Wednesday, November 18, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 25 | अहिंसा, परहित और शबरी | डॉ. वर्षा सिंह
Wednesday, November 11, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 24 | दीपावली, स्वच्छता और हम | डॉ. वर्षा सिंह
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हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏दिनांक 11.11.2020
बुधवारीय स्तम्भ : विचारवर्षा
दीपावली, स्वच्छता और हम
-डॉ. वर्षा सिंह
इन दिनों लगभग हर जगह… गली- मुहल्ले, घर-द्वार में साफ-सफाई, रंगाई-पुताई का काम चल रहा है। दीपावली त्यौहार ही ऐसा है कि देवी लक्ष्मी के स्वागतार्थ प्रत्येक व्यक्ति सफाईपसंद हो उठता है। यदि धन की देवी लक्ष्मी के स्वागत हेतु घर की आर्थिक स्थिति अधिक धन खर्च करने की अनुमति नहीं देती हो, पूरे घर की पुताई कराना दुःसाध्य कार्य हो तब भी पूजा का कमरा, रसोई घर, आंगन-द्वार की साफ-सफाई तो भली-भांति कर ही ली जाती है। दरअसल चौमासे यानी बरसात के चार महीने - आषाढ़, सावन, भादों और क्वांर झेल चुकने के बाद कार्तिक आते-आते अच्छे-ख़ासे घर भी रंग-रोगन, साफ-सफाई मांगने लगते हैं। ख़ास तौर पर निम्न और मध्यमवर्गीय घरों में मकड़ियां घर के कोनों पर अड्डा जमा कर जाले पूरने में ज़रा भी कोताही नहीं बरततीं। ज़मीन से सीलन निकलने की कोशिश करती है तो छत पर पानी के नन्हें-मुन्ने धब्बे एक अलग तरह का लैंडस्केप तैयार कर देते हैं। इन घरों की मज़बूरी हो जाती कि साल भर के सबसे बड़े त्यौहार पर घरों की दशा सुधरवाएं। उच्चवर्गीय मकानों, बंगलों, कोठियों में तो दीपावली पर धन-सम्पदा का प्रदर्शन भरपूर होता ही है। कुछ भी कहिए कि इसमें दो राय नहीं कि दीपावली के बहाने अप्रत्यक्ष यानी परोक्ष रूप से स्वच्छता मिशन अभियान को सफल बनाने की एक अनकही मुहिम छिड़ जाती है। यूं तो प्राचीन समय से ही भारत स्वच्छता पसंद देश रहा है, किन्तु जनसंख्या और शहरीकरण में लगातार बढ़ोत्तरी के कारण भारत में लाख प्रचार-प्रसार के बावजूद स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूकता सुस्त दिखाई देती है।
स्वतंत्र भारत में स्वच्छता का संचार करने हेतु महात्मा गांधी ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी स्वच्छता है। यदि कोई व्यक्ति स्वच्छ नहीं है तो वह स्वस्थ नहीं रह सकता है। बेहतर साफ-सफाई से ही भारत के गांवों को आदर्श बनाया जा सकता है। हमें अपने शौचालय को अपने ड्रॉइंगरूम की तरह साफ रखना ज़रूरी है। नदियों को साफ रखकर हम अपनी सभ्यता को जिंदा रख सकते हैं। स्वच्छता को अपने आचरण में इस तरह अपनाया जाना चाहिए कि स्वच्छता हमारी आदत बन जाए।
दुख की बात यह है कि महात्मा गांधी के ये विचार क़िताबों में सिमट कर रह गए। स्वतंत्र भारत में चहुंओर स्वच्छता की भावना से लोगों का सरोकार घटता चला गया। यत्र-तत्र कचरा फैलाना, पान-तम्बाकू का सेवन कर कहीं भी थूकना, मल-मूत्र त्याग के लिए निश्चित स्थान का उपयोग नहीं करना, नदियों-तालाबों का गंदगी प्रवाहित करने वाले नालों के रूप में इस्तेमाल करना तो आम बात हो गई साथ ही फैक्ट्रियों से निकलने वाले ज़हरीले धुएं, पराली जलाने से उत्पन्न वायुप्रदूषण आदि के कारण "स्वच्छताप्रिय भारत" पॉल्यूटेड इंडिया" में तब्दील हो गया।
स्वच्छता के मामले में विदेशों की तुलना में भारत का पिछड़ता ही चला गया। तब यहां स्वच्छता अभियान की आवश्यकता महसूस की गई। उसी के तहत स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत भारतीय जनमानस में सुप्त स्वच्छता प्रेम को जगाने की कोशिश की गई। वैश्विक परिदृश्य में स्वच्छता के मामले में भारत की निरंतर बिगड़ती छवि में सुधार के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी की 145 जयंती पर 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की। इसके लिए प्रधानमंत्री ने पांच वर्षों का लक्ष्य रखा ताकि 2 अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक महात्मा गांधी की ‘स्वच्छ भारत’ की परिकल्पना साकार हो सके। यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि स्वच्छ भारत निर्माण के लिए हवा, पानी, ज़मीन सबकी स्वच्छता ज़रूरी है। यह स्वच्छता जीवन के लिए भी ज़रूरी है।
हवा यानी वायु में जीवनदायिनी शक्ति है। इसलिए, इसकी स्वच्छता जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। स्वच्छता का सीधा संबंध स्वास्थ्य से है और स्वास्थ्य जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। वेदों में वायु का शुद्धता पर बल देते हुए कहा गया है कि जीवन के लिए शुद्ध एवं प्रदूषण रहित वायु अति आवश्यक है -
वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे
इसी प्रकार जल जीवन का प्रमुख तत्त्व है। इसकी स्वच्छता के बिना सभी निर्रथक है। ऋग्वेद में जल की विशेषता बताते हुए कहा गया है कि -
अप्सु अन्तः अमृतं, अप्सु भेषजं
अर्थात्, जल में अमृत है, जल में औषधि-गुण विद्यमान रहते हैं।
अथर्ववेद में पानी की शुद्धता को स्वस्थ जीवन के लिए नितान्त आवश्यक माना गया है -
शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु
अर्थात् शुद्ध जल के अभाव में जीवन नष्ट हो जाता है।
रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने राम के निर्मल उदात्त चरित्र की उपमा हेतु निर्मल जल को चुना। बालकाण्ड की ये चौपाईयां देखें -
लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥
प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥
अर्थात् सगुण लीला का जो विस्तार से वर्णन करते हैं, वही राम सुयश रूपी जल की निर्मलता है, जो मल का नाश करती है और जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुंदर शीतलता है।
सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥
मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥
भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥
अर्थात् राम सुयशरूपी जल हैं जो सत्कर्मरूपी धान के लिए हितकर हैं और राम के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वी पर गिरा और सिमटकर सुहावने कानरूपी मार्ग से चला और मानस अर्थात् हृदयरूपी श्रेष्ठ स्थान में भरकर वहीं स्थिर हो गया। वही पुराना होकर सुंदर, रुचिकर, शीतल और सुखदाई हो गया।
हमारे देश में गंगा का जल सबसे पवित्र माना जाता है। रामचरित मानस की इस चौपाई का यही मर्म है -
गंग सकल मुद मंगल मूला।
सब सुख करनि हरनि सब सूला॥
अर्थात् गंगा समस्त आनंद-मंगलों की मूल है। वह सब सुख देने और सब दुख हरने वाली है।
इसीलिए राम स्वयं गंगा को प्रणाम करते हैं -
उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु विसैषी।।
किन्तु वर्तमान में गंगा का जल भी शुद्ध नहीं रहा है। "नमामि गंगे" परियोजना के माध्यम से गंगा का पानी साफ़ करने मुहिम ज़ारी है। वर्ष 2014 में केंद्र सरकार द्वारा इस परियोजना की शुरुआत गंगा नदी के प्रदूषण को कम करने तथा गंगा नदी को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से की गई थी। परिणाम अभी भी प्रतीक्षित हैं।
पानी, हवा, वातावरण की स्वच्छता के साथ ही अंतःकरण की स्वच्छता यानी आंतरिक शुद्घि भी आवश्यक है, जो विवेक से उत्पन्न होती है और विवेक धर्म, आध्यात्म और चिन्तन के माध्यम से आता है। बाह्य स्वच्छता के समान ही अंतःकरण की शुद्घता भी महत्वपूर्ण है। सभी के प्रति प्रेम, सम्मान और परोपकार का भाव रख कर स्वयं का अंतःकरण स्वच्छ किया जा सकता है। परपीड़ा, परनिंदा, हिंसा के भाव स्वयं के अंतःकरण को दूषित बना देते हैं। रामचरितमानस की यह चौपाई परनिंदा करने वाले मनुष्यों के प्रति प्रहार करती है -
सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥
अर्थात् जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं।
दीपावली पर्व की तैयारी में अपना घर-द्वार चमकाते समय अक्सर लोग भूल जाते हैं कि अपना अंतःकरण भी स्वच्छ रखें तभी देवी लक्ष्मी प्रसन्न हो कर आतिथ्य स्वीकार करेंगी। बचपन में मैंने संस्कृत पाठ में उज्जैयिनी के यशस्वी राजा विक्रमादित्य की एक कहानी पढ़ी थी। वह कुछ इस प्रकार थी - विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा के कल्याणार्थ एक निमय बनाया था कि बाज़ार में जो भी वस्तु दिन भर में बगैर बिके रह जायगी शाम को उसे राजा क्रय कर लेंगे ताकि विक्रेता को हानि नहीं उठानी पड़े। राज्य के एक शिल्पकार ने लक्ष्मी और अलक्ष्मी दोनों की मूर्तियां बनायीं और उन्हें बाज़ार में बेचने बैठ गया। ज़ाहिर है लक्ष्मी की मूर्ति ऊंचे दाम पर बिक गई लेकिन अलक्ष्मी की मूर्ति के लिए कोई ख़रीददार नहीं मिला। शाम को नियमानुसार बिना बिकी सामग्रियों के साथ अलक्ष्मी की वह मूर्ति भी राजा विक्रमादित्य के महल में पहुंचा दी गई। रात्रि में जब राजा विक्रमादित्य सोए तो अचानक रात्रि के दूसरे पहर में ही उनकी नींद किसी की आहट से खुल गई। राजा ने देखा कि एक सुंदर स्त्री महल से बाहर जा रही है। राजा ने पूछा तो उसने उत्तर दिया कि वह विद्या की देवी सरस्वती है। महल में अलक्ष्मी के आ जाने के कारण वह महल छोड़ कर जा रही है। राजा ने सरस्वती को नहीं रोका। फिर थोड़ी देर बाद एक और सुंदर स्त्री महल से बाहर जा रही है। राजा ने उससे भी पूछा तो उसने उत्तर दिया कि वह धन की देवी लक्ष्मी है। महल में दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी के आ जाने के कारण वह अब वहां नहीं रह सकती। अतः महल छोड़ कर जा रही है। राजा ने लक्ष्मी को भी नहीं रोका।
इसी तरह अन्य देवी- देवतागण भी अलक्ष्मी के आगमन से रुष्ट हो कर अपना परिचय देते हुए महल से चले गए। राजा ने किसी को नहीं रोका।
अंत में श्वेत वस्त्रधारी एक दिव्य पुरुष जब महल से जाने लगा और राजा द्वारा पूछने पर उसने कहा कि "मैं धर्म हूं। चूंकि महल में अभाग्य, अकाल और दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी का वास हो गया है अतः मैं भी यहां से जा रहा हूं।'' इस दफ़ा राजा ने उस पुरुष के पैर पकड़ लिए और उससे महल में ही रहने की विनती करने लगा। धर्म ने चकित हो कर पूछा कि "राजन, जब अन्य सभी देवी-देवता कूच कर गए तब तो तुमने किसी को नहीं रोका। मुझे ही क्यों रोक रहे हो ?"
राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया कि "हे धर्म, यदि आप मेरे साथ हैं तो मुझे किसी की परवाह नहीं, लेकिन यदि आपने मेरा साथ छोड़ दिया तो मेरा जीवन व्यर्थ है। बिना धर्म के बुद्धि, विवेक, धन-सम्पदा, राज्य-सत्ता सब व्यर्थ है। मैंने राजधर्म के पालन करते हुए ही बिना बिकी वस्तु के रूप में अलक्ष्मी को महल में स्थान दिया है। अर्थात मैंने आपका पालन किया, इसलिये आप महल छोड़ कर मत जाएं।"
विक्रमादित्य की राजधर्म का पालन करने वाली बात का मर्म समझ कर धर्म वापस महल में लौट आया और उसने वचन दिया कि वह विक्रमादित्य को छोड़ कर कभी नहीं जाएगा। इसके बाद विक्रमादित्य ने देखा कि वे सभी देवी-देवता एक-एक कर महल में वापस लौट कर आ रहे हैं जो महल छोड़ कर चले गए थे। राजा ने उनसे उनकी वापसी का कारण पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि "जहां धर्म का वास होगा वहां हमें तो वास करना ही पड़ेगा। धर्म को छोड़ कर हम नहीं जा सकते।"
धर्म अंतःकरण की स्वच्छता के लिए ज़रूरी है। बाह्य और आंतरिक वातावरण - जहां दोनों स्वच्छ रहते हैं वहां लक्ष्मी स्वयंमेव निवास करती हैं।
आईए, इस दीपावली पर हम संकल्प लें कि सिर्फ़ दीपोत्सव पर ही नहीं बल्कि हम पूरे वर्ष भर भीतर-बाहर से स्वयं स्वच्छ रहकर देश को स्वच्छ बनाए रखेंगे। और तब स्वच्छता के लिए किसी सरकारी मिशन, योजना, परियोजना की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
और अंत में प्रस्तुत है मेरी ये काव्यपंक्तियां -
स्वच्छता के दीप की न रोशनी कभी हो कम
पास अपने आ सके कभी नहीं ज़रा भी तम
मान हो, सम्मान हो, भय न हो किसी का भी
हंसी-ख़ुशी रहें सभी, न हो किसी की आंख नम
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Wednesday, November 4, 2020
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बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 19 | जीवन में मंथराओं की कमी नहीं | डॉ. वर्षा सिंह
जीवन में मंथराओं की कमी नहीं
- डॉ. वर्षा सिंह
मुझे आज अचानक एक पुराना वाकया याद आ गया। उन दिनों मैं विद्युत विभाग के जिस कार्यालय में पदस्थ थी, वहां मैं शिकायत कक्ष की प्रभारी थी। तब कुछ शासकीय योजनाओं को संचालित करने के लिए कार्यालय में नोडल अधिकारियों की संविदा नियुक्तियां हुई थीं। उनमें से एक अधिकारी द्वारा अन्यत्र नियमित नौकरी पर जाने और नोडल अधिकारी के पद से इस्तीफा देने के कारण एक पद रिक्त हो गया था। मेरे कार्यालय प्रमुख ने मुझे उस पद पर कार्य करने के संबंध में पूछा, जिसे मैंने मना कर दिया। मना करने के दो कारण थे एक तो शिकायत कक्ष का मेरा कार्य सुचारु रूप से चल रहा था, दूसरे मैं जानती थी कि नोडल अधिकारी के उस रिक्त पद पर कल को ऊपर से कोई दूसरा अधिकारी नियुक्त कर दिया जाएगा और मुझे अनावश्यक डिस्टर्ब होना पड़ेगा।
मेरे द्वारा मना करने वाली बात जब मेरे एक असिस्टेंट को पता चली, तो वह बहुत विचलित हो उठा। कहने लगा - मैडम जी, आपने मना करके अच्छा नहीं किया। आपको बड़े साहब से 'हां' कह देना चाहिए था।
'लेकिन क्यों ? जब मैं वह सेक्शन नहीं लेना चाहती हूं तो साफ़ क्यों न बताऊं ? फिर अपना ये कम्प्लेंट सेक्शन अच्छा है।' मैंने कहा था।
तब मेरा वह असिस्टेंट मुझे समझाने लगा था - 'अरे मैडम जी, यहां तो वही पुराना फर्नीचर है। टेबिल क्लॉथ वाली पुरानी टेबल, बाबाआदम के ज़माने का गोल कंप्यूटर मॉनिटर, सड़ियल की-बोर्ड और ये टूटी-फूटी कुर्सियां.. इनकी कीलों में रोज़ कपड़े फटते हैं। जबकि वहां नोडल अधिकारी के चैम्बर में सारा फर्नीचर एकदम नया है.. गोदरेज कंपनी का। एलसीडी डिस्प्ले वाला नया कंप्यूटर मॉनिटर है। अपने यहां कूलर है, वहां एसी है।'
एक बारगी मुझे भी लगा कि इसकी बात में दम तो है। फ़र्नीचर से ले कर स्टेशनरी और कम्प्यूटर तक सभी एकदम पुराने और बेहद ऊबाऊ हैं।
तभी मेरे असिस्टेंट ने अपनी बात आगे बढ़ाई - 'उस सीट पर सप्लायर भी आते हैं। अपने को चाय-पानी के लिए अपने वॉलेट खाली नहीं करने पड़ेंगे। मैडम जी, आप सीनियर भी हैं । साहब से कह दीजिए कि आपको नोडल अधिकारी बना दें। अभी भी समय है, साहब ने अभी और किसी को वह सीट नहीं ऑफर की है।'
मुझे उसकी यह बात खटकी। मैंने अपने विवेक से काम लेते हुए अपने उस असिस्टेंट को उल्टा समझाया ऐसे लालच में कभी नहीं फंसना चाहिए, अपनी कमाई की चाय ज़्यादा अच्छी होती है। ग़लत ढंग से की गई कमाई कभी न कभी ज़रूर धोखा देती है।
और फिर उस घटना के दो माह बाद …. जैसाकि ऑलरेडी इस्टीमेटेड था मेरे सेक्शन का भी रिनोवेशन हो गया। पूर्वयोजनानुसार सारा फर्नीचर बदल दिया गया। एलसीडी डिस्प्ले वाला नया कंप्यूटर आ गया। कूलर हटा कर एसी लगा दिए गए। यदि मैं उस समय अपने उस असिस्टेंट की बातों में आ कर नोडल अधिकारी का प्रभार ले लेती तो बहुत बड़ी टेंशन में फंस जाती। मेरा असिस्टेंट अपनी ऊपरी कमाई के लालच में मुझे मेरा लाभ दिखा कर मुझे भी कलंकित कर सकता था।
आज मैंं चिंतन करती हूं तो मुझे लगता है कि ऐसे सलाहकारों और रामकथा की मंथरा दासी में शायद ज़्यादा फ़र्क़ नहीं… रामकथा में दासी मंथरा ने अपनी रानी कैकेयी को जो सुझाव दिए थे वे उसकी दृष्टि में रानी कैकेयी और उसके पुत्र भरत के लिए तो लाभप्रद थे ही, उससे कहीं अधिक स्वयं मंथरा के लिए लाभकारी थे। भरत राजा बनते तो कैकेयी राजमाता और मंथरा राजमाता की ख़ास सेविका। दूर का निशाना मगर सही दिशा में एक ग़लत मंसूबे के साथ। अकसर लोग यह भूल जाते हैं कि ग़लत- सही के बीच की रेखा को मिटा कर बढ़ाए गए क़दम ठोकर ज़रूर खाते हैं।
महाराजा दशरथ की तीन रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी में कैकेयी अधिक सुंदर, युद्ध संचालन में योग्य थी। एक बार राजा दशरथ के साथ युद्ध मैदान में गई कैकेयी ने रथ के पहिए की कील निकलने पर कील के स्थान पर अपनी उंगली लगा कर राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी। तब दशरथ ने प्रसन्न हो कर कैकेयी से दो वरदान मांगने को कहा था। कैकेयी ने वे वरदान उसी समय नहीं मांगे थे, बल्कि बाद में कभी अन्य समय लेने का कह कर दशरथ को वचनबद्ध कर लिया था।
कालांतर में दशरथ ने जब अपने ज्येष्ठ पुत्र राम के राज्याभिषेक की बात की तो अपने स्वार्थ की पूर्ति को ध्यान में रख कर कैकेयी की अंतरंग दासी मन्थरा ने आकर कैकयी को यह समाचार सुनाया। यह सुनकर कैकयी आनंद में डूब गयी और समाचार सुनाने के बदले में मंथरा को अपना एक आभूषण भेंट किया। वाल्मीकि रामायण के अनुसार -
इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम् ।
एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूय: करोमि ते ।।
रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये ।
तस्मात्तुुष्टस्मि यद्राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ।।
न मे परं किञ्चिदितो वरं पुन: प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोऽमृतम् ।
तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरं वरं परं ते प्रदादामि तं वृणु ।।
(वाल्मीकि रामायण २ । ७। ३४-३६)
अर्थात् मन्थरे ! तूने मुझको यह बड़ा ही प्रिय संवाद सुनाया है, इसके बदले मैं तेरा और क्या उपकार करूं? यद्यपि भरत को राज्य देने की बात हुई थी, फिर भी राम और भरत में मैं कोई भेद नहीं देखती । मैं इस बात से बहुत प्रसन्न हूँ कि महाराज कल राम का राज्याभिषेक करेंगे । हे प्रियवादिनी ! राम के राज्याभिषेक का संवाद सुनने से बढ़ कर मुझे अन्य कुछ भी प्रिय नहीं है । ऐसा अमृत के समान सुखप्रद वचन सब नहीं सुना सकते । तूने यह वचन सुनाया है, इसके लिये तू जो चाहे सो पुरस्कार मांग ले ,मैं तुझे देती हूँ।
किन्तु मंथरा ने वह आभूषण एक ओर फेंक दिया और कैकयी को अनेक उदाहरण दे कर अपना मंतव्य प्रकट करते हुए भांति-भांति से समझाया। फिर भी कैकयी मंथरा की बात नहीं मानकर कहती है कि यह तो रघुकुल की रीत है कि ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य संभालता है और मैं कैसे अपने पुत्र के बारे में सोचूं? राम तो सभी के प्रिय हैं।
यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघव: । कौसल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु ।।
राज्यं यदि हि रामस्य भरतस्यापि तत्तदा ।
मन्यते हि यथाऽऽत्मानं तथा भ्रातॄन्स्तु राघव: ।।
(वाल्मीकि रामायण २। ८। १८ -१९)
अर्थात् मुझे भरत जितना प्यारा है, उससे कहीं अधिक प्यारे राम है , क्योंकि राम मेरी सेवा कौशल्या से भी अधिक करते है । रामको यदि राज्य मिलता है तो वह भरत को ही मिलता है, ऐसा समझना चाहिये, क्यों कि राम सब भाइयों को अपने ही समान समझते है ।
इस पर जब मन्थरा महाराज दशरथ की निन्दा करके कैकेयी को फिर भड़काने लगी, तब तो कैकेयी ने बड़ी बुरी तरह उसे फटकार दिया –
ईदृशी यदि रामे च बुद्धिस्तव समागता ।
जिह्वायाश्छेदनं चैंव कर्तव्यं तव पापिनि ।।
तब मंथरा ने तरह-तरह के दृष्टान्त सुना कर केकैयी से अपनी बात मनवा ही ली। अंततः कैकयी ने मंथरा की सारी बातें मान लीं और कोप भवन में जाकर राजा दशरथ को अपने दो वरदानों की याद दिलाई। राजा दशरथ ने कहा कि ठीक है वरदान मांग लो। तब कैकेयी ने अपने वरदान के रूप में राम का वनवास और भरत के लिए राज्य मांग लिया। यह वरदान सुनकर राजा दशरथ मानसिक रूप से आहत हो गए, चूंकि वे वचनबद्ध थे अतः वचनों से विमुख होना संभव नहीं था।
'रामचरितमानस' के अयोध्याकांड में भी तुलसीदास ने लिखा है कि मंथरा दासी के कहने पर ही राम के राज्याभिषेक होने के अवसर पर कैकेयी की मति मारी गयी और पुत्र भरत के राजतिलक की चकाचौंध भरी कल्पना में डूब कर उसने राजा दशरथ से दो वरदान मांगे। पहले वर में उसने भरत का राज्याभिषेक और दूसरे वर में भरत की राजगद्दी को निष्कंटक बनाने के कुटिल उद्देश्य से राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांग लिया।
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि।
अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।
अर्थात् मन्थरा नाम की कैकेई की एक मंदबुद्धि दासी थी, उसे अपयश की पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धि को फेरकर चली गईं।
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।
कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।
अर्थात् इस तरह करोड़ों कुटिलपन की बातें गढ़-छोलकर मन्थरा ने कैकेयी को उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतों की कहानियां इस प्रकार सुना दीं कि कैकेयी का मन विचलित हो उठा।
परिणाम से सभी अवगत ही हैं। जहां एक ओर दशरथ शोकाकुल हो मृत्युशैय्या पर पहुंच गए। आज्ञाकारी राम वनगमन कर गए। भरत यह अनर्थ स्वीकार न कर राम की चरणपादुका के सेवक बन अयोध्या की सुरक्षा करते रहे। राम के साथ उनकी अर्धांगिनी सीता भी वनवासरत हो गईं जहां से लंकापति रावण ने उन्हें अपहृत कर लिया। … वहीं दूसरी ओर कैकेयी को वैधव्य और कलंकित नारी का तमगा हाथ लगा। मंथरा तो दासी थी, दासी रही। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ा।
रामचरितमानस में तुलसीदास ने दासी मंथरा की ओर से यह चौपाई लिखी है -
कोउ नृप होइ हमैं का हानी ।
चेरि छाड़ि अब होब की रानी।।
अर्थात् - मुझे कोई लेना-देना नहीं, मैं तो दासी की दासी ही रहूंगी। रानी जी, आप सोचिए कि आप का क्या होगा।
तो क्या मंथरा ने निःस्वार्थ भावना से सुझाव दिया था। नहीं… ऐसा नहीं था। मंथरा का स्वयं का स्वार्थ निहित था उसकी इस चाल में। वह जानती थी कि भरत के राजा बनने पर कैकेयी राजमाता बन जाएंगी और मंथरा कैकेयी की निकटस्थ होने के कारण अयोध्या की प्रभावशाली महिला बन जाएगी।
रामकथा के इस प्रसंग का मर्म यही है कि चाहे कोई कितना भी सगा व्यक्ति क्यों न हो, उसके सुझाव पर स्वयं चिंतन किए बिना उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। वर्तमान समय में 'मंथराओं' की कमी नहीं है। शुभचिंतक बन कर हमारी निजी ज़िन्दगी में सेंध लगाने वाले 'मंथरा' रूपी व्यक्ति बहुत घातक होते हैं। इन्हें पहचानना बहुत ज़रूरी है। हमारे जीवन में अनेक ऐसे अवसर आते हैं जब हमारे निकटस्थ लोग हमारे हितरक्षक बन कर हमें हमारा लाभ दिखा कर तरह-तरह की समझाइश देते हैं। किन्तु सुझाव के अमल में लाए जाने से होने वाले लाभ और हानि का स्वयं चिंतन करना बहुत ज़रूरी होता है। यदि परिणाम से ज़्यादा दुष्परिणाम की आशंका नज़र आए तो कभी स्वयं 'कैकेयी' नहीं बने और किसी भी 'मंथरा' की सलाह को अमल में न लाएं।
और अंत में प्रस्तुत है मेरा यह दोहा -
अंतर्मन के खोल कर रखिए सारे द्वार ।
हर पहलू पर गौर से पूरा करें विचार।।
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दिनांक 07.10.2020
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Wednesday, September 30, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 18 | ग्लैमराइज्ड कैकेयी | डॉ. वर्षा सिंह
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दिनांक 30.09.2020
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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
ग्लैमराइज्ड कैकेयी
- डॉ. वर्षा सिंह
भक्त ध्रुव की कथा में ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद, माता सुनीति और सौतेली माता का नाम सुरुचि का ज़िक्र आता है। कथा का महत्वपूर्ण भाग यह है कि राजा उत्तानपाद एक दिन राज सिंहासन पर बैठे थे। उनकी गोदी में ध्रुव का सौतेला भाई अर्थात् सौतेली माता सुरुचि का पुत्र बैठा था। ध्रुव ने भी राजा की गोदी में बैठने की ज़िद की। रानी सुरुचि ने ध्रुव को रोक दिया और कहा, ‘‘मेरा पुत्र ही राजा की गोद में बैठने का अधिकारी है, क्योंकि वह तुमसे अधिक योग्य है।’’ बालक ध्रुव बड़ा ही स्वाभिमानी था। सौतेली मां की दुत्कार से आहत हो कर बालक ध्रुव ने प्रतिज्ञा की, कि ‘मैं दूसरों के द्वारा दिए गए स्थान को ग्रहण नहीं करूंगा। मैं परिश्रम और तपस्या से अपना स्थान स्वयं बनाऊंगा तथा ऐसा स्थान प्राप्त करूंगा जो किसी और ने आज तक प्राप्त नहीं किया होगा।' ध्रुव की प्रतिज्ञा सुन कर माता सुनीति ने उसे ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का मंत्र दिया। बालक ध्रुव ने इस मंत्र का जाप करते हुए घोर तपस्या की। ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। ध्रुव ने कहा- हे प्रभु! मुझे ऐसा पद दीजिए जो सभी पदों से ऊंचा हो। जो अपना अलग महत्व रखता हो तथा जिस पद पर आज तक कोई विराजमान न हुआ हो। विष्णु ने उसे आकाश में उत्तर दिशा में समस्त तारागणों, नक्षत्रों के बीच सर्वोच्च स्थान दिया। वह ‘ध्रुव तारा’ बन कर अमर हुआ। ध्रुव तारे को सब तारों में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है। ध्रुव का नाम आज भी जितने सम्मानपूर्वक लिया जाता है जबकि उसकी विमाता सुरुचि का नाम लेते हुए घृणा के भाव मन में उत्पन्न हो जाते हैं।
यह तो थी सतयुग के भक्त ध्रुव की कथा, जिसमें सौतेली मां द्वारा अपनी सगी संतान के मोह में सौतेली संतान को अपमानित किया गया था। इसी प्रकार की एक कथा है त्रेतायुग के राजा राम की। रामकथा में राम को चौदह वर्ष का वनवास इसलिए झेलना पड़ा क्योंकि उनकी सौतेली माता कैकेयी ने अपने सगे पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनवाने के उद्देश्य से राम के पिता और कैकेयी के वचनबद्ध राजा दशरथ से वचनपूर्ति में राम का वनवास और भरत का राजतिलक मांग लिया था।
राजा दशरथ की तीन रानियां थीं- कौशल नरेश सुकौशल की पुत्री कौशल्या, कैकय नरेश अश्वपति की पुत्री कैकयी और काशी नरेश की पुत्री सुमित्रा। राजा दशरथ की इन तीन रानियों में से कैकेयी विवाह से पहले महर्षि दुर्वासा की सेवा किया करती थी। कैकेयी की सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा ने कैकेयी का एक हाथ वज्र का बना दिया। कालांतर में कैकेयी का विवाह राजा दशरथ से हो गया। उधर स्वर्ग में देवासुर संग्राम आरंभ हो गया। देवराज इंद्र ने राजा दशरथ को सहायता के लिए बुलाया। युद्ध कौशल में निपुण रानी कैकेयी भी दशरथ की रक्षा के लिए सारथी बनकर देवासुर संग्राम में पहुंच गईं। युद्ध के दौरान अचानक दशरथ के रथ के पहिए से कील निकल गई और रथ लड़खड़ाने लगा। कैकेयी ने कील के स्थान पर अपनी उंगली लगा दी, जिससे राजा दशरथ के प्राण बच गए। राजा दशरथ कैकेयी की वीरता और साहस से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कैकेयी से उसकी कोई दो मनोकामना पूर्ति करने को कहा। लेकिन कैकेयी ने वे दोनों मनोकामनाएं बाद में कभी किसी समय पूर्ति का वचन ले कर उस समय वह प्रकरण टाल दिया। बाद में कौशल्यापुत्र राम के राज्याभिषेक के समय कैकेयी की अंतरंग दासी मंथरा ने जब उन दो वचनों की पूर्ति का स्मरण दिलाते हुए भरत की भावी सुरक्षा के विषय में समझाया तो अपने हित-अहित का विचार किए बिना एक मां के हृदय ने मंथरा का सुझाव मान कर दोनों मनोकामनाएं पूर्ति हेतु दशरथ से कह दिया। कैकेयी ने दशरथ को इस वचन की बात याद दिलाकर कौशल्यापुत्र राम को चौदह वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत का राज्याभिषेक मांग लिया।
दशरथ वचनबद्ध थे। किन्तु राम के प्रति यह घोर अन्याय वे सहन नहीं कर पाए और यह वचनपूर्ति उनके प्राणों के उत्सर्ग का करण बन गई। दशरथ ने वचन तो पूरे कर दिए लेकिन उसके बाद शोकग्रस्त हो कर वे जीवित नहीं रह पाए। आज्ञाकारी, संस्कारी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम पिता की आज्ञा का पालन और माता कैकेयी की इच्छा का सम्मान करते हुए वन गमन कर गए। कैकेयीपुत्र भरत अपने बड़े भाई राम के प्रति अटूट स्नेह और गहरा आदरभाव रखते थे। उन्हें जब यह सब ज्ञात हुआ तो माता कैकेयी के इस कृत्य पर रोष प्रकट करते हुए उन्होंने राज्याभिषेक से मना कर दिया और राम के वनगमन के पश्चात राम की चरणपादुका अयोध्या ला कर उसे सिंहासनारूढ़ करके स्वयं एक सेवक की भांति चौदह वर्ष व्यतीत कर दिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने कैकेयी के जीवन को लांछित कर दिया। दासी मंथरा के सुझाव पर अमल करके पुत्रप्रेम के स्वार्थवश कैकेयी ऐसी दो मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कोपभवन में जा बैठी थी, जिसने उसके जीवन को ही कलंकित कर दिया। दशरथ जैसे स्नेहवान पति को सदैव के लिए खो कर विधवा नारी के रूप में मिला कैकेयी का जीवन, सगे पुत्र भरत से भी तिरस्कृत हुआ। रामायण के नारी पात्रों में कैकेयी का स्मरण घृणा और तिरस्कार के साथ किया जाता है। कोई भी व्यक्ति अपनी पुत्री का नाम कैकेयी रखना उचित नहीं समझता।
आदिकवि वाल्मीकि ने संस्कृत में लिखे गए 'रामायण' महाकाव्य में कैकेयी को एक ऐसी स्त्री के रूप में उल्लेखित किया है जो अपनी अनुचित मांग की पूर्ति कराने हेतु क्रोधाग्नि से तिलमिलाती हुई कोप- भवन में प्रविष्ट हो कर सम्पूर्ण अयोध्या को शोक- संतप्त बना देती है। वाल्मीकि रामायण की परम्परा में लिखे गये काव्यों और नाटकों में कैकेयी को राम-वनवास के लिए दोषी ठहराया गया है। असहिष्णु, कलंकिनी आदि अनेक सम्बोधनों का प्रयोग कर कैकेयी की निन्दा की गयी है।
'रामचरित मानस' में तुलसीदास ने अयोध्याकांड के अंतर्गत कैकेयी के पात्र को अन्त तक एकान्त- नीरव, भयावह एवं ग्लानियुक्त बनाए रखा है। कैकेयी की दैहिक सुंदरता उसके कुकृत्यों के समक्ष गौण हो गई। तुलसीदास ने अयोध्यावासियों के मुँह से उनके लिए 'पापिन' 'कलंकिनी' आदि अनेक सम्बोधनों का प्रयोग कर कैकेयी के कृत्य की भर्त्सना की है, साथ ही भरत की माता कैकेयी के प्रति रुष्टता को इस चौपाई के माध्यम से व्यक्त किया है -
कैकेई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे॥
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।
अर्थात् भरत कहते हैं कि कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करने वाले ये पामर प्राण पूरी तरह से अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं, तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा।
भरत यह भी कहते हैं कि -
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू॥
अर्थात् मेरी माता की कुमति ही पापों का मूल है। उसने हमारे हित का बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठ का कुयंत्र बनाया और चौदह वर्ष की अवधिरूपी कठिन कुमंत्र पढ़कर उस यंत्र को गाड़ दिया।
हालांकि उदात्त चरित्र के स्वामी राम ने कभी माता कैकेयी को गलत नहीं कहा। साथ ही जब भरत ने अपनी माता को कटु वचन कहे तो राम ने उन्हें रोका भी।
हमारे रामकथा सहित अनेक ग्रंथों में उन स्त्रियों को निंदनीय माना गया है और बुरी स्त्रियों के रूप में उल्लेखित किया गया है जो अपनी सगी संतानों से मोह में अपनी सौतेली संतानों के प्रति अन्याय एवं षडयंत्र करती हैं। यह इसलिए कि स्त्रियां इन कथाओं से शिक्षा ग्रहण करें, स्वयं को निंदा का कारण न बनाएं और अपने सौतेली संतानों के प्रति भी दया और ममता का भाव रखें।
किन्तु वर्तमान समय में हमारे टीवी सीरियल्स में सौतेली माताओं के चरित्र को ग्लैमराइज करके षडयंत्रों से लैस, कुटिल चालों की एक्सपर्ट के रूप में महिमामंडित किया जाता है। जिसका स्त्रियों पर ग़लत असर पड़ता है। स्वार्थपरता, निष्ठुरता, मोहांधता के दुर्गुणों से लैस खलनायिका के रूप में प्रस्तुत विमाताओं के चरित्र से प्रभावित हो कर अनेक स्त्रियां "कैकेयी" बनती जा रही हैं।
यदि टीवी सीरियल्स में ऐसी स्त्रियों को ग्लैमराइज नहीं किया जाए और सिर्फ़ एपीसोड की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से उनकी घूर्तताओं को बढ़ा-चढ़ा कर न दिखाया जाए तो वह बेहतर होगा। सीढ़ी पर तेल डालकर परिवारजन को गिराने, गीज़र से बिजली के नंगे तार जोड़ कर घातक दुर्घटना को अंजाम देने सरीखे आसान नुस्खे किसी की भी ज़िन्दगी पर भारी पड़ सकते हैं। इसलिए वास्तविक ज़िन्दगी से कैकेयी के रोल को छोटा करके कौशल्या के रोल को बढ़ाना होगा।
और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी ये काव्य पंक्तियां....
उचित और अनुचित में जिसको भेद न करना आया।
मिले न उसको राम जगत में, मिली न उसको माया।
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