Wednesday, August 26, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 13 | अनेकता, एकता और हम | डॉ. वर्षा सिंह
Wednesday, August 19, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 12 | अनुभव का आकलन | डॉ. वर्षा सिंह
Wednesday, August 12, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 11| नैसर्गिक बालपन के प्रतीक हैं बाल कृष्ण | डॉ. वर्षा सिंह
Wednesday, August 5, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 10 | श्रीराम का नाम मात्र एक नाम नहीं | डॉ. वर्षा सिंह
श्रीराम का नाम मात्र एक नाम नहीं
- डॉ. वर्षा सिंह
नाम व्यक्ति की पहचान होता है और प्रत्येक नाम का अपना एक महत्व होता है। नाम के संदर्भ में जब बात श्रीराम के नाम की आती है तो वह मात्र एक नाम नहीं है बल्कि समूचा व्यक्तित्व प्रबंधन है…और आज 5 अगस्त 2020 बुधवार को करीब 500 वर्षों के बाद राम जन्मभूमि अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन के साथ मंदिर की आधारशिला रखी जा रही है और राम मंदिर फिर से बनने जा रहा है, यह भारत के लिए न सिर्फ ऐतिहासिक बल्कि भावनात्मक रूप से सबसे बड़ा दिन है... मैं अपने ये विचार आप सबसे साझा कर रही हूं कि इस एक राम नाम में व्यक्तित्व की वह सारी खूबियां मौजूद हैं जिन्हें समझने और जानने के बाद कोई भी व्यक्ति स्वयं को परिष्कृत कर सकता है और अपने जीवन में सफलताएं अर्जित कर सकता है। अक्सर लोग श्रीराम के नाम को धर्म से जोड़ कर ही देखते हैं किंतु उनका नाम धर्म का पर्याय नहीं अपितु संपूर्ण माननीय विशेषताओं का पर्याय है।
व्यक्तित्व प्रबंधन के लिए किन विशेषताओं की आवश्यकता होती है हम पहले इस पर गौर करेंगे। सबसे पहली विशेषता होती है आत्मविश्वास की। श्रीराम का नाम आत्मविश्वास पैदा करता है। राम कथा में ही इसका एक सुंदर उदाहरण देखा जा सकता है। जब वानर सेना भारत और लंका के बीच सेतु बनाने का प्रयास कर रही थी तो उनके द्वारा समुद्र में डाले गए सारे के सारे पाषाण डूबते जा रहे थे और सेतु बनने का नाम ही नहीं ले रहा था। सभी चिंतित थे कि सेतु कैसे बनेगा? यदि सेतु नहीं बनेगा तो वानर सेना राम सहित लंका कैसे पहुंच पाएगी और सीता जी को रावण के चंगुल से कैसे मुक्त करा पाएगी ? लेकिन इस चिंता के साथ ही उनके मन में यह विश्वास जगा कि यदि पाषाण पर श्रीराम का नाम लिखकर समुद्र में डाला जाए तो पाषाण डूबेगा नहीं।
"रामचरितमानस" का यह सोरठा देखें -
सुनहु भानुकुल केतु, जामवंत कर जोरि कह।
नाथ नाम तव सेतु, नर चढ़ि भव सागर तरहिं॥
अर्थात् जाम्बवान् ने हाथ जोड़कर कहा- हे सूर्यकुल की कीर्ति को बढ़ाने वाले ध्वजास्वरूप हे नाथ श्री रामजी! सबसे बड़ा सेतु तो स्वयं आपका नाम ही है, जिस पर चढ़कर अर्थात् जिसका आश्रय लेकर मनुष्य संसार रूपी समुद्र से पार हो जाते हैं।
…. और हुआ भी यही। पाषाण पर श्रीराम का नाम लिखकर जब पत्थरों को समुद्र के पानी में डाला गया तो वह पत्थर तैरने लगे और आपस में इस तरह जुड़ते चले गए कि एक ऐसा सुदृढ़ सेतु बन गया जिस पर से होकर वानर सेना लंका तक जा सकती थी। भले ही यह अतिशयोक्ति प्रतीत हो किंतु इसके पीछे छिपा यथार्थ समझने की आवश्यकता है। यदि मन में विश्वास हो तो कोई भी कार्य असंभव नहीं है । वानर सेना के मन में श्री राम के प्रति अटूट विश्वास था। यह श्रीराम के नाम के प्रति विश्वास ही था जिसने उनके भीतर आत्मविश्वास जगा दिया और वे सेतु बनाने में सफल हो सके।
आत्म प्रबंधन या व्यक्तित्व प्रबंधन के लिए दूसरी विशेषता चाहिए आज्ञाकारिता की। श्रीराम जैसा आज्ञाकारी और कोई व्यक्तित्व अनुकरणीय नहीं है। श्रीराम चाहते तो वे अपने पिता दशरथ की आज्ञा को ठुकरा कर राजा बने रह सकते थे। सतयुग के बाद अनेक ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जब पुत्रों ने अपने पिता की आज्ञा की अवहेलना करते हुए स्वयं को राज सिंहासन पर स्थापित किया। यदि हम मुगल काल में देखें तो पिता और पुत्र के बीच टकराव का वीभत्स रूप दिखाई देता है। आगरा से अजमेर तक नंगे पांव चलकर मन्नतें मांग कर जिस पुत्र को अकबर ने पाया था वही पुत्र सलीम बड़ा होकर अपने पिता के विरुद्ध तलवार खींच कर खड़ा हो जाता है। उसका मकसद सिर्फ राजसत्ता यानी सिंहासन पाना था। इसके आगे देखें तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य दिखाई देता है जब औरंगजेब अपने पिता शाहजहां को इसलिए कारागार में बंदी बना देता है कि वह स्वयं बादशाह बन सके। देखा जाए तो वह अपने पिता को उम्र कैद की सजा दे देता है। अब यदि तुलना करके देखें तो सम्मान और प्रतिष्ठा उस व्यक्ति के नाम को मिलती है जिसने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राजसत्ता का मोह त्याग कर 14 वर्ष के वनवास को स्वीकार किया, वहीं जिस पुत्र ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया अथवा अपने पिता को कारावास में डाल दिया उसे इतिहास में भी लांछन ही मिला। अब अच्छा और श्रेष्ठ व्यक्तित्व किसका माना जाएगा श्रीराम का या पितृहंता पुत्रों का? स्पष्ट है कि श्रीराम का ही व्यक्तित्व श्रेष्ठ कहलाएगा और एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व का नाम श्रेष्ठ आत्म निर्माण की प्रेरणा देता है । ऐसे व्यक्तित्व से सीख मिलती है कि कैसे अपने आप को उत्तम बनाया जाए।
व्यक्तित्व प्रबंधन के लिए तीसरी विशेषता चाहिए सद्भावना की। यदि मन में दूसरों के प्रति कटुता का भाव नहीं है अपितु सद्भावना के विचार हैं तो ऐसा व्यक्ति विशाल व्यक्तित्व का कहलाएगा। यदि श्रीराम के व्यक्तित्व का आकलन किया जाए तो उनमें सद्भावना का सागर लहराता हुआ दिखाई देता है। उनके मन में अपने पिता, अपनी माता कैकई और अपने भाइयों के प्रति कटुता का भाव रंच मात्र नहीं था। उन्होंने भाई भरत को राज सत्ता देना सहर्ष स्वीकार कर लिया था। जिससे भाइयों के मध्य सदैव सद्भाव बना रहा। भरत राजसत्ता का भार ग्रहण करते हुए सिंहासन पर नहीं बैठे क्योंकि उनके सामने श्रीराम के सद्भाव का उदाहरण था। भरत ने भी श्रीराम के पद चिन्हों पर चलते हुए सद्भाव का परिचय दिया तथा श्रीराम की खड़ाऊ को सिंहासन पर रखकर राज्य किया अर्थात वह श्रीराम के प्रतिनिधि बनकर ही शासन संभालते रहे जबकि आगे चलकर द्वापर युग में हम देखें तो पाएंगे कि राजसत्ता के लिए ही भाइयों के बीच रक्त की नदियां बह गई और महाभारत का भयावह युद्ध हुआ। आज भी जमीन-जायदाद को लेकर भाइयों के बीच विवाद चलता रहता है। यह विवाद कभी कोर्ट कचहरी तक जाता है तो कभी-कभी आपसी मारपीट और हत्या तक पहुंच जाता है। यह सद्भावना की कमी के कारण होता है। यदि श्रीराम के चरित्र का अनुकरण किया जाए तो 14 वर्ष के वनवास के बाद भी राज्य शासन प्रतीक्षारत मिलता है यह बात गंभीरता से विचार करने योग्य है। सद्भावना का गुण व्यक्तित्व को उच्चता और श्रेष्ठता प्रदान करता है। अतः जब हम अपने व्यक्तित्व के प्रबंधन पर विचार करते हैं तो हमें श्रीराम के व्यक्तित्व का स्मरण करना चाहिए किसी धर्म विशेष से छोड़कर नहीं बल्कि एक श्रेष्ठतम व्यक्तित्व के रूप में, जिसने युगों-युगों तक अपने व्यक्तित्व से सभी को प्रभावित किया।
आज के उपभोक्तावादी युग में व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरे को सबसे छोटा सिद्ध करने पर तुला रहता है, भले ही ऐसा करते हुए वह स्वयं छोटा साबित हो जाता है। जबकि देखा जाए तो इस दुनिया में न कोई बड़ा होता है और न कोई छोटा। प्रत्येक मनुष्य की अपनी अहमियत होती है। कुर्सी पर अधिकारी के रूप में बैठने वाला व्यक्ति अथवा बड़े से बड़े पद पर आसीन व्यक्ति ही बड़ा नहीं होता है वरन् बड़ा तो वह भी होता है जो छोटा काम करता प्रतीत होता है। जबकि वस्तुतः कोई काम छोटा नहीं होता है। यदि मोची जूता न बनाएं अथवा न सुधारे तो नंगे पांव घूमने की नौबत आ जाएगी। इसी प्रकार यदि कुंभकार घड़े न बनाएं, दीया न बनाएं, तो न ठंडा पानी मिलेगा और न पूजा के लिए माटी के पवित्र दीपक मिलेंगे। छोटे बड़े का भेदभाव करना ही मूर्खता है। इस तरह की मूर्खता व्यक्तित्व को छोटा बना देती है, वहीं सभी व्यक्तियों को समान समझना और उनके गुणों का सम्मान करना व्यक्तित्व को विराटता प्रदान करता है, जैसा कि हम श्री राम के व्यक्तित्व में देख सकते हैं। उन्होंने न शबरी को छोटा समझा और न वानरों को।
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
मानउँ एक भगति कर नाता।।
अर्थात् श्रीराम ने शबरी से कहा- हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति का ही संबंध मानता हूँ॥
राम ने उन सभी के प्रेम और गुण को स्वीकार किया और उन्हें भी श्रेष्ठता का अनुभव होने दिया। यही तो व्यक्तित्व की श्रेष्ठता है। श्रीराम के व्यक्तित्व से इस गुण को भी आत्मसात करने की आवश्यकता है यदि हम अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं।
श्रीराम एक वैश्विक चरित्र हैं। उन्होंने राज्य विस्तार के लिए कभी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया, लेकिन जब सीता जी का अपहरण कर लिया गया तो उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे अन्याय के विरुद्ध खड़े हो सकते हैं और अन्यायी को दंडित कर सकते हैं। वे मात्र दो भाई थे राम और लक्ष्मण जिन्होंने रावण की विशाल सेना का सामना करने का निश्चय किया और लंका पहुंचकर सीता जी को मुक्त करा लाने का निश्चय किया। जब कोई व्यक्ति अच्छे कार्य के लिए दृढ़ निश्चय से मैदान में उतरता है तो उसे समर्थक अपने आप मिल जाते हैं जैसे कि श्रीराम को संपूर्ण वानर सेना, भाल्लुक सेना और यहां तक कि गिद्ध पक्षी से भी सहायता और समर्थन प्राप्त हुआ । यह आत्मविश्वास सभी को समान मानने का गुण ही था जिसने श्री राम को ऐसे विपरीत युद्ध में विजयश्री दिलवाई। आज जीवन में अनेक विपरीत परिस्थितियां पाई जाती हैं। बेरोजगारी सबसे बड़े विपरीत परिस्थिति है जिससे युवा अक्सर घबरा जाते हैं और निराशा में डूब जाते हैं, ऐसे युवाओं को श्रीराम के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेनी चाहिए कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हो अगर सच्चे मन से सिर्फ निश्चय के साथ डटे रहा जाए तो सफलता एक न एक दिन अवश्य मिलती है।
तात्पर्य यह है कि श्रीराम का नाम मात्र एक नाम नहीं है जिसे भजन के रूप में गा कर, सुबह-शाम स्मरण कर अपने व्यक्तित्व को विकसित मान लिया जाए। यदि व्यक्तित्व को समुचित विकास करना है, वर्तमान जीवन में सफलताएं प्राप्त करनी हैं तो श्रीराम के व्यक्तित्व के गुणों को आत्मसात करके स्वयं के व्यक्तित्व प्रबंधन को निखारना चाहिए।
और अंत में मेरा यह दोहा -
राम नाम के मर्म को, यदि समझें हम-आप।
बैर, क्लेष, कुण्ठा मिटे, मिटे सकल संताप ।।
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Wednesday, July 29, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 9 | छोटी ख़ुशियां, बड़ी ख़ुशियां | डॉ. वर्षा सिंह
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| Dr. Varsha Singh |
प्रिय ब्लॉग पाठकों, "विचार वर्षा"... मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "छोटी ख़ुशियां, बड़ी ख़ुशियां" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 29.07.2020
मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-
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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
छोटी ख़ुशियां, बड़ी ख़ुशियां
- डॉ. वर्षा सिंह
ख़ुशियां चाहे छोटी हो या बड़ी, जीवन में ऊर्जा का स्रोत होती हैं। अक्सर हम बड़ी ख़ुशी की चाहत में छोटी-छोटी ख़ुशियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। मैं एक सच्ची घटना आप सब से साझा कर रही हूं। मैंने इसमें सिर्फ नाम बदले हैं, पर है यह हकीकत। मेरे एक परिचित मनोज जी अच्छा ख़ासा कमाते थे। उनका एक ख़ुशहाल परिवार है जिसमें उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चे भी अपने परिवार को ख़ुश रखने का हर संभव प्रयास करते रहते थे, लेकिन कुछ अरसा पहले ही मानो उनकी ख़ुशियों को उनकी अपनी चाहत का ही ग्रहण लग गया। एक दिन उनकी बेटी ने पड़ोस में रहने वाले मलहोत्रा जी की एक कार को देखकर बचपने के भाव में ही मनोज जी से यह कह दिया कि पापा अगर हमारे पास भी कार होती तो कितना मज़ा आता। मनोज जी ने यह बात अपने दिल पर ले ली और उन्हें लगा कि यदि मैं अपने बच्चों के लिए कार खरीद दूं तो उन्हें और ज्यादा ख़ुशी मिलेगी। लेकिन बच्चों की प्राइवेट स्कूल की फीस, खान-पान, अन्य घर ख़र्च आदि के चलते फिलहाल उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे कार अफ़ोर्ड कर पाते। तब उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाने का विचार किया और वे अपने पद का दुरुपयोग करने लगे। कार की चाहत में वे इस हद तक डूब गए कि उन्हें पता ही नहीं चला कि वे कब एक भ्रष्ट अधिकारी का रूप लेते चले गए। फिर एक दिन अचानक उनके घर पर छापा पड़ा और तब उनकी सारी सम्पत्ति सीज़ कर दी गई। उसमें वह सम्पत्ति भी शामिल थी जो उन्होंने अपनी मेहनत से कमाई थी। यानी कहां तो मनोज जी एक बड़ी ख़ुशी देने के लिए प्रयासरत थे और पता चला कि इस प्रयास में ग़लत रास्ता अपनाते हुए उन्होंने अपने और अपने परिवार की छोटी-छोटी ख़ुशियों को भी अपने ही हाथों मिटा डाला। आज उनका परिवार मुक़दमेबाज़ी में उलझा हुआ है। उनकी पत्नी परेशान रहती हैं और बच्चे मां-बाप की परेशानियों की सज़ा भुगत रहे हैं।
जब भी मैं इस घटना के बारे में सोचती हूं तो मुझे लगता है कि हमारे जीवन में जो छोटी-छोटी खुशियां है वह मिलकर भी एक बड़ी ख़ुशी का रूप ले सकती हैं, सिर्फ उन्हें ध्यान से देखने, परखने और समझने की ज़रूरत होती है।
अक्सर हम जब कहीं घूमने जाते हैं, बाग़-बग़ीचे देखते हैं तो मन ख़ुशी से भर उठता है। यदि हम यह सोचने लगें कि काश, हमारे पास भी ऐसा ही फूल-पौधों भरा ख़ूबसूरत-सा बहुत बड़ा गार्डन होता, तो हमें बेचैनी होने लगेगी। सारी ख़ुशी कुण्ठा में तब्दील हो जाएगी। उस बड़े से ख़ूबसूरत गार्डन को हासिल करने की चाहत रातों की नींद और दिन का चैन छीन लेगी। लेकिन यदि हम यह सोचें कि इतने बड़े गार्डन के बजाए कुछ ख़ूबसूरत फूलों के पौधों के गमले हम अपने टैरेस, बालकनी, छत या आंगन में रख कर उनकी देख-भाल करें तो कितना मज़ा आएगा। जी हां, अक्सर सिर्फ़ एक फूल के पौधे के लालन-पालन में जो ख़ुशी मिलती है, वह एक बड़ा सा गार्डन लगाकर उसे माली के हवाले कर देने में नहीं मिलती। छोटी खुशियों का अपना अलग महत्व होता है। यही छोटी-छोटी खुशियां मिलकर खुशियों का एक बहुत बड़ा संसार बना देती हैं।
मुझे याद आ रही है वह इतालवी लोककथा जिसमें ख़ुशी का वास्तविक अर्थ व्याख्यायित है।
एक शांतिपूर्ण और शक्तिशाली राज्य के शासक राजा गिफ़ाड का युवा पुत्र राजकुमार जोनाश कुछ दिनों से अकसर अपने कमरे की खिड़की के पास बैठकर दुखी मन से खिड़की से बाहर देखता रहता। राजा गिफ़ाड को जब यह पता चला तो वे चिंतित हो उठे और उन्होंने राजकुमार जोनाश से पूछा कि आख़िर कौन-सी बात उसे परेशान कर रही है ? बहुत देर तक पूछने के बाद जोनाश ने बताया कि उसे महल के बड़े-बड़े तामझाम की किसी चीज़ में ख़ुशी महसूस नहीं होती। वह खुश रहना चाहता है लेकिन वह नहीं जानता कि कैसे ख़ुश रहे। यह सुन कर राजा और अधिक चिंतित हो उठा। तब उसने इस समस्या का हल निकालने के लिए अपने राज्य के बेहतरीन चिकित्सकों, ज्योतिषियों और विद्वानों से विचार-विमर्श किया। सबने विमर्श उपरांत एकमत हो कर यह निष्कर्ष निकाला कि राजकुमार की सहायता करने के लिए एक ऐसा व्यक्ति खोजना होगा जो अपने जीवन से पूरी तरह ख़ुश और संतुष्ट हो। फिर उस व्यक्ति की कमीज़ यदि राजकुमार जोनाश को पहना दी जाए तो राजकुमार को सुख और ख़ुशी का अनुभव होने लगेगा।
ख़ुश और संतुष्ट व्यक्ति की तलाश पूरे राज्य में होने लगी। लेकिन खोज़कर्ताओं को ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं मिल रहा था। तब एक दिन परेशान राजा गिफ़ाड ने मनबहलाव के लिए शिकार पर घने जंगल में जाने का फ़ैसला किया। शिकार पर निकले राजा गिफ़ाड को जंगल में बहने वाली नदी के किनारे सरकंडों के बीच निश्चिंत भाव से ख़ुशी से सीटी बजाता, पीठ के बल लेटा कर आसमान में तैरते बादलों को निहारता हुआ एक ख़ूबसूरत युवक दिखाई दिया। राजा ने युवक की ख़ुशी का मापन करने के लिए उस युवक से पूछा कि यदि उसे राज्य का आधा हिस्सा मिल जाए तो क्या उसे ख़ुश होगी। युवक हंस पड़ा और बोला कि वह तो वैसे ही बहुत ख़ुश है, आधा राज्य ले कर सिरदर्दी नहीं पालना चाहता। राजा समझ गया कि यही वह युवक है जिसकी क़मीज़ उसके पुत्र के लिए वरदान साबित होगी। राजा ने राजकुमार जोशान का पूरा हाल बता कर युवक से उसकी क़मीज़ मांगी। युवक हंस कर उठ बैठा, राजा ने देखा कि उस ख़ुशमिज़ाज और सुखी व्यक्ति ने कमीज़ ही नहीं पहनी हुई थी। राजा को अहसास हो गया कि असली ख़ुशी पाने के लिए छोटी ख़ुशियों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। अनेक छोटी-छोटी ख़ुशियां जीवन को बड़ी ख़ुशी देती हैं।
और अंत में मेरी एक ग़ज़ल के ये दो शेर…
जंगल में, वादियों में, पत्थर में, रेत में,
कुछ फ़र्क नहीं करती, बहती है जब नदी।
देखा है मैंने "वर्षा", ग़म के पहाड़ पर
अक्सर पड़ी है भारी, छोटी सी इक ख़ुशी।
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सागर, मध्यप्रदेश
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Wednesday, July 22, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 8 | पंखुरी है प्रेम | डॉ. वर्षा सिंह
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 22.07.2020
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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
पंखुरी है प्रेम
-डॉ. वर्षा सिंह
यूरोप में प्रेमीजन अपने प्रेम और अपने प्रेमी की जांच करने के लिए लव्ज़ मी, लव्ज़ मी नॉट… अर्थात् वह मुझसे प्यार करता है, वह मुझसे प्यार नही करता … कहते हुए फूल की एक-एक पंखुरी तोड़ते जाते हैं और अंतिम पंखुरी तोड़ते समय लव्ज़ मी या लव्ज़ मी नॉट में से जो भी वाक्यांश उच्चारित होता है, उसके आधार पर प्रेम और प्रेमी का आकलन करते हैं। प्रेम फूल की पंखुरी-सा एक नाज़ुक अहसास जो है… और प्रेम के प्रदर्शन का माध्यम भी।
फिल्म सरस्वतीचंद्र में लिखा इन्दीवर का गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था -
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है
प्रियतम मेरे तुम भी लिखना, क्या ये तुम्हारे क़ाबिल है
प्रेम में फूल का अपना एक महत्व होता है। खिले हुए फूल एक-दूसरे को उपहार स्वरूप देकर प्रेम प्रकट किया जाता है। फूल दे कर प्रेम प्रदर्शन की रीत वैलेंटाइन मनाने वाले योरोपीय देशों मात्र में ही नहीं बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप का भी हिस्सा है। ज़रूरी नहीं कि लाल गुलाब दे कर ही प्रेम प्रदर्शित किया जाता हो। हर वह नाज़ुक-सा फूल जो प्रेम की भावनात्मकता से जुड़ा हो प्रेम प्रदर्शन का जरिया बन जाता है।
कालिदास लिखित जगप्रसिद्ध संस्कृत नाटक "मालविकाग्निमित्र" में द्वितीय शुंग शासक अर्थात् विदिशा के राजा अग्निमित्र की दूसरी रानी इरावती वसंत ऋतु के आगमन पर प्रेमाभिलाषा प्रकट करने के लिए राजा अग्निमित्र के पास लाल कुरबक के नवीन पुष्पों को भिजवाती है। कुरबक के फूल कचनार के फूलों के समान आकर्षक और कोमल पंखुरियों वाले होते हैं।
प्रेम के प्रतीक नाज़ुक पंखुरियों वाले फूल को यदि प्रेमीजन द्वारा सहेज कर रखा गया हो तो सूखने के बाद भी वर्षों तक उस फूल में निहित प्रेम और प्रेम भरे पलों की यादें की ताज़गी, उसकी सुगंध मानव मस्तिष्क में बसी रहती है। अभी पिछले लगभग दो दशक पहले तक यानी बीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण तक, जब कम्प्यूटर का वर्चस्व, वर्तमान समय जितना नहीं था, क़िताबों से दोस्ती गहरी और सुकून देने वाली हुआ करती थी, तब उन दिनों में अक्सर प्रेमोपहार स्वरूप मिले फूल को किसी पसंदीदा किताब के पन्नों में दबा कर रख दिया जाता था। जब कभी वह किताब खुलती और उस किताब का वह पन्ना सामने होता तो मुरझाया ही सही, वह फूल भी सामने आ जाता था और सामने आ कर दिल में अजीब-सी हलचल जगा कर उन क्षणों की अनायास ही याद दिला देता, जब आपस में दो प्रेम करने वालों में से किसी एक ने दूसरे को प्रेम के प्रतीक फूल को उपहार स्वरूप भेंट किया होता था। भले ही फूल सूख चुका होता था लेकिन प्रेम की महक का अहसास पूरी शिद्दत से दिलो दिमाग छा जाता था।
किताब में दबे हुए सूखे फूल की चर्चा शायर "अहमद फ़राज़" ने अपने इस मतले में यूं की है -
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें।
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।
किताब में दबा हुआ फूल, प्रेम के पलों की यादों को किस तरह ताज़ा कर देता है डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के इस मतले से बयां हो रहा है -
किसी किताब में एक फूल सी दबी यादें ।
दिखी हैं आज हथेली पे वो रखी यादें ।
यकीनन, किताबों में सहेज कर रखा गया फूल प्रेम में डूबे हुए पलों की यादें ताज़ा कर देता है लेकिन यदि उस फूल को सहेज कर नहीं रखा गया और गुलदान में रखे हुए फूल की तरह उसे मुरझाने के बाद कूड़ेदान में फेंक दिया गया तो प्रेम भी अतीत के साथ ही कालकवलित हो जाता है। तब न तो फूल शेष रह जाता और न ही प्रेम का ताज़गी भरा अहसास। इसलिए प्रेम को भी फूल की तरह सहेज कर रखा जाना चाहिए। संबंधों में बंधा हुआ प्रेम अगर टूट जाए तो अदालत की ड्योढ़ी तक जा पहुंचता है। पंखुरी दर पंखुरी सहेजा गया प्रेम ही जीवन को संवारता है। संवेदनाओं को नित नई ऊर्जा से भरता है। प्रेम मुरझाए हुए फूल में भी जीवंतता भर देता है। हम सहेज लें प्रेम को फूल की पंखुरी की तरह।
और अंत में प्रस्तुत है मेरी एक ग़ज़ल का मतला…
भूली बिसरी याद जाग कर हलचल करती है दिल में।
सूखा फूल मिला हो जैसे किसी पुराने नॉविल में।
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सागर, मध्यप्रदेश
Wednesday, July 15, 2020
बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 7 | पहली डांट | डॉ. वर्षा सिंह
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| Dr. Varsha Singh |
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 15.07.2020
मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-
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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
पहली डांट
-डॉ. वर्षा सिंह
सुबह अख़बार पढ़ते समय अंदर के पृष्ठ पर अचानक मेरी नज़र आख़िरी कॉलम के कोने में प्रकाशित उस सूचना पर पड़ गई जिसमें सूचनाकर्ता के हवाले से लिखा था कि फलां आवारागर्द शख़्स सूचनाकर्ता व्यक्ति का बेटा है जिसका अब सूचनाकर्ता से किसी तरह का कोई भी संबंध नहीं है। यूं तो अख़बारों में इस तरह की सूचनाएं प्रकाशित होना कोई ख़ास बात नहीं है, लेकिन कहीं किसी ख़बर से को-रिलेट इस सूचना ने मेरे चिंतन के दरवाज़े पर ज़ोरदार दस्तक दे दी।
अक्सर ऐसा होता है कि बिगड़ी औलाद के माता-पिता को इस तरह का कठोर क़दम उठाने पर मज़बूर हो जाना पड़ता है। परिस्थितियां इस तरह निर्मित हो जाती हैं कि अपने ज़िगर के टुकड़े, अपनी सगी औलाद से उन्हें सारे रिश्ते ख़त्म करने के लिए मज़बूर हो जाना पड़ता है। लेकिन ऐसी परिस्थितियों के निर्मित होने के लिए ज़िम्मेदार आख़िर कौन होता है ? क्या वे बिगड़ैल आवारागर्द बच्चे या स्वयं माता-पिता ?
गहराई और गम्भीरता से यदि इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो यह तथ्य सामने आता है कि कहीं न कहीं इस सबके लिए पेरेंट्स यानी बच्चे के माता - पिता ही ज़िम्मेदार रहते हैं। यह कहा जाता है कि किसी भी बच्चे की पहली पाठशाला, उसका अपना घर ही होता है और पहली शिक्षिका उसकी अपनी मां होती है।
इस संदर्भ में मुझे याद आ रही है मेरी अनुजा डॉ. (सुश्री) शरद सिंह द्वारा लिखी "भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं" पुस्तक में भील आदिवासियों के मध्य प्रचलित एक कथा… इस कथा का मुख्य पात्र सानक बचपन में कहीं जाता तो चोरी से वहां की कोई न कोई चीज़ उठा लाता। उसकी मां उस चोरी की हुई चीज़ को देख कर सानक को डांटने के बजाए शाबाशी देती और इसी तरह चीज़ें चुरा कर लाने के लिए प्रोत्साहित करती। सानक जब युवा हुआ तो एक दिन उसने सेठ के घर चोरी करने का निश्चय किया। सेठ के घर से कीमती सामान चुरा कर सानक जब भागने का प्रयास कर रहा था, तभी चौकीदार ने उसे देख लिया। घबराहट में सानक ने वहां रखी वज़नदार सुराही चौकीदार के सिर पर दे मारी, जिससे चौकीदार का सिर फूट गया और उसकी मृत्यु हो गई। सानक पकड़ा गया। उसे चोरी के साथ ही हत्या का भी दोषी पाया गया। सानक को मृत्युदंड की सज़ा सुना दी गई। जब फांसी दिए जाने के पूर्व सानक से उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो सानक ने अपनी मां से मिलने की इच्छा प्रकट की। मां बेटे से मिलने आई तो उसे फांसी के फंदे के पास देख कर फूट-फूट कर रोने लगी। तब सानक ने मां से कहा- "अरे, तुम क्यों रो रही हो ? यह तो तुम्हारी ही दी हुई शिक्षा और प्रोत्साहन का नतीज़ा है। तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए।"
मां यह सुन कर सन्न रह गई। सचमुच असली अपराधी तो वह स्वयं है। वह रोते हुए न्यायाधीश से प्रार्थना करने लगी कि सानक को चूंकि उसने ही चोरी करने के लिए प्रोत्साहित किया था अतः फांसी की सज़ा सानक के बदले उसे दे दी जाए। न्यायाधीश समझ गए कि मां-बेटे दोंनों की आंखें खुल गई हैं तो उन्होंने सानक की फांसी की सज़ा को बदल कर मां- बेटे को जीवन भर मृतक चौकीदार के आश्रितों की सेवा करने की सज़ा सुना दी।
इस कहानी का भी यही निष्कर्ष है कि यदि मां ने बचपन में की गई पहली चोरी के लिए अपने पुत्र को डांट दिया होता और उसे प्रोत्साहित करने के बजाए भविष्य में चोरी न करने के लिए समझाया होता तो पुत्र चोरी और फिर हत्या जैसा अपराध कभी नहीं करता।
… और इस प्रसंग से तो सभी परिचित होंगे कि महात्मा गांधी जब अपनी युवावस्था में उच्च शिक्षा प्राप्त करने विदेश जाने लगे तो उस समय महात्मा गांधी की माता पुतली बाई ने उन्हें शपथ दिलाई थी कि - 'बेटा, तुम मेरे सामने प्रतिज्ञा करो कि मै मांस नहीं खाऊंगा, मदिरा नहीं पीऊंगा और कुसंगति में पड़कर गलत मार्ग नहीं अपनाऊंगा।' महात्मा गांधी द्वारा यह शपथ लेने के बाद ही उनकी माता ने उन्हें विदेश जाने की आज्ञा दी थी। जिसे उन्होंने आजीवन निभाया भी। मुद्दे की बात यह है कि बचपन में मिली शिक्षा मनुष्य को श्रेष्ठ भी बना सकती है और एक अपराधी के रूप में उसे एनकाउंटर की गोली के सामने भी पहुंचा सकती है। यह निर्भर करता है कि बचपन में उसे कैसी शिक्षा दी गई। उसके पहले गलत कदम पर रोक लगाई गई या नहीं।
और अंत में मेरी ये काव्य पंक्तियां….
मैं हूं कच्ची मिट्टी, माता ! जैसा चाहो ढालो ।
देव बना लो चाहे मुझको, दानव मुझे बना लो।
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सागर, मध्यप्रदेश ।
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