में एकता।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी ये काव्य पंक्तियां -

मिलजुल कर रहने का हरदम, 
पाठ पढ़ाती है हिन्दी।
कोई भी हो भाषा-भाषी, 
सबको भाती है हिन्दी।
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Wednesday, September 2, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 14 | मन का तिलस्म | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "मन का तिलस्म" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏

हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏

दिनांक 02.09.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-

https://yuvapravartak.com/?p=40375

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

               मन का तिलस्म

                        -डॉ. वर्षा सिंह   

     अभी पिछले दिनों की ही बात है, मेरी एक सहेली ने मुझे मेरे जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने के लिए व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल किया। शुभकामनाएं देने के बाद घर-परिवार की अन्य चर्चाएं होने लगीं। बच्चों की बात चली तो वह बताने लगी कि इस कोरोनाकाल में जबसे ऑनलाईन पढ़ाई हो रही है, बच्चों का पढ़ाई में मन ही नहीं लग रहा है। बाहर जाने की छूट नहीं मिलने के कारण घर के भीतर खेले जा सकने वाले इनडोर गेम्स में भी मन नहीं लग रहा है। फिर और चर्चाएं आगे बढ़ीं तो वह बोली कि कहीं घूमने नहीं जा पाने के कारण ख़ुद उसका और उसके पतिदेव का मन भी कहीं किसी काम में नहीं लगता है।… यानी मन न लगने की समस्या से मेरी उस सहेली का पूरा परिवार ग्रसित हो गया है।

      यह मन नहीं लगने की समस्या इन दिनों आम है। जिससे भी बात करें वह गाहे बगाहे यह ज़रूर कह उठता है कि क्या बताऊं, फलां काम में मन ही नहीं लगता। मन… आख़िर यह मन है क्या ? मेरी विचार-श्रृंखला अनजाने ही मन के तिलस्म की गुत्थी को सुलझाने की दिशा में मुड़ गई। 

      कितने ही हिन्दी फ़िल्मों के गीत अचानक याद ही मुझे याद आने लगे। फ़िल्म "काजल" का मशहूर गीत " तोरा मन दर्पण कहलाए / भले, बुरे, सारे कर्मों को देखे और दिखाए" फिल्म "चित्रलेखा" का गीत "मन रे, तू काहे न धीर धरे"  फिल्म "धूपछांह" का गीत "मन की आँखें खोल, बाबा, मन की आँखें खोल" ।

        फ़िल्मों में मन पर केंद्रित गीतों की भरमार है। हिन्दी काव्य साहित्य में कवियों द्वारा मन के लगने, न लगने सहित मन की गति पर अनेक पद्य-पंक्तियां रची गई हैं। 

रामचरित मानस, विनयपत्रिका, कवितावली, दोहावली आदि के रचयिता तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में मन की अनेक दशाओं का वर्णन किया है -

कहं लौ कहौ कुचाल कृपानिधि, जानत हों गति मन की।

तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की।

तुलसीदास का एक और चर्चित पद है- 

मन पछितैहै अवसर बीते ।

दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते ॥

सहसबाहु, दसबदन आदि नप बचे न काल बलीते।हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥

इसी प्रकार मीराबाई ने अपना मन बरसाने में लगने की बात अपने इस पद में की है -

मेरो मन लाग्यो बरसाने में जहां विराजे राधा रानी।मन हट्यो दुनियादारी से जहां मिले खारा पानी।।

संत कबीर ने भी मन लगने की बात कुछ इस तरह से की है -

मन लागो मेरो यार फकीरी में ।

जो सुख पावो राम भजन में, सो सुख नाहीं अमीरी में ॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो,

साहिब मिले सबुरी में ॥

कबीर ने मन को सर्वोपरि बताते हुए कहा है -

मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।

कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत ।

अर्थात् जीवन में जय पराजय केवल मन की भावनाएं हैं।यदि मनुष्य मन में हार गया – निराश हो गया तो  पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है। ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकते हैं – यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?

भक्त कवि सूरदास सिर्फ़ एक मन से संतुष्ट नहीं हैं, वे और अधिक मन, यथा- दस-बीस मन चाहते हैं। उद्धव और गोपियों के संवाद का सुंदर चित्रण करते हुए वे कहते हैं -

ऊधो, मन न भए दस बीस।

एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥

तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥

अर्थात् इस संवाद में गोपियां उद्धव से कहती हैं कि उनके पास तो एक ही मन है, जो कृष्ण के विचारों में डूबा है, कृष्ण को समर्पित है। अतः दूसरी ओर ध्यान भी नहीं जा सकता, पुनः निर्गुण ब्रह्म की उपासना कैसे हो ! यदि दस-बीस मन रहता, तो अन्य विषयों का भी ध्यान आता।

   मन का अपना समूचा विज्ञान है यानी मनोविज्ञान। मनोविज्ञान को अंग्रेजी भाषा में  सायकॉलजी कहते है। इस शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के साइकी तथा लोगस शब्दों से हुई है । साइकी का अर्थ है आत्मा यानी सोल और  लोगस का अर्थ है अध्ययन या विचार –विमर्श । इस प्रकार 16 वीं शताब्दी में ग्रीस नामक देश में दार्शनिकों ने इसके शाब्दिक अर्थ के अनुसार इसे ‘आत्मा का अध्ययन करने वाला विज्ञान' माना । और इसी शाब्दिक अर्थ के कारण मनोविज्ञान को ‘आत्मा का ज्ञान’ के रूप में परिभाषित किया जाने लगा। जी हां, मन शब्द का प्रयोग कई अर्थों में किया जाता है, जैसे- आत्मा, चित्त, मनोभाव, मानस, मत इत्यादि और यदि मनोविज्ञान के नज़रिए से देखा जाए तो मन का तात्पर्य आत्मन्, स्व या व्यक्तित्व से है। यह एक अमूर्त सम्प्रत्यय है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। हवा की तरह इसे न तो हम देख सकते हैं और न ही हम इसका स्पर्श कर सकते हैं । दूसरे शब्दों में मस्तिष्क के विभिन्न अंगों की प्रक्रिया का नाम मन है। 

   प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रायड के अनुसार ‘मन से तात्पर्य व्यक्तित्व के उन कारकों से होता है जिसे हम अन्तरात्मा कहते हैं तथा जो हमारे व्यक्तित्व में संगठन पैदा करके हमारे व्यवहारों को वातावरण के साथ समायोजन करने में मदद करता है।' 

       एक अन्य मनोवैज्ञानिक रेबर के अनुसार- ‘‘मन का तात्पर्य परिकल्पिक मानसिक प्रक्रियाओं एवं क्रियाओं की सम्पूर्णता से है, जो मनोवैज्ञानिक प्रदत्त व्याख्यात्मक साधनों के रूप में काम कर सकती है। 

      अत: मन की मात्र कल्पना कर सकते हैं। इसको न तो देखा जा सकता है और न ही इसका स्पर्श किया जा सकता है। मन, किसी चीज का वह व्यक्तिगत, आत्मपरक अनुभव है जो प्रतिपल परिवर्तित होता रहता है। मन की संकल्पना जटिल है और यह विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग है। बौद्ध मत में मन के लिए संस्कृत के चित्त शब्द का उपयोग होता है और इसका अर्थ अत्यंत व्यापक है। इसमें संज्ञान, धारणा, अनुभव, मूर्त एवं अमूर्त विचार, भावनाएं, सुख-दुःख की अनुभूति, ध्यान, एकाग्रता और बुद्धि इत्यादि अर्थ समाविष्ट है। जब बौद्ध मत मन का उल्लेख करता है तो इसमें सभी प्रकार की मानसिक गतिविधियां निर्दिष्ट हैं।

      बचपन में मैंने एक कहानी पढ़ी थी - एक बार की बात है। बहुत से मेंढक जंगल से जा रहे थे। उन सभी का मन आपसी बातचीत में रमा हुआ था। तभी रास्ते में एक बड़ा सा गड्ढा मिला, जिसे नहीं देख पाने के कारण उनमें से दो मेंढक उस गड्ढे में गिर पड़े। गड्ढा बहुत गहरा था।

   साथी मेंढकों ने गड्ढे में गिरे उन दो मेंढकों को आवाज लगाकर कहा कि इतने गहरे गड्ढे से बाहर निकल पाना असंभव है। इसलिए अब तुम स्वयं को मरा हुआ मान लो। लेकिन गड्ढे में गिरे हुए वे दोनों मेंढक अपने उन साथियों की बात को अनसुना करके बाहर निकलने के लिए और ज़ोर से उछल-कूद करने लगे। थोड़ी देर तक उछल-कूद करने के बाद भी जब गड्ढे से बाहर नहीं निकल पाए तो एक मेंढक ने बाहर निकलने की आशा छोड़ दी और वह गड्ढे में और नीचे की तरफ लुढ़क गया। नीचे लुढ़कते ही वह मर गया।

लेकिन दूसरे मेंढक ने कोशिश जारी रखी और अंततः पूरा जोर लगाकर एक छलांग लगाने के बाद वह गड्ढे से बाहर आ गया। जैसे ही दूसरा मेंढक गड्ढे से बाहर आया तो बाकी मेंढक साथियों ने उससे पूछा - जब हम तुम लोगों से कह रहे थे कि गड्ढे से बाहर आना संभव नहीं है तो भी तुम छलांग क्यों मारते रहे ? तब उस मेंढक ने जवाब दिया- दरअसल मैं सुनता सबकी हूं, लेकिन करता अपने मन की हूं और इसीलिए जब मैं छलांग लगा रहा था तो आप लोगों की आवाज़ों को मैंने अपने मन में इस तरह से महसूस किया मानों आप सभी मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं और बाहर आ जाओ कह रहे हैं। इसलिए मैंने कोशिश जारी रखी और इसीलिए मैं बाहर आ सका। मेरा सिद्धांत है कि सुनो सबकी, करो मन की।

      मन की आवाज़ तभी हम सुन पाते हैं जब मन को कहीं केन्द्रित करते हैं यानी किसी कार्य विशेष में मन लगाते हैं।

        ऐसी ही एक और कहानी मुझे याद आ रही है - एक जंगल में एक कौवा रहता था। वह अक्सर अन्य पक्षियों के रंगबिरंगे पंखों को देखकर अपने काले रंग के प्रति बहुत उदास हो जाता था।

      एक दिन कुछ यूं हुआ कि जिस पेड़ पर कौवा बैठा था उसी पेड़ पर बगुला भी आ बैठा। कौए को चुपचाप देख बगुले ने कौए से उसकी उदासी का कारण पूछ लिया तब कौवे ने कहा- मैं जितना काला हूं, तुम उतने ही गोरे हो। मेरे इस काले रंग के कारण मुझे कोई पसन्द नहीं करता। मेरा जीवन व्यर्थ है।

 बगुले यह सुन कर कहा- अरे, मैं तो ख़ुद अपने गोरेपन से असंतुष्ट हूं। मुझसे ज़्यादा सुंदर तो तोता है उसके पंख हरे-हरे हैं, उसके चोंच लाल है। काश, मैं भी तोते की तरह रंगबिरंगा होता। 

कौए ने ही मन में सोचा कि बगुला कह तो सही रहा है। इससे तो ज़्यादा सुंदर तोता होता है। एक दिन कौए को रास्ते में तोता मिल गया। तब कौए ने तोते से कहा कि मैं एकदम काला हूं लेकिन तुम रंगबिरंगे बहुत सुंदर हो । कौए की बात सुन कर तोता ने कौवे से कहा- इस दुनिया में  सबसे सुंदर पक्षी तो मोर है। उसके पंख कितने रंग बिरंगे और चटकीले होते हैं । उसे देख कर मैं सोचता हूं कि काश, मैं भी मोर होता। तोते की बात सुन कर कौए ने मोर से मिलने की ठानी। वह जंगल में मोर को ढूंढने लगा लेकिन पूरे जंगल में उसे कहीं भी मोर दिखाई नहीं दिया। तब किसी ने कौए को बताया कि तुम्हें यदि मोर से मिलना है तो शहर जाओ। वहां चिड़ियाघर के अंदर तुम्हें मोर मिल जाएगा। मनुष्यों ने आजकल मोर को चिड़ियाघर में रखा है।

         यह बात सुन कर  कौवा मोर से मिलने जंगल से उड़कर शहर के चिड़ियाघर में जा पहुंचा। वहां उसने देखा कि मोर एक पिंजरे में बंद है। कौए ने मोर से कहा कि - मोर भाई तुम कितनी सुंदर हो, तुम्हारे हरे-नीले पंख कितने चटकीले हैं। मैं मन ही मन बहुत दुखी रहता हूं। सोचता हूं कि काश, मैं भी मोर होता तो कितना अच्छा होता।

    कौए की बात सुनकर मोर की आंखों से आंसू आ गए। वह बोला- हां, मैं सुंदर हूं लेकिन तुम्हारी तरह आज़ाद नहीं। मैं आसमान में उड़ नहीं सकता। पिंजड़े में बंद रहता हूं । तुम आज़ाद हो। अपने मन को समझाओ और अपने रंग से संतुष्ट रहो।

       तो मित्रों, मन नहीं लगता कहने से काम नहीं चलने वाला है। यदि ख़ुश और संतुष्ट रहना चाहते हैं तो मन लगाईए। क्योंकि कहते हैं न…. मन के हारे हार है मन के जीते जीत। सारा योरोप यूनान की फौजों से संत्रस्त था। अजेय समझी जाने वाली यूनानियों की धाक उन दिनों सब देशों पर छाई हुई थी और जिस पर भी आक्रमण होता वह हिम्मत हारकर बैठ जाता और अपनी पराजय स्वीकार कर लेता। 

      रोम के सेनापति सीजर ने देखा कि इस व्यापक पराजय का कारण लोगों में मानसिक दुर्बलता, आत्महीनता ही है, जिसके कारण उन सभी ने स्वयं को दुर्बल और यूनानियों को बलवान स्वीकार कर लिया है। इस मनःस्थिति को बदला जाना चाहिए। अतः सीजर ने यह संदेश प्रसारित करवाया कि यूनानी फौजें तभी तक अजेय हैं, जब तक हम उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं। यदि अपने मन में सोच लो कि हम अजेय हैं तो कोई हमें हरा नहीं सकता। सीजर के संदेश का रोम की जनता पर जादू जैसा असर हुआ और अजेय समझा जाने वाले यूनान को रोम ने परास्त कर दिया।

    मन का तिलस्म मन पर नियंत्रण रख कर ही बूझा जा सकता है। मन को लगाईए, मन को समझाईए, ताकि आप साबित कर सकें कि आप का मन आपकी कमज़ोरी नहीं, आपकी ताक़त है।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी काव्यपंक्तियां ….

मन तिलस्म है, जब तक उसको बूझा ना जाए।

सब सम्भव है यदि मन मुश्किल से ना घबराए।

              -----------------

सागर, मध्यप्रदेश

#PostForAwareness #विचारवर्षा

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Wednesday, August 26, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 13 | अनेकता, एकता और हम | डॉ. वर्षा सिंह

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दिनांक 26.08.2020
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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

             अनेकता, एकता और हम
           
                      - डॉ. वर्षा सिंह

      हमारा देश अनेकता में एकता का परिचायक है। भले ही यहां अनेक जातियां, अनेक धर्म, अनेक भाषाएं, विभिन्न संस्कृतियां, अनेक आर्थिक - सामाजिक विषमताएं हैं किन्तु आपदा के समय सदैव सभी देशवासी एकसूत्र में बंध कर इस प्रकार राष्ट्र की एकता व अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, मानो रंगबिरंगे धागों से बुना गया वस्त्र सुदृढ़ आवरण बन कर हर परिस्थिति का मुक़ाबला करने को तत्पर हों।
      मैंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करते समय एक कथा पढ़ी थी। कभी न कभी यह कथा आप सभी ने पढ़ी होगी। किसी गांव में एक किसान था। उसके चार बेटे थे। वे सभी बहुत मेहनती और ईमानदार थे। लेकिन किसी न किसी बात पर वे आपस में झगड़ने लगते थे। समझाने पर भी वे किसी बात पर आपस में सहमत नहीं होते थे। यह सब देख किसान को बहुत दुख होता था। 
      एक बार किसान बीमार पड़ गया। बीमारी में उसे यह चिन्ता सताने लगी कि यदि उसे कुछ हो गया तो उसके बाद उसके इन चारों झगड़ालू बेटों का क्या होगा। अचानक उसे एक तरक़ीब सूझी। उसने बहुत सी लकड़ियां इकट्ठी करवाईं और उनका एक गट्ठर बनवाया। फिर किसान ने अपने चारों बेटों को बुलवाया और उन्हें बारी-बारी से वह गट्ठर तोड़ने को दिया। अपनी पूरी ताक़त लगाने के बावज़ूद कोई भी उसे नहीं तोड़ पाया। तब किसान ने उस गट्ठर को खुलवा दिया और सबको एक-एक लकड़ी उठा कर अलग-अलग तोड़ने को कहा। एक-एक लकड़ी अलग-अलग तोड़ना बहुत आसान था। देखते ही देखते सबने तत्काल गट्ठर की सारी लकड़ियां अलग-अलग उठा कर तोड़ दीं। तब किसान ने सब को समझाया कि जिस प्रकार एक रस्सी में बंधी सारी लकड़ियों को तोड़ पाना मुश्किल है, उसी प्रकार यदि आपस में लड़ना-झगड़ना छोड़ कर, तुम सब मिल-जुल कर रहोगे तो तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचा पाएगा और तुम लोग हर मुसीबत का सामना चुटकियों में कर लोगे। अलग-अलग रहना ठीक नहीं होता है। 
       यह सारी बात किसान के चारों बेटों को अच्छी तरह से समझ में आ गई और फिर सब मिल-जुल कर रहने लगे। किसान की चिन्ता दूर हुई और वह भी स्वस्थ-प्रसन्न रहने लगा। इस कथा का सार यह है कि एकता में बहुत बल होता है। 
     वस्तुतः किसी मुद्दे पर एक होने की अवस्था या भाव को ही एकता कहते हैं और उद्देश्य, विचार आदि में सभी लोगों का मिलकर एक होना ही एकता है। एक हो कर रहना अर्थात् संगठित हो कर रहना। संगठन ही सभी शक्तियों का मूल है। एकता के बिना किसी भी राष्ट्र की उन्नति सम्भव नहीं है। एकता की शक्ति का कोई मुक़ाबला नहीं है। मेरे एक सम्माननीय मित्र हैं अरविंद जैन 'रवि' जो व्यवसाय से अधिवक्ता हैं, समाजसेवी हैं और पठन-पाठन में गहन रुचि रखते हैं। उन्होंने व्हाट्सएप पर एक रोचक लघुकथा शेयर की । वह लघुकथा कुछ इस प्रकार है -
       एक बार हाथ की चारों उंगलियों और अंगूठे में आपस में झगड़ा हो गया। वे पांचों खुद को एक दूसरे से बड़ा सिद्ध करने की कोशिश में लगे थे। अंगूठे ने कहा कि मैं सबसे बड़ा हूं, उसके पास वाली उंगली ने कहा कि मैं सबसे बड़ी हूं। इसी तरह सभी उंगलियां स्वयं को एक दूसरे से बड़ा सिद्ध करने में लगी थीं। जब आपस में निर्णय नहीं हो पाया तो वे सभी अदालत पहुंचे।
       न्यायाधीश ने सारा वाक़या सुना और उन पांचों से कहा कि आप लोगों को यह सिद्ध करना होगा कि आप सभी किस तरह एक-दूसरे से बड़े हैं। तब अंगूठे ने कहा कि मैं सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा हूँ क्योंकि लोग हस्ताक्षर के स्थान पर अंगूठा-निशानी (थंबप्रिंट) के रूप में मेरा ही इस्तेमाल करते हैं। तब पास वाली उंगली बोली कि मैं तर्जनी हूं। लोग मुझे किसी इंसान की पहचान के तौर पर इस्तेमाल करते हैं और लोगों को नियंत्रित करने के लिए मेरा एक इशारा ही काफी होता है। उसके बाद वाली उंगली ने कहा कि अरे, मुझे इंच-टेप से नाप लीजिए। लम्बाई में तो मैं मध्यमा ही सबसे बड़ी हूं। उस लम्बी उंगली के बाद वाली उंगली बोल उठी कि मैं अनामिका, मैं सबसे ज़्यादा अमीर हूं क्योंकि लोग हीरे-जवाहरात, रत्न-स्वर्ण आदि की अंगूठी मुझमें ही पहनते हैं। छोटी उंगली कहलाने वाली उंगली ने कहा कि मेरा नाम कनिष्ठा है, मैं छोटी ज़रूर है, लेकिन बड़प्पन में मैं किसी से कम नहीं हूं। मेरे प्रयोग के बिना बांसुरी के सारे स्वर नहीं बज सकते हैं। इस तरह सभी ने स्वयं को बड़ा सिद्ध करने का प्रयास किया।
     न्यायाधीश ने सबकी दलीलें सुन कर एक लड्डू मंगाया और अंगूठे से कहा कि इसे उठाओ, अंगूठे ने भरपूर ज़ोर लगाया लेकिन लड्डू को नहीं उठा पाया। इसके बाद सारी उंगलियों ने एक -एक करके कोशिश की लेकिन सभी विफल रहे। अंत में न्यायाधीश ने सबको मिलकर लड्डू उठाने का आदेश दिया तो झट से सबने मिलकर लड्डू उठा लिया। फ़ैसला हो चुका था, न्यायाधीश ने फ़ैसला सुनाया कि तुम सभी एक दूसरे के बिना अधूरे हो और अकेले रहकर तुम्हारी शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है, जबकि संगठित रहकर तुम कठिन से कठिन काम आसानी से सम्पादित कर सकते हो। संगठन अर्थात् एक-दूसरे से सहयोग करने और एकता बनाए रखने में बहुत शक्ति होती है। 
     वर्तमान समय में इस कोरोनाकाल में हम सभी इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं कि एकता बनाए रखने अथवा संगठित होने के लिए शारीरिक समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि उसमें भावात्मक, मानसिक, बौद्धिक और वैचारिक निकटता की समानता आवश्यक है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भी एकता बनाए रखी जा सकती है। हम कठिन से कठिन हर परिस्थिति का मुक़ाबला एकजुटता से कर सकते हैं।

और अंत में मेरी काव्यपंक्तियां प्रस्तुत है - 

    अनेकता  में  एकता  ही हमारी  शक्ति  है,
    देशभक्ति की डगर, अलग नहीं रही कभी।
    जहां पे ”वर्षा” हो रही है, गोलियों की इन दिनों
    वहां पे अम्नो-चैन की, बजेगी बांसुरी कभी।
                ---------------
#PostForAwareness #विचारवर्षा
#युवाप्रवर्तक #अनेकता #एकता #शांति #संगठन #कोरोना #कोरोनाकाल #सोशल_डिस्टेंसिंग

Wednesday, August 19, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 12 | अनुभव का आकलन | डॉ. वर्षा सिंह

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दिनांक 19.08.2020

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
           अनुभव का आकलन
                      - डॉ. वर्षा सिंह

           अक्सर हम यह कहते, सुनते हैं कि फलां अनुभवी है, फलां नहीं है, अनुभवहीन है। तो यह अनुभव क्या है ? प्रत्यक्षज्ञान को ही अनुभव कहते हैं और अनुभव वह जानकारी है जो किसी कार्य को करने पर हमारे मस्तिष्क में स्वयंमेव एकत्रित हो जाती है और जब हम पुनः वही कार्य करते हैं तो वह अनुभव उस को करते समय हमारा मार्गदर्शन करती है। अच्छे कार्यों के अनुभव जीवन की प्रगति एवं समाजोत्थान का कार्य करते हैं जबकि बुरे कार्यों के अनुभव हमें  बुराई तथा बुरे व्यक्तियों से बचाने का कार्य करते हैं । जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान हम अपने अनुभव के आधार पर ही प्राप्त कर पाते हैं। यह अनुभव हमारे अपने हों या दूसरों के हमेशा हमें शिक्षित करने का कार्य करते हैं। अब यह और बात है कि हम अपने अथवा पराए अनुभवों से कितनी शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं।
      ज़रूरी है अनुभव का आकलन किया जाना। हम जानते हैं कि जब एक नन्हा बच्चा आग को छूने की चेष्टा करता है तो उसका हाथ जल जाता है और वह इस प्रत्यक्ष ज्ञान से यह अनुभव प्राप्त कर लेता है कि आग को छूना गलत है इसे छूने से हाथ जल जाता है वह आग से डरने लगता है । अब यह जरूरी है कि वह अपने इस अनुभव का आकलन करें कि यह आग उसे कितनी दूरी से नुकसान पहुंचा सकती है अथवा उसे आग से कितनी दूर रहना चाहिए कि वह उसे जला न सके उसे हानि न पहुंचा सके। नन्हें बच्चे में इस तरह के आकलन की क्षमता नहीं होती, यह क्षमता धीरे-धीरे विकसित होती है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है वह अपने अनुभव से जानने लगता है कि उसे किस चीज़ से दूरी बना कर रखना चाहिए और किस चीज के करीब जाना चाहिए, कौन-सी वस्तु अथवा कौन-सा कार्य उसे हानि पहुंचा सकता है या कौन सा कार्य उसके लिए उपयोगी हो सकता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है वैसे वैसे अनुभवों का दायरा भी पढ़ता जाता है और उन अनुभवों के प्रति आकलन क्षमता का भी विकास होता जाता है।
       एक तरह से देखा जाए तो जीवन की वास्तविक समझ अनुभव से पैदा होती है। हम अपनी क्षमताओं का समुचित आकलन और नियोजन अनुभव द्वारा ही कर सकते हैं। अनुभव के बिना न तो हम अपना जीवन सुगमतापूर्वक जी सकते हैं और न ही अपनी सम्पूर्ण क्षमताओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हमारी क्षमताएं हमारे भीतर सुप्त रूप में पड़ी रहती हैं। इन्हें तभी जाग्रत कर निर्दिष्ट कार्य में नियोजित किया जा सकता है, जब हम अपने अनुभवों का सही- सही आकलन करें। 
       इस संदर्भ में मैं यहां चर्चा करना चाहूंगी  घाघ और भड्डरी की, जिनकी कहावतें उनके स्वयं के अनुभवों के सही आकलन का निचोड़ हैं। उन्होंने अपने प्रत्यक्षज्ञान से जो अनुभव अर्जित किए उनका सही आकलन करने में वे एक तरह के विशेषज्ञ साबित हुए। आज भी घाघ और भड्डरी के अनुभवों के सही आकलन से उपजी कहावतों के आधार पर ग्राम्य-अंचल में खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान किया जाता है।
घाघ तथा भड्डरी द्वारा लगभग 400 वर्षों पूर्व दिया गया वैयक्तिक अनुभव के सही आकलनजन्य यह मौसम ज्ञान तथा शुभाशुभ विचार आज भी प्रासंगिक है।
      घाघ में बचपन से ही अनुभवों का सही आकलन करने की क्षमता विकसित हो गई थी। वे कृषि विषयक समस्याओं के निदान में अत्यंत दक्ष थे और दूर-दूर से लोग उनके पास अनेक समस्याओं के समाधान के लिए आया करते थे। घाघ के संबंध में यह कथा बहुत प्रचलित है कि एक बार बचपन में घाघ अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेल रहे थे। तब घाघ की विकसित आकलन क्षमताओं के बारे में सुन कर एक ऐसा व्यक्ति उनके पास आया जिसके पास कृषि कार्य के‍ लिए पर्याप्त भूमि थी, किंतु उपज उसमें इतनी कम होती थी कि उसका परिवार भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहता था। उस व्यक्ति की समस्या सुनकर घाघ तुरंत बोल उठे- 
     आधा खेत बटैया देके, ऊंची दीह किआरी।
     जो तोर लइका भूखे मरिहें, घघवे दीह गारी।।
      अर्थात् तुम अपने आधे खेत को अपने पड़ोसी को बटिया पर दे दो और अपने पास वाले हिस्से की मेंढ़ ऊंची करवा लो फिर भी यदि तुम्हारे बच्चे भूख से व्याकुल हों तो तुम मुझ घाघ को जितनी चाहो उतनी गालियां देना।
      दरअसल घाघ समझ गए थे कि उस व्यक्ति की पड़ोस में रहने वाला व्यक्ति ही उनके खेत से उनकी बोली हुई फसल में से चोरी कर लेता है जिसके कारण उस व्यक्ति के बच्चों को अच्छी उपज होने के बावजूद भूखे मरने की नौबत आ जाती है और इसीलिए घाघ ने उस व्यक्ति को यह सलाह दी कि वह अपना आधा खेत पड़ोसी को बटिया में दे दे और अपने हिस्से वाले खेत की मेड ऊंची करवा ले उनकी यह सलाह उनके अपने अनुभवों के आकलन से उपजी थी और इसीलिए वह सलाह कारगर सिद्ध हुई।
      इसी तरह घाघ की यह कहावत भी उनके अपने अनुभवों के सही आकलन से जन्मीं है- 

चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठे पन्थ असाढ़े बेल।
सावन सतुआ भादों दही, क्वार करेला कातिक मही।।
अगहन जीरा पूसे धना, माघे मिश्री फागुन चना।
इन बारह जो देय बचाय, ता घर बैद कबौं न जाय।।
     अर्थात् घाघ कहते हैं, चैत्र मास में गुड़, वैशाख में तेल, जेष्ठ मास  में यात्रा, आषाढ़ में बेल, श्रावण में सत्तू, भाद्रपद में दही, क्वांर अथवा अश्विन में करेला, कार्तिक में मट्ठा, अग्रहायण अथवा मार्गशीर्ष मास में जीरा, पौष  में धनियां, माघ में मिश्री, फागुन में चने खाना हानिप्रद होता है। यदि उपरोक्तानुसार इन वस्तुओं का सेवन करने से जो व्यक्ति बच कर रहेगा तो उसे वैद्य की कभी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

पहिले जागै पहिले सौवे। 
जो वह सोचे वही होवै।
    अर्थात् घाघ कहते हैं कि रात्रि में जल्दी सोने और प्रातःकाल जल्दी उठने से बुध्दि तीव्र होती है। अर्थात् विचार शक्ति बढ़ जाती हैै।

प्रातःकाल खटिया से उठि के पिये तुरन्ते पानी।
वाके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के  जानी।।
    अर्थात् घाघ कहते हैं कि यदि प्रातः काल बिस्तर से उठते ही पानी पिया जाए तो व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहता है और उसे डाक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
     घाघ की मौसम संबंधी ये कहावतें भी बहुप्रचलित हैं। ये कहावतें कृषि कार्यों में मार्गदर्शक का कार्य करती हैं -
     उत्तर चमकै बीजली, पूरब बहै जु बाव।
     घाघ कहै सुनु घाघिनी, बरधा भीतर लाव।।
     अर्थात् यदि उत्तर दिशा में बिजली चमकती हो और पुरवा हवा बह रही हो तो घाघ अपनी स्त्री से कहते हैं कि बैलों को घर के अंदर बांध लो, वर्षा शीघ्र होने वाली है।

सावन केरे प्रथम दिन, उवत न ‍दीखै भान।
चार महीना बरसै पानी, याको है परमान।।
     अर्थात् यदि सावन के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को आसमान में बादल छाए रहें और प्रात:काल सूर्य के दर्शन न हों तो निश्चय ही 4 महीने तक जोरदार वर्षा होगी।

आदि न बरसे अद्रा, हस्त न बरसे निदान।
कहै घाघ सुनु घाघिनी, भये किसान-पिसान।।
      अर्थात् आर्द्रा नक्षत्र के आरंभ और हस्त नक्षत्र के अंत में वर्षा न हुई तो घाघ कवि अपनी स्त्री को संबोधित करते हुए कहते हैं कि ऐसी दशा में किसान पिस जाता है अर्थात बर्बाद हो जाता है।

चमके पच्छिम उत्तर कोर। 
तब जान्यो पानी है जोर।।
     अर्थात् जब पश्चिम और उत्तर के कोने पर बिजली चमके, तब समझ लेना चाहिए कि वर्षा तेज होने वाली है।

चैत मास दसमी खड़ा, जो कहुं कोरा जाइ।
चौमासे भर बादला, भली भां‍ति बरसाइ।।
     अर्थात् चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को यदि आसमान में बादल नहीं है तो यह मान लेना चाहिए कि इस वर्ष चौमासे में बरसात अच्छी होगी।

जब बरखा चित्रा में होय। 
सगरी खेती जावै खोय।।
      अर्थात् यदि चित्रा नक्षत्र में वर्षा होती है तो संपूर्ण खेती नष्ट हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि चित्रा नक्षत्र की वर्षा ठीक नहीं होती।

उलटे गिरगिट ऊंचे चढ़ै। 
बरखा होई भूइं जल बुड़ै।।
    अर्थात् यदि गिरगिट उलटा पेड़ पर चढ़े तो वर्षा इतनी अधिक होगी कि धरती पर जल ही जल दिखेगा।

करिया बादर जीउ डरवावै। 
भूरा बादर नाचत मयूर पानी लावै।।
       अर्थात् आसमान में यदि घनघोर काले बादल छाए हैं तो तेज वर्षा का भय उत्पन्न होगा, लेकिन पानी बरसने के आसार नहीं होंगे। परंतु यदि बादल भूरे हैं व मोर थिरक उठे तो समझो पानी ‍निश्चित रूप से बरसेगा।

माघ में बादर लाल घिरै। 
तब जान्यो सांचो पथरा परै।।
      अर्थात् यदि माघ के महीने में लाल रंग के बादल दिखाई पड़ें तो ओले अवश्य गिरेंगे। तात्पर्य यह है कि यदि माघ के महीने में आसमान में लाल रंग दिखाई दे तो ओले गिरने के लक्षण हैं।

रोहनी बरसे मृग तपे, कुछ दिन आर्द्रा जाय।
कहे घाघ सुनु घाघिनी, स्वान भात नहिं खाय।।
    अर्थात् घाघ कहते हैं कि हे घाघिन! यदि रोहिणी नक्षत्र में पानी बरसे और मृगशिरा तपे और आर्द्रा के भी कुछ दिन बीत जाने पर वर्षा हो तो पैदावार इतनी अच्‍छी होगी कि कुत्ते भी भात खाते-खाते ऊब जाएंगे और भात नहीं खाएंगे।

   घाघ की भांति भड्डरी भी अपने अनुभवों का सही आकलन कर अपनी दूरदृष्टि को विकसित कर पाए। भड्डरी की मौसम के अनुमान से संबंधित अनेक कहावतें आज भी हम इस प्रकार खरी उतरते हुए देखते हैं, मानों ये कहावतें मात्र नहीं, बल्कि कोई भविष्यवाणी हों। 
     यहां भड्डरी की कुछ कहावतें प्रस्तुत हैं।

अखै तीज रोहिनी न होई। पौष, अमावस मूल न जोई।।
राखी स्रवणो हीन विचारो। कातिक पूनों कृतिका टारो।।
महि-माहीं खल बलहिं प्रकासै। कहत भड्डरी सालि बिनासै।।
       अर्थात् भड्डरी कहते हैं कि वैशाख अक्षय तृतीया को यदि रोहिणी नक्षत्र न पड़े, पौष की अमावस्या को यदि मूल नक्षत्र न पड़े, सावन की पूर्णमासी को यदि श्रवण नक्षत्र न पड़े, कार्तिक की पूर्णमासी को यदि कृत्तिका नक्षत्र न पड़े तो समझ लेना चाहिए कि धरती पर दुष्टों का बल बढ़ेगा और धान की उपज नष्ट होगी।

शुक्रवार छाए बादरी, रहे शनीचर छाय ।
ऐसा बोले भड्डरी बिन बरसे न जाय ।।
   अर्थात् भड्डरी कहते हैं कि यदि शुक्रवार के दिन आसमान में बादल छाए रहे और शनिवार को भी बादलों के छाए रहने के कारण छाया बनी रहे रविवार को निश्चित रूप से वर्षा होगी।

पांच सनीचर पांच रवि, पांच मंगर जो होय।
छत्र टूट धरनी परै, अन्न महंगो होय।। 
  अर्थात् भड्डरी कहते हैं कि यदि एक महीने में 5 शनिवार, 5 रविवार और 5 मंगलवार पड़ें तो महा अशुभ होता है। यदि ऐसा होता है तो या तो राजा का नाश होगा या अन्न महंगा होगा। 
 
सोम सुकर सुरगुरु दिवस, पूस अमावस होय।
घर-घर बजी बधाबड़ा, दु:खी न दीखै कोय।।
     अर्थात पूस की अमावस्या को यदि सोमवार, बृहस्पतिवार या शुक्रवार पड़े तो शुभ होता है और हर जगह बधाई बजेगी तथा कोई भी आदमी दु:खी नहीं रहेगा।

आषाढ़ी पूनौ दिना, गाज बीज बरसंत ।
ऐसो बोले भड्डरी, आनंद मानो संत ।।
   अर्थात् भड्डरी कहते हैं यदि आषाढ़ की पूर्णिमा को खूब बादल घिरें, गरज-चमके के साथ बारिश हो तो बरसात के चारों माहों में अच्छी बारिश होगी।

उतरे जेठ जो बोले दादूर।
कहै भड्डरी बरसे बादर।।
     अर्थात् भड्डरी कहते हैं यदि ज्येष्ठ माह के अंतिम दिनों में मेंढक बोलते हैं, तो वर्षा अवश्य होती है।
   यहां इस चर्चा का उद्देश्य यह है कि यदि हम भी अपने अनुभवों का सही आकलन करने की अपनी क्षमता को विकसित करें तो हम भी अनेक पूर्वानुमान लगा सकते हैं, अपने जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं और सिर्फ अपने ही नहीं बल्कि पूरे समाज के हित में कार्य कर समस्याग्रस्त लोगों को सही मार्गदर्शन दे सकते हैं।
    ….और अंत में मेरी यह काव्य पंक्तियां -

क्या ग़लत है क्या सही? पहचानना बेहद ज़रूरी।
अनुभवों के आकलन से सीखना बेहद ज़रूरी।
है ज़रूरी ज़िन्दगी बेहतर बनाना हर क़दम,
वक़्त की रफ्तार "वर्षा" जानना बेहद ज़रूरी।

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Wednesday, August 12, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 11| नैसर्गिक बालपन के प्रतीक हैं बाल कृष्ण | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, 🚩 जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🚩 "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "नैसर्गिक बालपन के प्रतीक हैं बाल कृष्ण" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 12.08.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

नैसर्गिक बालपन के प्रतीक हैं बाल कृष्ण
                     - डॉ. वर्षा सिंह
      
     श्रीकृष्ण की जन्मकथा से हम सभी भलीभांति परिचित हैं। लगभग साढ़े पांच हज़ार वर्ष पूर्व भाद्रपद यानी भादों मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को घोर अंधियारी आधी रात में मूसलाधार बरसात हो रही थी। कृष्ण के जन्मदाता वसुदेव और देवकी को अत्याचारी कंस ने जिस कारागार में बंद किया था, माया के प्रभाव से उस जेल के सभी प्रहरी अचानक सो गए और द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव बाल कृष्ण को सूप में रख उफनती यमुना को पार कर गोकुल पहुंचे, जहां नंद और यशोदा के घर बालक कृष्ण का लालन-पालन हुआ। शताब्दियों से प्रत्येक वर्ष भादों की यह रात्रि जन्माष्टमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गोकुलाष्टमी, सातें-आठें आदि नामों से पूरे भारत ही नहीं बल्कि विश्व के उन स्थानों पर जहां श्री कृष्ण के अनुयायी हैं, त्यौहार के रूप में उल्लास पूर्वक व्रत-पूजन किया जाता है। जगह-जगह दही हांडी, मटकी फोड़ आयोजन बड़ी धूमधाम और श्रद्धापूर्वक आयोजित किए जाते हैं। तरह-तरह के गीत गाए जाते हैं। एक बहुप्रचलित गीत मुझे याद आ रहा है - 
मैं मधुबन जाऊँ, मेरो रोवे कन्हैया।
दूध नहीं पीवे, मलाई नहीं खावे, 
माखन मिसरी को बनो रे खवइया॥ मैं मधुबन --
टोपी नहीं पहने, न गमछा ही बाँधे,
मोर मुकुट को बनो रे बँधइया॥ मैं मधुबन --
शाल नहीं ओढ़े, दुशाला भी न ओढ़े,
काली कमलिया को बनो रे उढ़इया॥ मैं मधुबन --
जामा नहीं पहने, न फेंटा ही बाँधे,
पीताम्बर को बनो रे पहरैया॥ मैं मधुबन --
खेल नहीं खेले, खिलौना नहीं लेवे,
बाँस की बन्सी को बनो रे बजइया॥ मैं मधुबन --
ललिता से न बोले, बिसाखा से न बोले,
राधारानी के पीछे, डोले रे नचइया॥ मैं मधुबन --

        इस गीत में बाल कृष्ण की नैसर्गिक लीलाओं का वर्णन है। मुझे स्मरण है मेरा बचपन… मैं और मेरे बाल मित्र, जिसमें पन्ना स्थित हमारी "हिरणबाग़" नामक कॉलोनी में हमारे पड़ोस में रहने वाली लड़कियां और लड़के दोनों थे, इसी तरह अनेक बालहठ किया करते थे। बड़ों की डांट भी खाते थे और फिर समझाइश देने पर मान भी जाते थे। हमारे नाना ठाकुर श्यामचरण सिंह जी अक्सर कहा करते थे कि "अरे, ये सब बाल-गोपाल हैं। खेलने-कूदने दो। पढ़ेंगे- लिखेंगे तो बड़े होने पर इन्हें ख़ुद समझ आ जाएगी।" …. और हुआ भी यही। हम सभी नैसर्गिक वातावरण में बाल्यकाल व्यतीत कर पढ़-लिख कर, बड़े होने पर समझदार हो गए। आज सभी समाज में अपनी एक अलग पहचान बना कर अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरी गम्भीरता से निभा रहे हैं। 
       यहां यह सब कहने का आशय यह है कि क्या वर्तमान समय में बच्चों के प्रति माता-पिता और समाज का वही दृष्टिकोण है जो हमारे बचपन के दिनों में था ? मुझे लगता है कि बिलकुल नहीं। बालकृष्ण का लालनपालन जिस नैसर्गिक वातावरण में हुआ था, वैसा वातावरण अब के बच्चों को उपलब्ध नहीं है। न रूठने का माहौल और न मनाने का किसी के पास समय, न मख्खन-मिश्री और न मोर मुकुट। अब यदि कुछ है तो ढेरों क़िताबें, कम्प्यूटर … और इस कोरोनाकाल में मोबाईल और लेपटॉप भी...। यानी पढ़ाई, पढ़ाई और सिर्फ़ पढ़ाई। फिर परीक्षा परिणाम की मेरिट सूची में पहला स्थान पाने की होड़… और फिर निरंतर दौड़ कैरियर, गाड़ी, बंगला, विदेश यात्रा आदि - आदि के लिए। ऐसा भी नहीं है कि बालसुलभ शरारतों के लिए कृष्ण को माता यशोदा की डांट न पड़ती रही हो।         
       आज के समय में एक ओर हम बाल कृष्ण की लीलाओं को पूर्ण श्रद्धा और धार्मिक भावना के साथ पढ़ते, सुनते और टीवी, फ़िल्मों आदि में देख कर आत्मिक सुख प्राप्त करते हैं। किन्तु वहीं दूसरी ओर बच्चों को माता-पिता परिवार के भविष्य से जोड़कर धन कमाने वाली मशीन के रूप में देखते- व्यवहार करते हैं।  ऐसा नहीं है कि कृष्ण को पढ़ाया-लिखाया नहीं गया। कुशाग्र बुद्धि और सर्वगुणसम्पन्न कृष्ण को भी ऋषि संदीपनी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने हेतु भेजा गया था। किन्तु दबावरहित नैसर्गिक वातावरण में गुरुकुल में रह कर शिक्षा प्राप्त करने हेतु। गुरुकुल, जहां अनुशासन के साथ ही पारिवारिक वातावरण भी मिलता था। पितातुल्य गुरु और मातातुल्य गुरु माता, ऊंचनीच के भेदभावरहित धनसम्पन्न कृष्ण के अति निर्धन सुदामा सरीखे मित्र। हां, कृष्ण भी अब मात्र धार्मिकता से जोड़ कर पूजे जाते हैं। उनका बालस्वरूप अपने बच्चों में देखना किसी को गंवारा नहीं। 
     मेरी एक रिश्तेदार आजकल जब भी फोन पर मुझसे बात करती हैं तो उनकी बातों का नब्बे प्रतिशत भाग उनके बच्चे की पढ़ाई पर केंद्रित रहता है। इन दिनों स्कूल बंद हैं। स्टडी फ्रॉम होम के कारण उनका बेटा पूरे समय उनकी आंखों के सामने रहता है। लेकिन लाड़-प्यार दूर, निगरानी भरपूर। पढ़ो, पढ़ो और पढ़ो...। अक्सर ऐसे ही दबाव के चलते बच्चे इच्छित परिक्षा परिणाम नहीं दे पाने के कारण आत्महत्या जैसा कठोर क़दम उठाने पर विवश हो जाते हैं। उनका नैसर्गिक  बालपन अनजाने में उनसे छीन लिया जाता है।  प्रत्येक माता-पिता यदि अपनी संतान को कृष्ण जैसा सर्वगुणसम्पन्न बनाने का सपना देखते हैं तो पहले उन्हें यशोदा और नंद की तरह बनना पड़ेगा। नैसर्गिक बालपन के प्रतीक बाल कृष्ण के चरित्र को जन्माष्टमी के दिन ही नहीं बल्कि प्रत्येक दिन स्मरण कर अपने जीवन में सीख लेनी चाहिए।
और अंत में मेरी ये काव्यपंक्तियां -
न कृष्ण सा चपल रहा, नहीं रहा खिलंदड़ा,
दब गया है बालपन तो कैरियर के बोझ में।
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Wednesday, August 5, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 10 | श्रीराम का नाम मात्र एक नाम नहीं | डॉ. वर्षा सिंह


       प्रिय ब्लॉग पाठकों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "श्रीराम का नाम मात्र एक नाम नहीं" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 05.08.2020

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

श्रीराम का नाम मात्र एक नाम नहीं 

                     - डॉ. वर्षा सिंह

     नाम व्यक्ति की पहचान होता है और प्रत्येक नाम का अपना एक महत्व होता है। नाम के संदर्भ में जब बात श्रीराम के नाम की आती है तो वह मात्र एक नाम नहीं है बल्कि समूचा व्यक्तित्व प्रबंधन है…और आज 5 अगस्त 2020 बुधवार को करीब 500 वर्षों के बाद राम जन्मभूमि अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन के साथ मंदिर की आधारशिला रखी जा रही है और राम मंदिर फिर से बनने जा रहा है, यह भारत के लिए न सिर्फ ऐतिहासिक बल्कि भावनात्मक रूप से सबसे बड़ा दिन है... मैं अपने ये विचार आप सबसे साझा कर रही हूं कि इस एक राम नाम में व्यक्तित्व की वह सारी खूबियां मौजूद हैं जिन्हें समझने और जानने के बाद कोई भी व्यक्ति स्वयं को परिष्कृत कर सकता है और अपने जीवन में सफलताएं अर्जित कर सकता है। अक्सर लोग श्रीराम के नाम को धर्म से जोड़ कर ही देखते हैं किंतु उनका नाम धर्म का पर्याय नहीं अपितु संपूर्ण माननीय विशेषताओं का पर्याय है।

       व्यक्तित्व प्रबंधन के लिए किन विशेषताओं की आवश्यकता होती है हम पहले इस पर गौर करेंगे। सबसे पहली विशेषता होती है आत्मविश्वास की। श्रीराम का नाम आत्मविश्वास पैदा करता है। राम कथा में ही इसका एक सुंदर उदाहरण देखा जा सकता है। जब वानर सेना भारत और लंका के बीच सेतु बनाने का प्रयास कर रही थी तो उनके द्वारा समुद्र में डाले गए सारे के सारे पाषाण डूबते जा रहे थे और सेतु बनने का नाम ही नहीं ले रहा था। सभी चिंतित थे कि सेतु कैसे बनेगा? यदि सेतु नहीं बनेगा तो वानर सेना राम सहित लंका कैसे पहुंच पाएगी और सीता जी को रावण के चंगुल से कैसे मुक्त करा पाएगी ? लेकिन इस चिंता के साथ ही उनके मन में यह विश्वास जगा कि यदि पाषाण पर श्रीराम का नाम लिखकर समुद्र में डाला जाए तो पाषाण डूबेगा  नहीं। 

"रामचरितमानस" का यह सोरठा देखें -

सुनहु भानुकुल केतु, जामवंत कर जोरि कह।

नाथ नाम तव सेतु, नर चढ़ि भव सागर तरहिं॥

     अर्थात् जाम्बवान्‌ ने हाथ जोड़कर कहा- हे सूर्यकुल की कीर्ति को बढ़ाने वाले ध्वजास्वरूप हे नाथ श्री रामजी! सबसे बड़ा सेतु तो स्वयं आपका नाम ही है, जिस पर चढ़कर अर्थात् जिसका आश्रय लेकर मनुष्य संसार रूपी समुद्र से पार हो जाते हैं।

    …. और हुआ भी यही। पाषाण पर श्रीराम का नाम लिखकर जब पत्थरों को समुद्र के पानी में डाला गया तो वह पत्थर तैरने लगे और आपस में इस तरह जुड़ते चले गए कि एक ऐसा सुदृढ़ सेतु बन गया जिस पर से होकर वानर सेना लंका तक जा सकती थी। भले ही यह अतिशयोक्ति प्रतीत हो किंतु इसके पीछे छिपा यथार्थ समझने की आवश्यकता है। यदि मन में विश्वास हो तो कोई भी कार्य असंभव नहीं है । वानर सेना  के मन में श्री राम के प्रति अटूट विश्वास था। यह श्रीराम के  नाम के प्रति विश्वास ही था जिसने उनके भीतर आत्मविश्वास जगा दिया और वे सेतु बनाने में सफल हो सके।

         आत्म प्रबंधन या व्यक्तित्व प्रबंधन के लिए दूसरी विशेषता चाहिए आज्ञाकारिता की। श्रीराम जैसा आज्ञाकारी और कोई व्यक्तित्व अनुकरणीय नहीं है। श्रीराम चाहते तो वे अपने  पिता दशरथ की आज्ञा को ठुकरा कर राजा बने रह सकते थे। सतयुग के बाद अनेक ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जब पुत्रों ने अपने पिता की आज्ञा की अवहेलना करते हुए स्वयं को राज सिंहासन पर स्थापित किया। यदि हम मुगल काल में देखें तो पिता और पुत्र के बीच टकराव का वीभत्स रूप दिखाई देता है। आगरा से अजमेर तक नंगे पांव चलकर मन्नतें मांग कर जिस पुत्र को अकबर ने पाया था वही पुत्र सलीम बड़ा होकर अपने पिता के विरुद्ध तलवार खींच कर खड़ा हो जाता है। उसका मकसद सिर्फ राजसत्ता यानी सिंहासन पाना था। इसके आगे देखें तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य दिखाई देता है जब औरंगजेब अपने पिता शाहजहां को इसलिए कारागार में बंदी बना देता है कि वह स्वयं बादशाह बन सके।  देखा जाए तो वह अपने पिता को उम्र कैद की सजा दे देता है। अब यदि तुलना करके देखें तो सम्मान और प्रतिष्ठा उस व्यक्ति के नाम को मिलती है जिसने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राजसत्ता का मोह त्याग कर 14 वर्ष के वनवास को स्वीकार किया, वहीं जिस पुत्र ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया अथवा अपने पिता को कारावास में डाल दिया उसे इतिहास में भी लांछन ही मिला। अब अच्छा और श्रेष्ठ व्यक्तित्व किसका माना जाएगा श्रीराम का या पितृहंता पुत्रों का? स्पष्ट है कि श्रीराम का ही व्यक्तित्व श्रेष्ठ कहलाएगा और एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व का नाम श्रेष्ठ आत्म निर्माण की प्रेरणा देता है । ऐसे व्यक्तित्व से सीख मिलती है कि कैसे अपने आप को उत्तम बनाया जाए।

        व्यक्तित्व प्रबंधन के लिए तीसरी विशेषता चाहिए सद्भावना की। यदि मन में दूसरों के प्रति कटुता का भाव नहीं है अपितु सद्भावना के विचार हैं तो ऐसा व्यक्ति विशाल व्यक्तित्व का कहलाएगा। यदि श्रीराम के व्यक्तित्व का आकलन किया जाए तो उनमें सद्भावना का सागर लहराता हुआ दिखाई देता है। उनके मन में अपने पिता, अपनी माता कैकई और अपने भाइयों के प्रति कटुता का भाव रंच मात्र नहीं था। उन्होंने भाई भरत को राज सत्ता देना सहर्ष स्वीकार कर लिया था। जिससे भाइयों के मध्य सदैव सद्भाव बना रहा। भरत राजसत्ता का भार ग्रहण करते हुए सिंहासन पर नहीं बैठे क्योंकि उनके सामने श्रीराम के सद्भाव का उदाहरण था। भरत ने भी श्रीराम के पद चिन्हों पर चलते हुए सद्भाव का परिचय दिया तथा श्रीराम की खड़ाऊ को सिंहासन पर रखकर राज्य किया अर्थात वह श्रीराम के प्रतिनिधि बनकर ही शासन संभालते रहे जबकि आगे चलकर द्वापर युग में हम देखें तो पाएंगे कि राजसत्ता के लिए ही भाइयों के बीच रक्त की नदियां बह गई और महाभारत का भयावह युद्ध हुआ। आज भी जमीन-जायदाद को लेकर भाइयों के बीच विवाद चलता रहता है। यह विवाद कभी कोर्ट कचहरी तक जाता है तो कभी-कभी आपसी मारपीट और हत्या तक पहुंच जाता है। यह सद्भावना की कमी के कारण होता है। यदि श्रीराम के चरित्र का अनुकरण किया जाए तो 14 वर्ष के वनवास के बाद भी राज्य शासन प्रतीक्षारत मिलता है यह बात गंभीरता से विचार करने योग्य है। सद्भावना का गुण व्यक्तित्व को उच्चता और श्रेष्ठता प्रदान करता है। अतः जब हम अपने व्यक्तित्व के प्रबंधन पर विचार करते हैं तो हमें श्रीराम के व्यक्तित्व का स्मरण करना चाहिए किसी धर्म विशेष से छोड़कर नहीं बल्कि एक श्रेष्ठतम व्यक्तित्व के रूप में, जिसने युगों-युगों तक अपने व्यक्तित्व से सभी को प्रभावित किया।

      आज के उपभोक्तावादी युग में व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरे को सबसे छोटा सिद्ध करने पर तुला रहता है, भले ही ऐसा करते हुए वह स्वयं छोटा साबित हो जाता है। जबकि देखा जाए तो इस दुनिया में न कोई बड़ा होता है और न कोई छोटा। प्रत्येक मनुष्य की अपनी अहमियत होती है। कुर्सी पर अधिकारी के रूप में बैठने वाला व्यक्ति अथवा बड़े से बड़े पद पर आसीन व्यक्ति ही बड़ा नहीं होता है वरन् बड़ा तो वह भी होता है जो छोटा काम करता प्रतीत होता है। जबकि वस्तुतः कोई काम छोटा नहीं होता है। यदि मोची जूता न बनाएं अथवा न सुधारे तो नंगे पांव घूमने की नौबत आ जाएगी। इसी प्रकार यदि कुंभकार घड़े न बनाएं, दीया न बनाएं, तो न ठंडा पानी मिलेगा और न पूजा के लिए माटी के पवित्र दीपक मिलेंगे। छोटे बड़े का भेदभाव करना ही मूर्खता है। इस तरह की मूर्खता व्यक्तित्व को छोटा बना देती है, वहीं सभी व्यक्तियों को समान समझना और उनके गुणों का सम्मान करना व्यक्तित्व को विराटता प्रदान करता है, जैसा कि हम श्री राम के व्यक्तित्व में देख सकते हैं। उन्होंने न शबरी को छोटा समझा और न वानरों को।

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। 

मानउँ एक भगति कर नाता।।

अर्थात् श्रीराम ने शबरी से कहा- हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति का ही संबंध मानता हूँ॥

      राम ने उन सभी के प्रेम और गुण को स्वीकार किया और उन्हें भी श्रेष्ठता का अनुभव होने दिया। यही तो व्यक्तित्व की श्रेष्ठता है। श्रीराम के व्यक्तित्व से इस गुण को भी आत्मसात करने की आवश्यकता है यदि हम अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं।

          श्रीराम एक वैश्विक चरित्र हैं। उन्होंने राज्य विस्तार के लिए कभी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया, लेकिन जब सीता जी का अपहरण कर लिया गया तो उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे अन्याय के विरुद्ध खड़े हो सकते हैं और अन्यायी को दंडित कर सकते हैं। वे मात्र दो भाई थे राम और लक्ष्मण जिन्होंने रावण की विशाल सेना का सामना करने का निश्चय किया और लंका पहुंचकर सीता जी को मुक्त करा लाने का निश्चय किया। जब कोई व्यक्ति अच्छे कार्य के लिए दृढ़ निश्चय से मैदान में उतरता है तो उसे समर्थक अपने आप मिल जाते हैं जैसे कि श्रीराम को संपूर्ण वानर सेना, भाल्लुक सेना और  यहां तक कि गिद्ध पक्षी से भी सहायता और समर्थन प्राप्त हुआ । यह आत्मविश्वास सभी को समान मानने का गुण ही था जिसने श्री राम को ऐसे विपरीत युद्ध में विजयश्री दिलवाई। आज जीवन में अनेक विपरीत परिस्थितियां पाई जाती हैं। बेरोजगारी सबसे बड़े विपरीत परिस्थिति है जिससे युवा अक्सर घबरा जाते हैं और निराशा में डूब जाते हैं, ऐसे युवाओं को श्रीराम के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेनी चाहिए कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हो अगर सच्चे मन से सिर्फ निश्चय के साथ डटे रहा जाए तो सफलता एक न एक दिन अवश्य मिलती है।

          तात्पर्य यह है कि श्रीराम का नाम मात्र एक नाम नहीं है जिसे भजन के रूप में गा कर, सुबह-शाम स्मरण कर अपने व्यक्तित्व को विकसित मान लिया जाए। यदि व्यक्तित्व को समुचित विकास करना है, वर्तमान जीवन में सफलताएं प्राप्त करनी हैं तो श्रीराम के व्यक्तित्व के गुणों को आत्मसात करके स्वयं के व्यक्तित्व प्रबंधन को निखारना चाहिए।

और अंत में मेरा यह दोहा -

राम नाम के मर्म को, यदि समझें हम-आप।

बैर, क्लेष, कुण्ठा मिटे, मिटे सकल संताप ।।

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