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Wednesday, November 18, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 25 | अहिंसा, परहित और शबरी | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "अहिंसा, परहित और शबरी" ...अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 18.11.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-

    बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

        अहिंसा, परहित और शबरी

                                -डॉ. वर्षा सिंह

        मेरे स्कूली दिनों में हिन्दी विषय के अंतर्गत कुछ ख़ास विषयों पर हमसे निबन्ध लेखन कराया जाता था। जैसे - साहित्य समाज का दर्पण है, मेरे प्रिय साहित्यकार, मेरे प्रिय कवि, परहित सरिस धरम नहिं भाई, विज्ञान वरदान है या अभिशाप, विद्यार्थी और अनुशासन, जनसंख्या नियंत्रण आदि-आदि। 
      उन दिनों विषय के अनुरूप प्रस्तावना से प्रारंभ हो कर निष्कर्ष तक के एक निश्चित फ्रेम में 150- 200 शब्दों में लिखे गए निबन्ध परीक्षा उत्तीर्ण करने के उद्देश्य से तैयार किए जाते थे। 
      आज विचार करने पर मैं यह पाती हूं कि इन तमाम विषयों में से "परहित सरिस धरम नहिं भाई" पंक्ति मनुष्य की धार्मिक प्रवृत्ति से कहीं अधिक मानवीय प्रवृत्ति से संबद्घ है। यह पंक्ति रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड की है। जिसमें राम अपने अनुज भरत की विनती पर साधु और असाधु का भेद बताने के बाद कहते हैं कि -
परहित सरिस धरम नहिं भाई
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।
निर्नय सकल पुरान बेद कर। 
कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।।
      अर्थात् परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम कर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं। समस्त पुराणों और वेदों का यही निर्णय अर्थात् आशय है जो मैंने तुमसे कहा है और इस बात को सभी पण्डित लोग जानते हैं।

     शिव ने हलाहल विष का पान कर दिव्य शक्ति से अपने कण्ठ में इसीलिए स्थित किया ताकि सम्पूर्ण विश्व उस विष के प्रभाव से नष्ट नहीं हो। शिव की कल्याणकारी भावना परहित का पर्याय है।
शिवमहिम्न स्तोत्र का यह स्तोत्र देखें -
अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा-
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो।
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भंग-व्यसनिनः।। 
      अर्थात् जब समुद्रमंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नों के साथ महाभयानक विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकता था। हे शिव, आपने बड़ी कृपा करके उस विष का पान किया। विषपान करने से आपके कंठ में नीला चिन्ह हो गया और आप नीलकंठ कहलाये। परंतु हे प्रभु, क्या ये आपको कुरुप बनाता है ? कदापि नहीं, ये तो आपकी शोभा को और बढ़ाता है। जो व्यक्ति औरों के दुःख दूर करता है उसमें अगर कोई विकार भी हो तो वो पूजा पात्र बन जाता है।

     सचमुच यह जगज़ाहिर बात है कि परोपकार की भावना ही वास्तव में मानव को मानव बनाती है। मानवता का भाव वही है जब कोई मानव किसी व्यक्ति, प्राणी, समाज, देश की निःस्वार्थ भाव से सहायता करे। ‘स्व’ के संकीर्ण दायरे से निकलकर ‘पर’ के उदात्त धरातल पर खड़ा मानव निःस्वार्थ भाव से जनकल्याण के कार्य करता है। हम सभी जानते हैं कि अभी पिछले दिनों कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए किये गए लॉकडाउन के दौर में अपने घर- गांव से बाहर फंसे प्रवासी मजदूरों को घर भेजने की व्यवस्था करने वाले बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद ने इसी मानवता का परिचय दिया। वे वर्तमान में भी प्रवासी मज़दूरों के हितरक्षण के प्रति जागरूक हैं।
यजुर्वेद में लिखा है -
 मित्रस्याहं भक्षुसा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।।
      अर्थात्, सभी प्राणियों के प्रति सहृदयता का परिचय देना ही जीवन का सही लक्षण है। 

    जैन धर्म की बुनियाद ही अहिंसा और परमार्थ पर आधारित है। जैन ग्रंथों में तीर्थंकर देव नेमीनाथ का वृत्तांत कुछ इस प्रकार मिलता है कि द्वापरयुग में नेमीनाथ मूक पशुओं के वध से क्षुब्ध होकर गिरनार पर्वत पर चले गए थे। वहां कठोर तप के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और मोक्ष के साथ वे तीर्थंकर कहलाए। नेमिनाथ जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में से बाईसवें तीर्थंकर थे। नेमिनाथ का जन्म सौरीपुर, द्वारका के हरिवंश कुल में श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को चित्रा नक्षत्र में हुआ था। उनकी माता का नाम शिवा देवी और पिता का नाम राजा समुद्रविजय था। जैन धर्म-ग्रंथों की प्राचीन अनुश्रुतियों के अनुसार नेमिनाथ का विवाह मथुरा के राजा उग्रसेन की पुत्री राजुलमती से तय किया गया था। विवाह हेतु जब नेमिनाथ मथुरा पहुंचे तो वहाँ उन्होंने एक बाड़े में क्रंदन करते कई पशुओं को देखा। ये सारे पशु बारातियों के भोजन हेतु मारे जाने वाले थे। यह देखकर नेमिनाथ का हृदय करुणा से व्याकुल हो उठा, उन्हें लगा कि उनके विवाह के लिए इतने पशुओं का वध किया जाएगा तो ऐसे विवाह से तो ब्रह्मचर्य जीवन ही उत्तम है। ऐसे विचार आते ही नेमिनाथ के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे विवाह का विचार छोड़कर तपस्या को चले गए। नेमिनाथ ने सौरीपुर में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को दीक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद 54 दिनों तक कठोर तप करने के बाद गिरनार पर्वत पर 'मेषश्रृंग वृक्ष' के नीचे अमावस्या को 'कैवल्य ज्ञान' को प्राप्त किया। 70 साल तक साधक जीवन जीने के बाद आषाढ़ शुक्ल की अष्टमी को नेमिनाथ ने एक हज़ार साधुओं के साथ गिरनार पर्वत पर निर्वाण को प्राप्त किया। बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ को जैन धर्म में श्रीकृष्ण के समकालीन और उनका चचेरा भाई माना जाता है। 
      ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब हिंसा के विरुद्ध, परहितरक्षण हेतु व्यक्ति उठ खड़े हुए और उन्होंने हिंसा का विरोध किया। त्रेतायुग में शबरी को ही लीजिए, वही महान भक्त शबरी जो राम को जूठे बेर खिलाए जाने हेतु जानी जाती है। इस प्रसंग के अलावा शबरी की जीवनकथा के उस अंश से बहुत कम व्यक्ति परिचित हैं, जिसमें शबरी ने भी विवाहोत्सव में होने वाले पशुओं का वध रोकने के उद्देश्य से गृहत्याग कर दिया था। शबरी भील जनजाति के राजा की इकलौती पुत्री थी। शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा था। विवाहयोग्य होने पर शबरी का विवाह एक भील कुमार से तय किया गया था। विवाह से पहले सैकड़ों बकरे-भैंसे आदि पशु बलि के लिए लाये गए थे। जिन्हें देख शबरी को बहुत मानसिक पीड़ा हुई। उसे लगा कि यह कैसा विवाह है जिसके लिए इतने सारे पशुओं की हत्या की जाएगी। मन ही मन दृढ़ निश्चय करके वह कन्या शबरी विवाह के एक दिन पहले गृह त्याग कर दंडकारण्य चली गई। वहां ऋषि मतंग ने शबरी को अपने आश्रम शरणदे कर अपनी शिष्या स्वीकार किया। अनुश्रुति है कि अन्य ऋषियों ने इसका भारी विरोध किया।  गृहत्याग कर आई भील कन्या भला ऋषि आश्रम में कैसे रह सकती है! किन्तु मतंग ऋषि ने शबरी को पितृवत् संरक्षण दे कर अपने आश्रम में जीवनपर्यंत आश्रय दिया। 
        ऋषि मतंग जब इहलीला समाप्त कर स्वर्ग लोक जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखे। परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं। उनके लिए कोई व्यक्ति उच्च या निम्न जाति का नहीं है। उनके लिए सब समान हैं। फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन विष्णु के अवतार राम इस आश्रम में अवश्य आएंगे और उनके दर्शन से शबरी को मोक्ष की प्राप्ति होगी। ऋषि मतंग के स्वर्गारोहण के बाद शबरी ईश्वर भजन में लगी रही और धैर्यपूर्वक राम के आगमन की प्रतीक्षा करती रही…. और एक दिन श्रीराम उसके आश्रम के द्वार पर आए।
           वनवास के दौरान जब सीता का हरण लंकापति रावण ने कर लिया, तब व्याकुल राम और लक्ष्मण सीता की खोज में मतंग मुनि के आश्रम तक आ पहुंचे। जहां उन्हें ज्ञात हुआ कि आश्रम में मतंग मुनि की शिष्या शबरी नामक एक वृद्ध स्त्री अपने गुरु की आज्ञा से अपने कुटिया में कई वर्षों से राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है।
      लक्ष्मण सहित राम जब वहां पहुँचे तो भाव विभोर होकर शबरी ने राम का सत्कार किया। रामचरित मानस के अरण्यकाण्ड में तुलसीदास कहते हैं -
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।
    अर्थात् शबरी ने राम को घर में आए देखा, तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया।

सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
अर्थात् कमल सदृश नेत्र और विशाल भुजाओं वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किए हुए सुंदर, साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरी लिपट पड़ी।

प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।
 अर्थात् शबरी प्रेम में मग्न हो गई, मुख से वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही है, फिर उसने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोए और फिर उन्हें सुंदर आसनों पर बैठाया।

तब उदात्त हृदय के धनी, करुणा के साक्षात स्वरूप राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया। भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है - 
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे।।
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।
 अर्थात् हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है।

        शबरी यह सुन कर धन्य हो गयी। उसकी भक्ति और विश्वास उसके इष्टदेव राम को उसके द्वार तक खींच लाया। फिर शबरी ने मीठे फलों से राम का सत्कार किया और सीता की खोज के लिए सुग्रीव तथा हनुमान के बारे में अवगत करा कर उन्हें उनसे मिलने का मार्ग बताया। तत्पश्चात् शबरी राम के आदेशानुसार मृत्युलोक को छोड़ कर मोक्षगति प्राप्त कर स्वर्ग चली गयी।

      वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में शबरी को श्रमणी कहा गया है -
तामुवाच ततो राम: श्रमणीं धार्मसंस्थिताम्।।
      उसी अरण्यकांड में शबरी को सिद्धा भी कहा है। अर्थात् अपनी आध्यात्मिक एकाग्रता से, अपने विश्वास और अपनी भक्ति के चरमोत्कर्ष पर पहुंच कर शबरी ने अपने इष्टदेव के दर्शन कर लिए।

रामचरितमानस में भी कहा गया है -
कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,
मानहु एक भगति कर नाता।
   अर्थात् राम ने कहा की हे भामिनी सुनो, मैं केवल प्रेम का नाता ही मानता हूं। परिवार, जाति का मेरे लिए कोई महत्व नहीं है।

बुंदेली लोकगीत में भी शबरी की गाथा का बहुत सुंदर चित्रण मिलता है -

प्रेम बिबस भगवान, शबरी घर आये,
लम्बी-लम्बी झाडू शबरी डगर बटोरी,
एई डगरिया आये राम, शबरी घर आये। प्रेम...
कुश की चटइया शबरी झाड़ बिछाई,
आसन लगाये भगवान, शबरी घर आये। प्रेम...
काठ की मटकिया शबरी जल भर ल्याई,
चरण पखारूं मैं भगवान, शबरी घर आये। प्रेम...
मीठी-मीठी बेर शबरी दौना भर ल्याई,
भोग लगावे भगवान, शबरी घर आये। प्रेम...
तुलसीदास आस रघुबर की,
शिव री बैकुण्ठ पठाये, शबरी घर आये। प्रेम…

    आज भी "माता शबरी का आश्रम" के नाम से प्रसिद्ध स्थल छत्तीसगढ़ के शिवरीनारायण में शिवरीनारायण मंदिर परिसर में स्थित है। शिवरीनारायण छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा ज़िले में आता है। यह बिलासपुर से 64 और रायपुर से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस स्थान को पहले शबरी के नाम पर शबरीनारायण कहा जाता था जो बाद में शिवरीनारायण के रूप में पहचाना जाने लगा। महानदी, जोंक और शिवनाथ नदी के तट पर स्थित यह मंदिर एवं आश्रम प्रकृति के सुंदर दृष्यों से परिपूर्ण हैं।

      विवाह कर गृहस्थ जीवन का सुख-भोग करने के बजाए परहित के लिए, प्राणियों की जीवनरक्षा के लिए जहां एक ओर जैन तीर्थंकर नेमिनाथ ने गिरनार पर्वत पर जा कर कठोर तपस्या कर लोककल्याण में जीवन अर्पित किया तो वहीं दूसरी ओर रामकथा की श्रमणी शबरी ने एक कन्या होते हुए भी गृहत्याग का निर्णय कर वनगमन किया और मतंग ऋषि के आश्रम में तपस्विनी का जीवन व्यतीत करना अधिक श्रेयस्कर समझा।
     विरले ही मनुष्य ऐसे मिलते हैं जो अपने जीवन में "परहित सरिस धरम नहिं भाई" को चरितार्थ करते हैं ….और इसीलिए वे सदैव पूज्यनीय, स्मरणीय और अनुकरणीय होते हैं।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी ये काव्यपंक्तियां -

सीख अगर देता है कोई, तो क्या स्वयं निभाता है ?
सही मायने में वह ज्ञानी, जिसने कर्मों में ढाला ।

"वर्षा" वे जन पूजनीय हैं जो परहित के लिए जिए,
शिव ने गले लगाया हंस कर विष से भरा हुआ प्याला ।

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Wednesday, November 11, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 24 | दीपावली, स्वच्छता और हम | डॉ. वर्षा सिंह



प्रिय ब्लॉग पाठकों,  "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "दीपावली, स्वच्छता और हम" ...अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏

हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏दिनांक 11.11.2020

बुधवारीय स्तम्भ : विचारवर्षा

      दीपावली, स्वच्छता और हम

                          -डॉ. वर्षा सिंह

      इन दिनों लगभग हर जगह… गली- मुहल्ले, घर-द्वार में साफ-सफाई, रंगाई-पुताई का काम चल रहा है। दीपावली त्यौहार ही ऐसा है कि देवी लक्ष्मी के स्वागतार्थ प्रत्येक व्यक्ति सफाईपसंद हो उठता है। यदि धन की देवी लक्ष्मी के स्वागत हेतु घर की आर्थिक स्थिति अधिक धन खर्च करने की अनुमति नहीं देती हो, पूरे घर की पुताई कराना दुःसाध्य कार्य हो तब भी पूजा का कमरा, रसोई घर, आंगन-द्वार की साफ-सफाई तो भली-भांति कर ही ली जाती है। दरअसल चौमासे यानी बरसात के चार महीने - आषाढ़, सावन, भादों और क्वांर झेल चुकने के बाद कार्तिक आते-आते अच्छे-ख़ासे घर भी रंग-रोगन, साफ-सफाई मांगने लगते हैं। ख़ास तौर पर निम्न और मध्यमवर्गीय घरों में मकड़ियां घर के कोनों पर अड्डा जमा कर जाले पूरने में ज़रा भी कोताही नहीं बरततीं। ज़मीन से सीलन निकलने की कोशिश करती है तो छत पर पानी के नन्हें-मुन्ने धब्बे एक अलग तरह का लैंडस्केप तैयार कर देते हैं। इन घरों की मज़बूरी हो जाती कि साल भर के सबसे बड़े त्यौहार पर घरों की दशा सुधरवाएं। उच्चवर्गीय मकानों, बंगलों, कोठियों में तो दीपावली पर धन-सम्पदा का प्रदर्शन भरपूर होता ही है। कुछ भी कहिए कि इसमें दो राय नहीं कि दीपावली के बहाने अप्रत्यक्ष यानी परोक्ष रूप से स्वच्छता मिशन अभियान को सफल बनाने की एक अनकही मुहिम छिड़ जाती है। यूं तो प्राचीन समय से ही भारत स्वच्छता पसंद देश रहा है, किन्तु जनसंख्या और शहरीकरण में लगातार बढ़ोत्तरी के कारण भारत में लाख प्रचार-प्रसार के बावजूद स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूकता सुस्त दिखाई देती है। 

      स्वतंत्र भारत में स्वच्छता का संचार करने हेतु महात्मा गांधी ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी स्वच्छता है। यदि कोई व्यक्ति स्वच्छ नहीं है तो वह स्वस्थ नहीं रह सकता है। बेहतर साफ-सफाई से ही भारत के गांवों को आदर्श बनाया जा सकता है। हमें अपने शौचालय को अपने ड्रॉइंगरूम की तरह साफ रखना ज़रूरी है। नदियों को साफ रखकर हम अपनी सभ्यता को जिंदा रख सकते हैं। स्वच्छता को अपने आचरण में इस तरह अपनाया जाना चाहिए कि स्वच्छता हमारी आदत बन जाए।

    दुख की बात यह है कि महात्मा गांधी के ये विचार क़िताबों में सिमट कर रह गए। स्वतंत्र भारत में चहुंओर स्वच्छता की भावना से लोगों का सरोकार घटता चला गया। यत्र-तत्र कचरा फैलाना, पान-तम्बाकू का सेवन कर कहीं भी थूकना, मल-मूत्र त्याग के लिए निश्चित स्थान का उपयोग नहीं करना, नदियों-तालाबों का गंदगी प्रवाहित करने वाले नालों के रूप में इस्तेमाल करना तो आम बात हो गई साथ ही फैक्ट्रियों से निकलने वाले ज़हरीले धुएं, पराली जलाने से उत्पन्न वायुप्रदूषण आदि के कारण "स्वच्छताप्रिय भारत" पॉल्यूटेड इंडिया" में तब्दील हो गया। 

       स्वच्छता के मामले में विदेशों की तुलना में भारत का पिछड़ता ही चला गया। तब यहां स्वच्छता अभियान की आवश्यकता महसूस की गई। उसी के तहत स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत भारतीय जनमानस में सुप्त स्वच्छता प्रेम को जगाने की कोशिश की गई। वैश्विक परिदृश्य में स्वच्छता के मामले में भारत की निरंतर बिगड़ती छवि में सुधार के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी की 145 जयंती पर 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की। इसके लिए प्रधानमंत्री ने पांच वर्षों का लक्ष्य रखा ताकि 2 अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक महात्मा गांधी की ‘स्वच्छ भारत’ की परिकल्पना साकार हो सके। यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि स्वच्छ भारत निर्माण के लिए हवा, पानी, ज़मीन सबकी स्वच्छता ज़रूरी है। यह स्वच्छता जीवन के लिए भी ज़रूरी है।

      हवा यानी वायु में जीवनदायिनी शक्ति है। इसलिए, इसकी स्वच्छता जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। स्वच्छता का सीधा संबंध स्वास्थ्य से है और स्वास्थ्य जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। वेदों में वायु का शुद्धता पर बल देते हुए कहा गया है कि जीवन के लिए शुद्ध एवं प्रदूषण रहित वायु अति आवश्यक है -

वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे

      इसी प्रकार जल जीवन का प्रमुख तत्त्व है। इसकी स्वच्छता के बिना सभी निर्रथक है। ऋग्वेद में जल की विशेषता बताते हुए कहा गया है कि - 

अप्सु अन्तः अमृतं, अप्सु भेषजं

 अर्थात्, जल में अमृत है, जल में औषधि-गुण विद्यमान रहते हैं। 

    अथर्ववेद में पानी की शुद्धता को स्वस्थ जीवन के लिए नितान्त आवश्यक माना गया है -

शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु

    अर्थात् शुद्ध जल के अभाव में जीवन नष्ट हो जाता है।

      रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने राम के निर्मल उदात्त चरित्र की उपमा हेतु निर्मल जल को चुना। बालकाण्ड की ये चौपाईयां देखें - 

लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥

प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥

    अर्थात् सगुण लीला का जो विस्तार से वर्णन करते हैं, वही राम सुयश रूपी जल की निर्मलता है, जो मल का नाश करती है और जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुंदर शीतलता है।

सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥

मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥

भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥

      अर्थात् राम सुयशरूपी जल हैं जो सत्कर्मरूपी धान के लिए हितकर हैं और राम के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वी पर गिरा और सिमटकर सुहावने कानरूपी मार्ग से चला और मानस अर्थात् हृदयरूपी श्रेष्ठ स्थान में भरकर वहीं स्थिर हो गया। वही पुराना होकर सुंदर, रुचिकर, शीतल और सुखदाई हो गया।

     हमारे देश में गंगा का जल सबसे पवित्र माना जाता है। रामचरित मानस की इस चौपाई का यही मर्म है -

गंग सकल मुद मंगल मूला। 

सब सुख करनि हरनि सब सूला॥ 

   अर्थात् गंगा समस्त आनंद-मंगलों की मूल है। वह सब सुख देने और सब दुख हरने वाली है।

     इसीलिए राम स्वयं गंगा को प्रणाम करते हैं - 

उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु विसैषी।।

       किन्तु वर्तमान में गंगा का जल भी शुद्ध नहीं रहा है। "नमामि गंगे" परियोजना के माध्यम से गंगा का पानी साफ़ करने मुहिम ज़ारी है। वर्ष 2014 में केंद्र सरकार द्वारा इस परियोजना की शुरुआत गंगा नदी के प्रदूषण को कम करने तथा गंगा नदी को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से की गई थी। परिणाम अभी भी प्रतीक्षित हैं।

      पानी, हवा, वातावरण की स्वच्छता के साथ ही अंतःकरण की स्वच्छता यानी आंतरिक शुद्घि भी आवश्यक है, जो विवेक से उत्पन्न होती है और विवेक धर्म, आध्यात्म और चिन्तन के माध्यम से आता है। बाह्य स्वच्छता के समान ही अंतःकरण की शुद्घता भी महत्वपूर्ण है। सभी के प्रति प्रेम, सम्मान और परोपकार का भाव रख कर स्वयं का अंतःकरण स्वच्छ किया जा सकता है। परपीड़ा, परनिंदा, हिंसा के भाव स्वयं के अंतःकरण को दूषित बना देते हैं। रामचरितमानस की यह चौपाई परनिंदा करने वाले मनुष्यों के प्रति प्रहार करती है -

सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥

      अर्थात् जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। 

दीपावली पर्व की तैयारी में अपना घर-द्वार चमकाते समय अक्सर लोग भूल जाते हैं कि अपना अंतःकरण भी स्वच्छ रखें तभी देवी लक्ष्मी प्रसन्न हो कर आतिथ्य स्वीकार करेंगी। बचपन में मैंने संस्कृत पाठ में उज्जैयिनी के यशस्वी राजा  विक्रमादित्य की एक कहानी पढ़ी थी। वह कुछ इस प्रकार थी - विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा के कल्याणार्थ एक निमय बनाया था कि बाज़ार में जो भी वस्तु दिन भर में बगैर बिके रह जायगी शाम को उसे राजा क्रय कर लेंगे ताकि विक्रेता को हानि नहीं उठानी पड़े। राज्य के एक शिल्पकार ने लक्ष्मी और अलक्ष्मी दोनों की मूर्तियां बनायीं और उन्हें बाज़ार में बेचने बैठ गया। ज़ाहिर है लक्ष्मी की मूर्ति ऊंचे दाम पर बिक गई लेकिन अलक्ष्मी की मूर्ति के लिए कोई ख़रीददार नहीं मिला। शाम को नियमानुसार बिना बिकी सामग्रियों के साथ अलक्ष्मी की वह मूर्ति भी राजा विक्रमादित्य के महल में पहुंचा दी गई। रात्रि में जब राजा विक्रमादित्य सोए तो अचानक रात्रि के दूसरे पहर में ही उनकी नींद किसी की आहट से खुल गई। राजा ने देखा कि एक सुंदर स्त्री महल से बाहर जा रही है। राजा ने पूछा तो उसने उत्तर दिया कि वह विद्या की देवी सरस्वती है। महल में अलक्ष्मी के आ जाने के कारण वह महल छोड़ कर जा रही है। राजा ने सरस्वती को नहीं रोका। फिर थोड़ी देर बाद एक और सुंदर स्त्री महल से बाहर जा रही है। राजा ने उससे भी पूछा तो उसने उत्तर दिया कि वह धन की देवी लक्ष्मी है। महल में दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी के आ जाने के कारण वह अब वहां नहीं रह सकती। अतः महल छोड़ कर जा रही है। राजा ने लक्ष्मी को भी नहीं रोका। 

इसी तरह अन्य देवी- देवतागण भी अलक्ष्मी के आगमन से रुष्ट हो कर अपना परिचय देते हुए महल से चले गए। राजा ने किसी को नहीं रोका। 

          अंत में श्वेत वस्त्रधारी एक दिव्य पुरुष जब महल से जाने लगा और राजा द्वारा पूछने पर उसने कहा कि "मैं धर्म हूं। चूंकि महल में अभाग्य, अकाल और दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी का वास हो गया है अतः मैं भी यहां से जा रहा हूं।'' इस दफ़ा राजा ने उस पुरुष के पैर पकड़ लिए और उससे महल में ही रहने की विनती करने लगा। धर्म ने चकित हो कर पूछा कि "राजन, जब अन्य सभी देवी-देवता कूच कर गए तब तो तुमने किसी को नहीं रोका। मुझे ही क्यों रोक रहे हो ?"

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया कि "हे धर्म, यदि आप मेरे साथ हैं तो मुझे किसी की परवाह नहीं, लेकिन यदि आपने मेरा साथ छोड़ दिया तो मेरा जीवन व्यर्थ है। बिना धर्म के बुद्धि, विवेक, धन-सम्पदा, राज्य-सत्ता सब व्यर्थ है। मैंने राजधर्म के पालन करते हुए ही बिना बिकी वस्तु के रूप में अलक्ष्मी को महल में स्थान दिया है। अर्थात मैंने आपका पालन किया, इसलिये आप महल छोड़ कर मत जाएं।"

       विक्रमादित्य की राजधर्म का पालन करने  वाली बात का मर्म समझ कर धर्म वापस महल में लौट आया और उसने वचन दिया कि वह विक्रमादित्य को छोड़ कर कभी नहीं जाएगा। इसके बाद विक्रमादित्य ने देखा कि वे सभी देवी-देवता एक-एक कर महल में वापस लौट कर आ रहे हैं जो महल छोड़ कर चले गए थे। राजा ने उनसे उनकी वापसी का कारण पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि "जहां धर्म का वास होगा वहां हमें तो वास करना ही पड़ेगा। धर्म को छोड़ कर हम नहीं जा सकते।"

     धर्म अंतःकरण की स्वच्छता के लिए ज़रूरी है। बाह्य और आंतरिक वातावरण - जहां दोनों स्वच्छ रहते हैं वहां लक्ष्मी स्वयंमेव निवास करती हैं। 

      आईए, इस दीपावली पर हम संकल्प लें कि सिर्फ़ दीपोत्सव पर ही नहीं बल्कि हम पूरे वर्ष भर भीतर-बाहर से स्वयं स्वच्छ रहकर देश को स्वच्छ बनाए रखेंगे। और तब स्वच्छता के लिए किसी सरकारी मिशन, योजना, परियोजना की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

और अंत में प्रस्तुत है मेरी ये काव्यपंक्तियां -

स्वच्छता के दीप की न रोशनी कभी हो कम

पास अपने आ सके कभी नहीं ज़रा भी तम

मान हो, सम्मान हो, भय न हो किसी का भी

हंसी-ख़ुशी रहें सभी, न हो किसी की आंख नम

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Wednesday, November 4, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 23 | लाईक, कमेंट्स, हैशटैग और जटायु | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "लाईक, कमेंट्स, हैशटैग और जटायु" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 04.11.2020

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 बुधवारीय स्तम्भ : विचारवर्षा

    लाईक, कमेंट्स, हैशटैग और जटायु

          -डॉ. वर्षा सिंह

     पिछले दिनों किसी टीवी चैनल पर एक घटना की कुछ क्लिप्स बार-बार दोहराई जाती रही है। वह घटना किसी लड़की से दिनदहाड़े सरेआम मेनरोड पर की जा रही बदसलूकी की थी। एक लड़का किसी लड़की का हाथ पकड़ कर उसे घसीटते हुए अपने साथ ले जाने का प्रयास कर रहा था। लड़की का रो-रो कर बुरा हाल था। वह लड़के के चंगुल से निकलने को छटपटाते हुए "हेल्प मी", "प्लीज़ हेल्प मी" की आवाज़ें लगा रही थी। आसपास तमाशबीनों की भीड़ लगी थी। भीड़ में कुछ लोग घटना की वीडियोग्राफी करने में मशगूल थे। टीवी चैनल की महिला एंकर स्क्रीन पर टेलीकास्ट हो रहे इन सब दृश्यों की क्लिपस् रिपीट करके घटना की तहें टटोलने की जद्दोज़हद में जुटी लगभग चींख-चींख कर एंकरिंग कर रही थी। यथा - "कौन है यह लड़की ? क्या कुसूर है इसका ? कौन है यह लड़का? आप देख रहे हैं कि वह किस तरह लड़की का हाथ पकड़ कर घसीट रहा है… लड़की चींख-पुकार कर रही है। क्या वज़ह हो सकती है ? कहीं ये लवज़ेहाद का मामला तो नहीं ? ऑनर किलिंग का मामला भी हो सकता है। आप देख रहे हैं कि लड़की के टॉप की स्लीव फट गई है, बाल बिखर गए हैं, उसकी सेंडिल टूट गई है। आप देख रहे हैं कि लड़का लड़की से किस क़दर बदसलूकी पर उतारू है। आप हमारा चैनल देख रहे हैं तो अभी इसी वक़्त टीवी स्क्रीन की दायीं ओर आ रहे हैशटैग पर अपने कमेंट भेजिए। लाईक कीजिए अगर आपको इस तरह की रिपोर्ट्स और देखनी हैं तो प्लीज़ लाईक अस...हम यहां रुकते हैं एक छोटे से कॉमर्शियल ब्रेक के लिए, ज़ल्द ही लौटेंगे तब तक आप देखते रहिए….आपका अपना चैनल" आदि, आदि… ।
          टीवी पर उस घटना की वीडियोग्राफी और चैनल की महिला एंकर द्वारा उसकी सनसनीखेज प्रस्तुति देख कर मन विचलित हो उठा।
          टीवी पर दिखाया गया वीडियो ही नहीं बल्कि इस तरह के और भी वीडियो आए दिन सोशलमीडिया पर वायरल होते रहते हैं, जिसमें घटनाएं घटती रहती हैं, पीड़ित मदद के लिए आवाज़ लगाते रहते हैं और भावशून्य तमाशबीन भीड़ खड़ी देखती रहती है। भीड़ में से कुछ लोग अपने मोबाईल का कैमरा ऑन कर घटना की वीडियो बनाने में मशगूल रहते हैं। सोशलमीडिया पर इन वीडियो को अपलोड करने के बाद वे लाईक, कमेंट्स और हैशटैग के ज़रिए वायरल किए गए वीडियो की लोकप्रियता का आकलन कर उत्साहित हो कर किसी नई घटना के घटित होने का इंतज़ार करने लगते हैं। वस्तुतः यह बहुत खेदजनक है कि यह सच है हमारे समय का ।
        याद कीजिए त्रेतायुग में जब साधु का वेश धर कर रावण ने छलपूर्वक सीता का अपहरण किया था तो जटायु जैसे पक्षी ने भी मदद के लिए पुकारती सीता को रावण के हाथों से छुड़ाने का प्रयास किया था। भले ही उसे अपने इस प्रयास में घायल हो कर अपनी जान गंवानी पड़ी।
        पौराणिक ग्रंथों के अनुसार प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के दो पुत्र हुए थे- 'गरुड़' और 'अरुण'। अरुण सूर्य के सारथी बने। अरुण के पुत्र थे सम्पाती और जटायु।
       गिद्धराज जटायु वन में तपस्वी सा जीवन व्यतीत करते हुए पर्णकुटी बना कर रहते थे। उधर पिता अयोध्यानरेश दशरथ की आज्ञा का पालन करने हेतु राम भी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण सहित दण्डकारण्य में पंचवटी नामक पर्णकुटी में निवास कर 14 वर्ष की अवधि व्यतीत कर रहे थे। एक दिन उस वन में लंकापति रावण की बहन शूर्पणखा आई। राम के आकर्षक स्वरूप पर मोहित हो कर उसने राम के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया। राम के द्वारा इंकार करने पर वह लक्ष्मण से विवाह हेतु अनुरोध करने लगी, लक्ष्मण के इंकार करने पर सीता को मार डालने की धमकी देने लगी। जिससे क्रोधित होकर राम की आज्ञा से लक्ष्मण ने सूर्पनखा के प्रणय निवेदन को ठुकराते हुए उसकी नाक और कान काट दिए थे। रावण ने राम द्वारा से अपनी बहन सूर्पनखा के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए मारीचि नामक एक राक्षस को भेजा। मारीचि स्वर्ण मृग का वेश धर कर सीता के समक्ष इस प्रकार प्रस्तुत हुआ कि सीता उसके माया जाल को समझ नहीं पाने के कारण राम से स्वर्ण मृग को पकड़ने का अनुरोध करने लगीं। राम का अनुरोध टाल नहीं पाए और सीता के कहने पर कपट-मृग मारीच को पकड़ने के लिये सघन वन में प्रविष्ट हो गये। मारीचि के मायाजाल के वशीभूत सीता ने मारीचि को पकड़ने गए राम को लौटता नहीं देख और मारीचि द्वारा "लक्ष्मण, लक्ष्मण" की पुकार को राम द्वारा लगाई गई पुकार समझ कर व्याकुलावश लक्ष्मण को राम को खोजने की आज्ञा दे दी। लक्ष्मण अपने बाण से पंचवटी के द्वार पर एक सुरक्षा रेखा खींच कर राम को खोजने के लिये निकल पड़े। पूर्वषडयंत्रकारी योजनानुसार दोनों भाइयों के चले जाने के बाद आश्रम को सूना देखकर लंकाधिपति रावण ने सीता का हरण कर लिया और बलपूर्वक उन्हें रथ में बैठाकर आकाश मार्ग से लंका की ओर चल दिया। सीता ने रावण की पकड़ से छूटने का पूरा प्रयत्न किया, किंतु असफल रहने पर करुण विलाप करने लगीं। उनके विलाप को सुनकर वनवासी गिद्धराज जटायु ने रावण को ललकारा। रावण द्वारा जटायु की ललकार को अनसुना करने पर जटायु ने रावण पर प्रहार कर सीता को उसे चंगुल से छुड़ाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन अन्त में रावण ने तलवार से जटायु के पंख काट डाले। जटायु मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा और रावण सीता को अपहृत कर लंका की ओर चला गया।
       जब राम लक्ष्मण के साथ सीता की खोज करने के लिये निकले तो घायल जटायु ने उन्हें बताया कि सीता को लंका का राजा रावण अपहृत कर दक्षिण दिशा की ओर ले गया है और उसी ने मेरे पंखों को काट कर मुझे बुरी तरह से घायल कर दिया है। सीता की पुकार सुन कर मैंने उनकी सहायता के लिये रावण से युद्ध भी किया। ये मेरे द्वारा तोड़े हुए रावण के धनुष उसके बाण हैं। इधर उसके विमान का टूटा हुआ भाग भी पड़ा है। रावण ऋषि विश्वश्रवा एवं कैकसी का पुत्र और कुबेर का भाई है। 
         तत्पश्चात् जटायु की मृत्यु हो गई। दुखी राम ने गोदावरी तट पर जटायु का अंतिम संस्कार कर उसे मोक्षगति प्रदान की।

रामचरित मानस में तुलसीदास ने उक्त घटना को कुछ इस तरह वर्णित किया है। चौपाई देखें - 

गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥
अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥
अर्थात् गिद्वराज जटायु ने सीताजी की दुःखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुल तिलक श्री रामचन्द्रजी की पत्नी हैं और नीच राक्षस उन्हें लिए जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के पाले पड़ गई हो।

 सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा॥
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसें॥
अर्थात् जटायु ने कहा कि हे सीते पुत्री! भय मत कर। मैं इस राक्षस का नाश करूँगा। यह कहकर वह पक्षी क्रोध में भरकर ऐसे दौड़ा, जैसे पर्वत की ओर वज्र छूटता हो॥

रे रे दुष्ट ठाढ़ किन हो ही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही॥
आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना॥
अर्थात्  जटायु ने ललकारकर कहा कि रे रे दुष्ट! खड़ा क्यों नहीं होता? निडर होकर चल दिया! मुझे तूने नहीं जाना? उसको यमराज के समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मन में अनुमान करने लगा-

की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई॥
जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा॥
अर्थात् यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़। पर वह गरुड़ तो अपने स्वामी विष्णु सहित मेरे बल को जानता है! कुछ पास आने पर रावण ने उसे पहचान लिया और बोला- यह तो बूढ़ा जटायु है। यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा।

सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा॥
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू॥
अर्थात् यह सुनते ही गीध क्रोध में भरकर बड़े वेग से दौड़ा और बोला- रावण! मेरी सिखावन सुन। जानकी को छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा। नहीं तो हे बहुत भुजाओं वाले! ऐसा होगा कि-

राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा॥
उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा॥
अर्थात् राम के क्रोध रूपी अत्यन्त भयानक अग्नि में तेरा सारा वंश पतिंगे की तरह भस्म हो जाएगा। योद्धा रावण कुछ उत्तर नहीं देता। तब गीध क्रोध करके दौड़ा।

धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा॥
चोचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही॥
अर्थात् जटायु ने रावण के बाल पकड़कर उसे रथ के नीचे उतार लिया, रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा। गीध सीता को एक ओर बैठाकर फिर लौटा और चोंचों से मार-मारकर रावण के शरीर को विदीर्ण कर डाला। इससे उसे एक घड़ी के लिए मूर्च्छा आ गई।

तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना॥
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी॥
अर्थात् तब खिसियाए हुए रावण ने क्रोधयुक्त होकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और उससे जटायु के पंख काट डाले। पक्षीराज जटायु राम की अद्भुत लीला का स्मरण करके पृथ्वी पर गिर पड़ा।

        रामकथा का यह जटायु- रावण प्रसंग रामलीलाओं में अनेक बार देखा जाता है, प्रवचनों में अनेक बार सुना जाता है, किन्तु असंवेदनशीलता सोशल मीडिया भक्तों पर इस क़दर हावी हो गई है कि वे लोग उस दृश्य से कोई सीख लिए बिना तटस्थभाव से किसी महिला पर सरेआम अत्याचार होते देख कर सोशलमीडिया पर लाईक, कमेंट और हैशटैग के आभासी मोहजाल में उलझ कर महिला की सहायता करने का प्रयास करने के बजाए घटना का वीडियो बनाने में लगे रहते हैं। बात- बात में भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाले लोग भी उस समय नारी अपमान की घटनाओं को इस तरह अनदेखा कर देते हैं मानों उनके परिवार की महिलाओं के साथ तो कभी कोई ऊंचनीच हो ही नहीं सकती है। ऐसे समय पर "वसुधैव कुटम्बकम्" को भूल कर "मैं और मेरा परिवार" का हितरक्षण ही उनका मूलमंत्र बन जाता है।
     वस्तुतः आवश्यकता है समाज में व्याप्त नैतिक पतन के ऐसे कारकों को मिटा कर एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करने में सभी के योगदान की, जिसमें नारी का सम्मान क़ायम रहे… और यदि किन्हीं आसुरी शक्तियों के कारण नारी के सम्मान को कोई ठेस पहुंचे तो सभी एकजुट हो कर उसका प्रतिकार करें, विरोध करें, उन आसुरी शक्तियों का मुक़ाबला करें।
        
और अंत में प्रस्तुत है मेरी काव्यपंक्ति -

हो रही आहत मनुजता, और तुम खामोश हो।
बढ़ रही है स्वार्थपरता, और तुम खामोश हो।
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Wednesday, October 28, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 22 | मंदोदरी और सत्य की पक्षधारिता | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "मंदोदरी और सत्य की पक्षधारिता" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 28.10.2020

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बुधवारीय स्तम्भ: विचार वर्षा   

     मंदोदरी और सत्य की पक्षधारिता
                     -डॉ. वर्षा सिंह

       पिछले दिनों ही आश्विन अथवा क्वांर की नवरात्रि के भक्ति काल का समापन हुआ है। नवरात्रि में नौ दिनों तक आदि शक्ति देवी माता दुर्गा के नौ रूपों की उपासना के बाद दसवीं तिथि दशहरा पर्व अथवा विजयादशमी पर्व के रूप में मनाई जाती है। विजयादशमी अर्थात असत्य पर सत्य की विजय का पर्व। राम सत्य के प्रतीक हैं और रावण असत्य का प्रतीक। ऐसा नहीं है कि रावण विद्वान नहीं था वरन् वह ज्ञानी और अनेक विद्याओं में पारंगत था। युद्ध कला, राजनीति के साथ ही काव्यसृजन में उसका कोई सानी नहीं। शिव की भक्ति में लीन होकर रावण ने शिव तांडव स्तुति की रचना की है जो शताब्दियों बाद आज भी श्रेष्ठ काव्य रचना के रूप में मानी जाती है। राम को रावण से शत्रुता नहीं थी।राम ने रावण से युद्ध भी बिना किसी बैरभाव के किया। यदि रावण सीता का हरण नहीं करता तो राम उससे युद्ध भी नहीं करते। अथवा यदि रावण अंगद, हनुमान, विभीषण एवं मंदोदरी की बात मान लेता तो राम से उसका युद्ध नहीं होता और उसे अपने पुत्र, भाई, परिजन सहित स्वयं के प्राण नहीं गंवाने पड़ते। रावण अपना शत्रु स्वयं था। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह - इन पांचों अवगुणों से वह स्वयं को मुक्त नहीं रख पाया। उसके पांडित्य और ज्ञान पर यह पांचों अवगुण भारी पड़े और अहंकार के वशीभूत होकर वह यह भी भूल गया कि सीता का अपहरण करना उसकी सोने की लंका को जला कर राख कर सकता है उसकी विद्वत्ता की आभा को नष्ट कर सकता है। 
         अहंकार के वशीभूत होकर रा्वण ने अपनी विदुषी पत्नी की बात भी कभी नहीं मानी। रावण की पत्नी मंदोदरी ने रावण को अनेक बार समझाने का प्रयास किया किंतु रावण ने उसे अनदेखा ही नहीं किया बल्कि मंदोदरी को बुरा भला कह कर उसे अपमानित भी किया।
रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में मंदोदरी और रावण का संवाद तुलसीदास ने कुछ इस प्रकार वर्णित किया है - 

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥
अर्थात् मंदोदरी एकांत में हाथ जोड़कर पति रावण के चरणों लगी और नीतिरस में पगी हुई वाणी बोली- हे प्रियतम! श्री हरि से विरोध छोड़ दीजिए। मेरे कहने को अत्यंत ही हितकर जानकर हृदय में धारण कीजिए।

तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥
अर्थात् सीता आपके कुल रूपी कमलों के वन को दुःख देने वाली जाड़े की रात्रि के समान आई है। हे नाथ। सुनिए, सीता को लौटाए बिना शम्भु और ब्रह्मा के किए भी आपका भला नहीं हो सकता।

मंदोदरी के यह वचन सुन कर अहंकारी रावण अट्टहास कर उठा। उसने मद में चूर हो कर मंदोदरी की समझाइश को हंसी में उड़ा दिया- 
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥
अर्थात् मूर्ख और जगप्रसिद्ध अभिमानी रावण कानों से उसकी वाणी सुनकर खूब हंसा और बोला- स्त्रियों का स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है। मंगल में भी भय करती हो। तुम्हारा मन, हृदय बहुत ही कच्चा यानी कमजोर है।

जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥
अर्थात् यदि वानरों की सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना जीवन निर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डर से काँपते हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसी की बात है।

यह वही रावणपत्नी मंदोदरी है जिसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथ ब्रह्म पुराण में पंचकन्या के रूप में मिलता है -
अहल्या, द्रौपदी, तारा, कुंती, मंदोदरी तथा।
पंचकन्या: स्मरेतन्नित्यं महापातकनाशम्॥
अर्थात् अहिल्या (ऋषि गौतम की पत्नी), द्रौपदी (पांडवों की पत्नी), तारा (वानरराज बाली की पत्नी), कुंती (पांडु की पत्नी) तथा मंदोदरी (रावण की पत्नी)। इन पांच कन्याओं का प्रतिदिन स्मरण करने से सारे पाप धुल जाते हैं। ये पांच स्त्रियां विवाहिता होने पर भी कन्याओं के समान ही पवित्र मानी गई है।

मंदोदरी... रावण की पत्नी थी। वह स्वर्ग की एक अप्सरा की पुत्री जो अत्याधिक सौंदर्यवान और आकर्षक थी, वह एक ऐसी समर्पित रानी थी जो असुर सम्राट रावण को जनहित समझाने का प्रयास करती थी। सोने की लंका की महारानी मंदोदरी, रामकथा का एक ऐसा पात्र है जिसकी चर्चा के बिना रामकथा पूरी नहीं होती। रावण की मृत्यु के बाद लंका में मंदोदरी का मान सम्मान कम नहीं हुआ, वह लंका की रानी बनी रही। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार मधुरा नामक एक अप्सरा भगवान शिव की तपस्या भंग करने के उद्देश्य से कैलाश पर्वत पहुंची। देवी पार्वती जो तब ललिता रूप में अन्यत्र तपस्या रत थीं, को वहां न पाकर वह अपने सम्मोहक नृत्य और गायन से भगवान शिव को आकर्षित करने का प्रयत्न करने लगी। देवी पार्वती को अपनी अंतर्शक्ति से इस बात का ज्ञान हो गया और वे कैलाश पर्वत पर पहुंचीं तो भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के प्रयास में लगी मधुरा को  देखकर वे अत्यंत क्रोधित हो गईं और क्रोध में आकर उन्होंने मधुरा को मेढक बन कर कुंए में रहने का श्राप दे दिया। तभी भगवान शिव तपस्या समाप्त कर जाग्रत हो गए। उन्हें घटना की जानकारी होने और मधुरा द्वारा अपनी ग़लती स्वीकार कर क्षमायाचना करने पर देवी पार्वती से श्राप वापस लेने का अनुरोध किया। तब पार्वती ने मधुरा से कहा कि कठोर तप के बाद ही वह अपने असल स्वरूप में आ सकती है और वो भी 12 वर्ष बाद। उधर असुरों के शिल्पकार मयासुर और उनकी अप्सरा पत्नी हेमा के दो पुत्र थे, लेकिन वे चाहते थे कि उनकी एक पुत्री भी हो। इसी इच्छा को पूर्ण करने के लिए उन दोनों ने कठोर तपस्या करनी शुरू की, ताकि ईश्वर उनसे प्रसन्न होकर एक पुत्री दे दें। इसी बीच मधुरा की कठोर तपस्या के 12 साल भी पूर्ण होने वाले थे। जैसे ही मधुरा की तपस्या के 12 वर्ष पूर्ण हुए वह अपने असल स्वरूप में आ गई और कुएं से बाहर आने के लिए वह मदद के लिए पुकारने लगी। हेमा और मय वहीं तप में लीन थे। मधुरा की आवाज सुनकर दोनों कुएं के पास गए और उसे बचा लिया। बाद में उन दोनों ने मधुरा को पुत्री के रूप में गोद ले लिया और उसका नाम मंदोदरी रखा। एक बार रावण, मयासुर से मिलने आया और वहां उनकी सुंदर पुत्री को देखकर उस पर मंत्रमुग्ध हो गया। रावण ने मंदोदरी से विवाह करने की इच्छा प्रकट की, जिसे दानव मयासुर ने अस्वीकार कर दिया। लेकिन रावण ने हार नहीं मानी और बलपूर्वक मंदोदरी से विवाह कर लिया। मंदोदरी जानती थी कि रावण, भगवान शिव का भक्त है, इसलिए शिव से बैर की आशंका को ध्यान में रख कर अपने पिता की सुरक्षा के लिए वह रावण के साथ विवाह करने के लिए तैयार हो गई। रावण और मंदोदरी के तीन पुत्र थे - अक्षय कुमार, मेघनाद और अतिकाय।
       रावण बहुत अहंकारी था, मंदोदरी जानती थी कि सीताहरण रावण की एक बहुत बड़ी भूल है। जिस मार्ग पर वह चल रहा है, उस मार्ग पर सिवाय विनाश के कुछ हासिल नहीं होगा। उसने बहुत प्रयास किए कि रावण सही मार्ग पर चल पड़े, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मंदोदरी चाहती थी कि रावण, अयोध्या के युवराज राम की पत्नी सीता को उनके पति के पास भेज दे। किन्तु अहंकारी रावण ने मंदोदरी की सलाह नहीं मानी। अंततः राम-रावण युद्ध हुआ, तब एक पतिव्रता स्त्री की तरह मंदोदरी ने अपने पति का साथ दिया और रावण के जीवित लौट आने की कामना के साथ उसे रणभूमि के लिए विदा किया। युद्ध के अंतिम दिन रावण की मृत्यु का समाचार पा कर  मंदोदरी भी युद्ध भूमि पर गई और वहां अपने पति, पुत्रों और अन्य संबंधियों का विनाश देखकर अत्यंत दुखी हुई।

रामचरितमानस की इस चौपाई में मंदोदरी की व्यथा का वर्णित है -
पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥
जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आईं॥
 अर्थात् पति के सिर देखते ही मंदोदरी व्याकुल और मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़ी। स्त्रियाँ रोती हुई उठ दौड़ीं और मंदोदरी को उठाकर मृत रावण के पास आईं।

   युद्ध समापन उपरांत राम के सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्यागमन के पूर्व मंदोदरी ने भगवान राम से अपने भविष्य के प्रति मार्गदर्शन देने की प्रार्थना की। भगवान राम ने लंका के सुखद भविष्य हेतु विभीषण को राजपाट सौंप दिया और मंदोदरी को यह सुझाव दिया कि वह विभीषण से विवाह कर ले ताकि विभीषण निश्चिंत हो कर लंका की जनता के लिए कल्याणकारी कार्य कर सके। भगवान राम अपनी पत्नी सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ वापस अयोध्या लौटे तब मंदोदरी ने राम के सुझाव पर मंथन कर उसे स्वीकार करते हुए विभीषण से विवाह कर लिया। विवाह के पश्चात उसने विभीषण के साथ मिल कर लंका के साम्राज्य को सही दिशा की ओर बढ़ाना प्रारंभ किया।
       रामकथा में आसुरी शक्तियों में विभीषण सत्य के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है क्योंकि वह रावण से खुला विद्रोह कर राम के पक्ष में आ जाता है। वहीं मंदोदरी भी सत्य के पक्ष में अडिग खड़ी रहती है किन्तु एक पतिव्रता स्त्री की मर्यादा का पालन करते हुए उसके द्वारा खुला विद्रोह नहीं किए जाने के कारण रामकथा में उसकी यह महत्ता विभीषण से पीछे रह जाती है। इसीलिये सत्य का पक्षधर होना ही पर्याप्त नहीं होता। सत्य के पक्ष में खुल कर आवाज़ उठाना भी आवश्यक होता है।

और अंत में प्रस्तुत है मेरी काव्यपंक्ति -

जब ग़लत होता दिखे, तो बोलना भी है ज़रूरी।
बंधनों से मुक्त हो, स्वर खोलना भी है ज़रूरी ।
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Wednesday, October 7, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 19 | जीवन में मंथराओं की कमी नहीं | डॉ. वर्षा सिंह


बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

       जीवन में मंथराओं की कमी नहीं

                      - डॉ. वर्षा सिंह

     मुझे आज अचानक एक पुराना वाकया याद आ गया। उन दिनों मैं विद्युत विभाग के जिस कार्यालय में पदस्थ थी, वहां मैं शिकायत कक्ष की प्रभारी थी। तब कुछ शासकीय योजनाओं को संचालित करने के लिए कार्यालय में नोडल अधिकारियों की संविदा नियुक्तियां हुई थीं। उनमें से एक अधिकारी द्वारा अन्यत्र नियमित नौकरी पर जाने और नोडल अधिकारी के पद से इस्तीफा देने के कारण एक पद रिक्त हो गया था। मेरे कार्यालय प्रमुख ने मुझे उस पद पर कार्य करने के संबंध में पूछा, जिसे मैंने मना कर दिया। मना करने के दो कारण थे एक तो शिकायत कक्ष का मेरा कार्य सुचारु रूप से चल रहा था, दूसरे मैं जानती थी कि नोडल अधिकारी के उस रिक्त पद पर कल को ऊपर से कोई दूसरा अधिकारी नियुक्त कर दिया जाएगा और मुझे अनावश्यक डिस्टर्ब होना पड़ेगा।

मेरे द्वारा मना करने वाली बात जब मेरे एक असिस्टेंट को पता चली, तो वह बहुत विचलित हो उठा। कहने लगा - मैडम जी, आपने मना करके अच्छा नहीं किया। आपको बड़े साहब से 'हां' कह देना चाहिए था।

'लेकिन क्यों ? जब मैं वह सेक्शन नहीं लेना चाहती हूं तो साफ़ क्यों न बताऊं ? फिर अपना ये कम्प्लेंट सेक्शन अच्छा है।' मैंने कहा था।

तब मेरा वह असिस्टेंट मुझे समझाने लगा था - 'अरे मैडम जी, यहां तो वही पुराना फर्नीचर है। टेबिल क्लॉथ वाली पुरानी टेबल, बाबाआदम के ज़माने का गोल कंप्यूटर मॉनिटर, सड़ियल की-बोर्ड और ये टूटी-फूटी कुर्सियां.. इनकी कीलों में रोज़ कपड़े फटते हैं। जबकि वहां नोडल अधिकारी के चैम्बर में सारा फर्नीचर एकदम नया है.. गोदरेज कंपनी का। एलसीडी डिस्प्ले वाला नया कंप्यूटर मॉनिटर है। अपने यहां कूलर है, वहां एसी है।'

एक बारगी मुझे भी लगा कि इसकी बात में दम तो है। फ़र्नीचर से ले कर स्टेशनरी और कम्प्यूटर तक सभी एकदम पुराने और बेहद ऊबाऊ हैं। 

 तभी मेरे असिस्टेंट ने अपनी बात आगे बढ़ाई - 'उस सीट पर सप्लायर भी आते हैं। अपने को चाय-पानी के लिए अपने वॉलेट खाली नहीं करने पड़ेंगे। मैडम जी, आप सीनियर भी हैं । साहब से कह दीजिए कि आपको नोडल अधिकारी बना दें। अभी भी समय है, साहब ने अभी और किसी को वह सीट नहीं ऑफर की है।'

मुझे उसकी यह बात खटकी। मैंने अपने विवेक से काम लेते हुए अपने उस असिस्टेंट को उल्टा समझाया ऐसे लालच में कभी नहीं फंसना चाहिए, अपनी कमाई की चाय ज़्यादा अच्छी होती है। ग़लत ढंग से की गई कमाई कभी न कभी ज़रूर धोखा देती है।

     और फिर उस घटना के दो माह बाद …. जैसाकि ऑलरेडी इस्टीमेटेड था मेरे सेक्शन का भी रिनोवेशन हो गया। पूर्वयोजनानुसार सारा फर्नीचर बदल दिया गया। एलसीडी डिस्प्ले वाला नया कंप्यूटर आ गया। कूलर हटा कर एसी लगा दिए गए। यदि मैं उस समय अपने उस असिस्टेंट की बातों में आ कर नोडल अधिकारी का प्रभार ले लेती तो बहुत बड़ी टेंशन में फंस जाती। मेरा असिस्टेंट अपनी ऊपरी कमाई के लालच में मुझे मेरा लाभ दिखा कर मुझे भी कलंकित कर सकता था।

आज मैंं चिंतन करती हूं तो मुझे लगता है कि ऐसे सलाहकारों और रामकथा की मंथरा दासी में शायद ज़्यादा फ़र्क़ नहीं…   रामकथा में दासी मंथरा ने अपनी रानी कैकेयी को जो सुझाव दिए थे वे उसकी दृष्टि में रानी कैकेयी और उसके पुत्र भरत के लिए तो लाभप्रद थे ही, उससे कहीं अधिक स्वयं मंथरा के लिए लाभकारी थे। भरत राजा बनते तो कैकेयी राजमाता और मंथरा राजमाता की ख़ास सेविका। दूर का निशाना मगर सही दिशा में एक ग़लत मंसूबे के साथ। अकसर लोग यह भूल जाते हैं कि ग़लत- सही के बीच की रेखा को मिटा कर बढ़ाए गए क़दम ठोकर ज़रूर खाते हैं।

         महाराजा दशरथ की तीन रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी में कैकेयी अधिक सुंदर, युद्ध संचालन में योग्य थी। एक बार राजा दशरथ के साथ युद्ध मैदान में गई कैकेयी ने रथ के पहिए की कील निकलने पर कील के स्थान पर अपनी उंगली लगा कर राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी। तब दशरथ ने प्रसन्न हो कर कैकेयी से दो वरदान मांगने को कहा था। कैकेयी ने वे वरदान उसी समय नहीं मांगे थे, बल्कि बाद में कभी अन्य समय लेने का कह कर दशरथ को वचनबद्ध कर लिया था।

          कालांतर में दशरथ ने जब अपने ज्येष्ठ पुत्र राम के राज्याभिषेक की बात की तो अपने स्वार्थ की पूर्ति को ध्यान में रख कर कैकेयी की अंतरंग दासी मन्थरा ने आकर कैकयी को यह समाचार सुनाया। यह सुनकर कैकयी आनंद में डूब गयी और समाचार सुनाने के बदले में मंथरा को अपना एक आभूषण भेंट किया। वाल्मीकि रामायण के अनुसार - 

इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम् । 

एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूय: करोमि ते ।।

रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये ।

तस्मात्तुुष्टस्मि यद्राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ।। 

न मे परं किञ्चिदितो वरं पुन: प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोऽमृतम् ।

तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरं वरं परं ते प्रदादामि तं वृणु ।। 

(वाल्मीकि रामायण  २ । ७। ३४-३६)

अर्थात् मन्थरे ! तूने मुझको यह बड़ा ही प्रिय संवाद सुनाया है, इसके बदले मैं तेरा और क्या उपकार करूं? यद्यपि भरत को राज्य देने की बात हुई थी, फिर भी राम और भरत में मैं कोई भेद नहीं देखती । मैं इस बात से बहुत प्रसन्न हूँ कि महाराज कल राम का राज्याभिषेक करेंगे । हे प्रियवादिनी ! राम के राज्याभिषेक का संवाद सुनने से बढ़ कर मुझे अन्य कुछ भी प्रिय नहीं है । ऐसा अमृत के समान सुखप्रद वचन सब नहीं सुना सकते । तूने यह वचन सुनाया है, इसके लिये तू जो चाहे सो पुरस्कार मांग ले ,मैं तुझे देती हूँ।

     किन्तु मंथरा ने वह आभूषण एक ओर फेंक दिया और कैकयी को अनेक उदाहरण दे कर अपना मंतव्य प्रकट करते हुए भांति-भांति से समझाया। फिर भी कैकयी मंथरा की बात नहीं मानकर कहती है कि यह तो रघुकुल की रीत है कि ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य संभालता है और मैं कैसे अपने पुत्र के बारे में सोचूं? राम तो सभी के प्रिय हैं। 


यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघव: । कौसल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु ।। 

राज्यं यदि हि रामस्य भरतस्यापि तत्तदा ।

मन्यते हि यथाऽऽत्मानं तथा भ्रातॄन्स्तु राघव: ।। 

(वाल्मीकि रामायण २। ८। १८ -१९) 

    अर्थात् मुझे भरत जितना प्यारा है, उससे कहीं अधिक प्यारे राम है , क्योंकि राम मेरी सेवा कौशल्या से भी अधिक करते है । रामको यदि राज्य मिलता है तो वह भरत को ही मिलता है, ऐसा समझना चाहिये, क्यों कि राम सब भाइयों को अपने ही समान समझते है । 

       इस पर जब मन्थरा महाराज दशरथ की निन्दा करके कैकेयी को फिर भड़काने लगी, तब तो कैकेयी ने बड़ी बुरी तरह उसे फटकार दिया  –

ईदृशी यदि रामे च बुद्धिस्तव समागता ।

जिह्वायाश्छेदनं चैंव कर्तव्यं तव पापिनि ।।

       तब मंथरा ने तरह-तरह के दृष्टान्त सुना कर केकैयी से अपनी बात मनवा ही ली। अंततः कैकयी ने मंथरा की सारी बातें मान लीं और कोप भवन में जाकर राजा दशरथ को अपने दो वरदानों की याद दिलाई। राजा दशरथ ने कहा कि ठीक है वरदान मांग लो। तब कैकेयी ने अपने वरदान के रूप में राम का वनवास और भरत के लिए राज्य मांग लिया। यह वरदान सुनकर राजा दशरथ मानसिक रूप से आहत हो गए, चूंकि वे वचनबद्ध थे अतः वचनों से विमुख होना संभव नहीं था। 

       'रामचरितमानस' के अयोध्याकांड में भी तुलसीदास ने लिखा है कि मंथरा दासी के कहने पर ही राम के राज्याभिषेक होने के अवसर पर कैकेयी की मति मारी गयी और पुत्र भरत के राजतिलक की चकाचौंध भरी कल्पना में डूब कर उसने राजा दशरथ से दो वरदान मांगे। पहले वर में उसने भरत का राज्याभिषेक और दूसरे वर में भरत की राजगद्दी को निष्कंटक बनाने के कुटिल उद्देश्य से राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांग लिया।

नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि।

अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।

       अर्थात् मन्थरा नाम की कैकेई की एक मंदबुद्धि दासी थी, उसे अपयश की पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धि को फेरकर चली गईं।

रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।

कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।

        अर्थात् इस तरह करोड़ों कुटिलपन की बातें गढ़-छोलकर मन्थरा ने कैकेयी को उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतों की कहानियां इस प्रकार सुना दीं कि कैकेयी का मन विचलित हो उठा।

      परिणाम से सभी अवगत ही हैं। जहां एक ओर दशरथ शोकाकुल हो मृत्युशैय्या पर पहुंच गए। आज्ञाकारी राम वनगमन कर गए। भरत यह अनर्थ स्वीकार न कर राम की चरणपादुका के सेवक बन अयोध्या की सुरक्षा करते रहे। राम के साथ उनकी अर्धांगिनी सीता भी वनवासरत हो गईं जहां से लंकापति रावण ने उन्हें अपहृत कर लिया। … वहीं दूसरी ओर कैकेयी को वैधव्य और कलंकित नारी का तमगा हाथ लगा। मंथरा तो दासी थी, दासी रही। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ा।

रामचरितमानस में तुलसीदास ने दासी मंथरा की ओर से यह चौपाई लिखी है - 

कोउ नृप होइ हमैं का हानी । 

चेरि छाड़ि अब होब की रानी।। 

        अर्थात् - मुझे कोई लेना-देना नहीं, मैं तो दासी की दासी ही रहूंगी। रानी जी, आप सोचिए कि आप का क्या होगा।

  तो क्या मंथरा ने निःस्वार्थ भावना से सुझाव दिया था। नहीं… ऐसा नहीं था। मंथरा का स्वयं का स्वार्थ निहित था उसकी इस चाल में। वह जानती थी कि भरत के राजा बनने पर कैकेयी राजमाता बन जाएंगी और मंथरा कैकेयी की निकटस्थ होने के कारण अयोध्या की प्रभावशाली महिला बन जाएगी।

    रामकथा के इस प्रसंग का मर्म यही है कि चाहे कोई कितना भी सगा व्यक्ति क्यों न हो, उसके सुझाव पर स्वयं चिंतन किए बिना उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। वर्तमान समय में 'मंथराओं' की कमी नहीं है। शुभचिंतक बन कर हमारी निजी ज़िन्दगी में सेंध लगाने वाले 'मंथरा' रूपी व्यक्ति बहुत घातक होते हैं। इन्हें पहचानना बहुत ज़रूरी है। हमारे जीवन में अनेक ऐसे अवसर आते हैं जब हमारे निकटस्थ लोग हमारे हितरक्षक बन कर हमें हमारा लाभ दिखा कर तरह-तरह की समझाइश देते हैं। किन्तु सुझाव के अमल में लाए जाने से होने वाले लाभ और हानि का स्वयं  चिंतन करना बहुत ज़रूरी होता है। यदि परिणाम से ज़्यादा दुष्परिणाम की आशंका नज़र आए तो कभी स्वयं 'कैकेयी' नहीं बने और किसी भी 'मंथरा' की सलाह को अमल में न लाएं। 

और अंत में प्रस्तुत है मेरा यह दोहा -

अंतर्मन के खोल कर रखिए सारे द्वार ।

हर पहलू पर  गौर से पूरा करें  विचार।।

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दिनांक 07.10.2020

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Wednesday, September 30, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 18 | ग्लैमराइज्ड कैकेयी | डॉ. वर्षा सिंह

 


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दिनांक 30.09.2020

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

           ग्लैमराइज्ड कैकेयी          
                      - डॉ. वर्षा सिंह
      
         भक्त ध्रुव की कथा में ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद, माता सुनीति और सौतेली माता का नाम सुरुचि का ज़िक्र आता है। कथा का महत्वपूर्ण भाग यह है कि राजा उत्तानपाद एक दिन राज सिंहासन पर बैठे थे। उनकी गोदी में ध्रुव का सौतेला भाई अर्थात् सौतेली माता सुरुचि का पुत्र बैठा था। ध्रुव ने भी राजा की गोदी में बैठने की ज़िद की। रानी सुरुचि ने ध्रुव को रोक दिया और कहा, ‘‘मेरा पुत्र ही राजा की गोद में बैठने का अधिकारी है, क्योंकि वह तुमसे अधिक योग्य है।’’ बालक ध्रुव बड़ा ही स्वाभिमानी था। सौतेली मां की दुत्कार से आहत हो कर बालक ध्रुव ने प्रतिज्ञा की, कि ‘मैं दूसरों के द्वारा दिए गए स्थान को ग्रहण नहीं करूंगा। मैं परिश्रम और तपस्या से अपना स्थान स्वयं बनाऊंगा तथा ऐसा स्थान प्राप्त करूंगा जो किसी और ने आज तक प्राप्त नहीं किया होगा।' ध्रुव की प्रतिज्ञा सुन कर माता सुनीति ने उसे ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का मंत्र दिया। बालक ध्रुव ने इस मंत्र का जाप करते हुए घोर तपस्या की। ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। ध्रुव ने कहा- हे प्रभु! मुझे ऐसा पद दीजिए जो सभी पदों से ऊंचा हो। जो अपना अलग महत्व रखता हो तथा जिस पद पर आज तक कोई विराजमान न हुआ हो। विष्णु ने उसे आकाश में उत्तर दिशा में समस्त तारागणों, नक्षत्रों के बीच सर्वोच्च स्थान दिया। वह ‘ध्रुव तारा’ बन कर अमर हुआ। ध्रुव तारे को सब तारों में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है। ध्रुव का नाम आज भी जितने सम्मानपूर्वक लिया जाता है जबकि उसकी विमाता सुरुचि का नाम लेते हुए घृणा के भाव मन में उत्पन्न हो जाते हैं।     

      यह तो थी सतयुग के भक्त ध्रुव की कथा, जिसमें सौतेली मां द्वारा अपनी सगी संतान के मोह में सौतेली संतान को अपमानित किया गया था। इसी प्रकार की एक कथा है त्रेतायुग के राजा राम की। रामकथा में राम को चौदह वर्ष का वनवास इसलिए झेलना पड़ा क्योंकि उनकी सौतेली माता कैकेयी ने अपने सगे पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनवाने के उद्देश्य से राम के पिता और कैकेयी के वचनबद्ध राजा दशरथ से वचनपूर्ति में राम का वनवास और भरत का राजतिलक मांग लिया था।
         राजा दशरथ की तीन रानियां थीं- कौशल नरेश सुकौशल की पुत्री कौशल्या, कैकय नरेश अश्वपति की पुत्री कैकयी और काशी नरेश की पुत्री सुमित्रा। राजा दशरथ की इन तीन रानियों में से कैकेयी विवाह से पहले महर्षि दुर्वासा की सेवा किया करती थी। कैकेयी की सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा ने कैकेयी का एक हाथ वज्र का बना दिया। कालांतर में  कैकेयी का विवाह राजा दशरथ से हो गया। उधर स्वर्ग में देवासुर संग्राम आरंभ हो गया। देवराज इंद्र ने राजा दशरथ को सहायता के लिए बुलाया। युद्ध कौशल में निपुण रानी कैकेयी भी दशरथ की रक्षा के लिए सारथी बनकर देवासुर संग्राम में पहुंच गईं। युद्ध के दौरान अचानक दशरथ के रथ के पहिए से कील निकल गई और रथ लड़खड़ाने लगा। कैकेयी ने कील के स्थान पर अपनी उंगली लगा दी, जिससे राजा दशरथ के प्राण बच गए। राजा दशरथ कैकेयी की वीरता और साहस से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कैकेयी से उसकी कोई दो मनोकामना पूर्ति करने को कहा। लेकिन कैकेयी ने वे दोनों मनोकामनाएं बाद में कभी किसी समय पूर्ति का वचन ले कर  उस समय वह प्रकरण टाल दिया। बाद में कौशल्यापुत्र राम के राज्याभिषेक के समय कैकेयी की अंतरंग दासी मंथरा ने जब उन दो वचनों की पूर्ति का स्मरण दिलाते हुए भरत की भावी सुरक्षा के विषय में समझाया तो अपने हित-अहित का विचार किए बिना एक मां के हृदय ने मंथरा का सुझाव मान कर दोनों मनोकामनाएं पूर्ति हेतु दशरथ से कह दिया। कैकेयी ने दशरथ को इस वचन की बात याद दिलाकर कौशल्यापुत्र राम को चौदह वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत का राज्याभिषेक मांग लिया। 
       दशरथ वचनबद्ध थे। किन्तु राम के प्रति यह घोर अन्याय वे सहन नहीं कर पाए और यह वचनपूर्ति उनके प्राणों के उत्सर्ग का करण बन गई। दशरथ ने वचन तो पूरे कर दिए लेकिन उसके बाद शोकग्रस्त हो कर वे जीवित नहीं रह पाए। आज्ञाकारी, संस्कारी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम पिता की आज्ञा का पालन और माता कैकेयी की इच्छा का सम्मान करते हुए वन गमन कर गए। कैकेयीपुत्र भरत अपने बड़े भाई राम के प्रति अटूट स्नेह और गहरा आदरभाव रखते थे। उन्हें जब यह सब ज्ञात हुआ तो माता कैकेयी के इस कृत्य पर रोष प्रकट करते हुए उन्होंने राज्याभिषेक से मना कर दिया और राम के वनगमन के पश्चात राम की चरणपादुका अयोध्या ला कर उसे सिंहासनारूढ़ करके स्वयं एक सेवक की भांति चौदह वर्ष व्यतीत कर दिए।
     इस पूरे घटनाक्रम ने कैकेयी के जीवन को लांछित कर दिया। दासी मंथरा के सुझाव पर अमल करके पुत्रप्रेम के स्वार्थवश कैकेयी ऐसी दो मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कोपभवन में जा बैठी थी, जिसने उसके जीवन को ही कलंकित कर दिया। दशरथ जैसे स्नेहवान पति को सदैव के लिए खो कर विधवा नारी के रूप में मिला कैकेयी का जीवन, सगे पुत्र भरत से भी तिरस्कृत हुआ। रामायण के नारी पात्रों में कैकेयी का स्मरण घृणा और तिरस्कार के साथ किया जाता है। कोई भी व्यक्ति अपनी पुत्री का नाम कैकेयी रखना उचित नहीं समझता।

   आदिकवि वाल्मीकि ने संस्कृत में लिखे गए 'रामायण' महाकाव्य में कैकेयी को एक ऐसी स्त्री के रूप में उल्लेखित किया है जो अपनी अनुचित मांग की पूर्ति कराने हेतु क्रोधाग्नि से तिलमिलाती हुई कोप- भवन में प्रविष्ट हो कर सम्पूर्ण अयोध्या को शोक- संतप्त बना देती है। वाल्मीकि रामायण की परम्परा में लिखे गये काव्यों और नाटकों में कैकेयी को राम-वनवास के लिए दोषी ठहराया गया है। असहिष्णु, कलंकिनी आदि अनेक सम्बोधनों का प्रयोग कर कैकेयी की निन्दा की गयी है।
'रामचरित मानस' में तुलसीदास ने अयोध्याकांड के अंतर्गत कैकेयी के पात्र को अन्त तक एकान्त- नीरव, भयावह एवं ग्लानियुक्त बनाए रखा है। कैकेयी की दैहिक सुंदरता उसके कुकृत्यों के समक्ष गौण हो गई। तुलसीदास ने अयोध्यावासियों के मुँह से उनके लिए 'पापिन' 'कलंकिनी' आदि अनेक सम्बोधनों का प्रयोग कर कैकेयी के कृत्य की भर्त्सना की है, साथ ही भरत की माता कैकेयी के प्रति रुष्टता को इस चौपाई के माध्यम से व्यक्त किया है -
कैकेई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे॥
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।

अर्थात् भरत कहते हैं कि कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करने वाले ये पामर प्राण पूरी तरह से अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं, तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा।
भरत यह भी कहते हैं कि -
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू॥

अर्थात् मेरी माता की कुमति ही पापों का मूल है। उसने हमारे हित का बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठ का कुयंत्र बनाया और चौदह वर्ष की अवधिरूपी कठिन कुमंत्र पढ़कर उस यंत्र को गाड़ दिया। 
हालांकि उदात्त चरित्र के स्वामी राम ने कभी माता कैकेयी को गलत नहीं कहा। साथ ही जब भरत ने अपनी माता को कटु वचन कहे तो राम ने उन्हें रोका भी।
           हमारे रामकथा सहित अनेक ग्रंथों में उन स्त्रियों को निंदनीय माना गया है और बुरी स्त्रियों के रूप में उल्लेखित किया गया है जो अपनी सगी संतानों से मोह में अपनी सौतेली संतानों के प्रति अन्याय एवं षडयंत्र करती हैं। यह इसलिए कि स्त्रियां इन कथाओं से शिक्षा ग्रहण करें, स्वयं को निंदा का कारण न बनाएं और अपने सौतेली संतानों के प्रति भी दया और ममता का भाव रखें। 
किन्तु वर्तमान समय में हमारे टीवी सीरियल्स में सौतेली माताओं के चरित्र को ग्लैमराइज करके षडयंत्रों से लैस, कुटिल चालों की एक्सपर्ट के रूप में महिमामंडित किया जाता है। जिसका स्त्रियों पर ग़लत असर पड़ता है। स्वार्थपरता, निष्ठुरता, मोहांधता के दुर्गुणों से लैस खलनायिका के रूप में प्रस्तुत विमाताओं के चरित्र से प्रभावित हो कर अनेक स्त्रियां "कैकेयी" बनती जा रही हैं।
यदि टीवी सीरियल्स में ऐसी स्त्रियों को ग्लैमराइज नहीं किया जाए और सिर्फ़ एपीसोड की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से उनकी घूर्तताओं को बढ़ा-चढ़ा कर न दिखाया जाए तो वह बेहतर होगा। सीढ़ी पर तेल डालकर परिवारजन को गिराने, गीज़र से बिजली के नंगे तार जोड़ कर घातक दुर्घटना को अंजाम देने सरीखे आसान नुस्खे किसी की भी ज़िन्दगी पर भारी पड़ सकते हैं। इसलिए वास्तविक ज़िन्दगी से कैकेयी के रोल को छोटा करके कौशल्या के रोल को बढ़ाना होगा।

और अंत में  प्रस्तुत हैं मेरी ये काव्य पंक्तियां....

उचित और अनुचित में जिसको भेद न करना आया।

मिले न उसको राम जगत में, मिली न उसको माया।

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