Showing posts with label कोरोनाकाल. Show all posts
Showing posts with label कोरोनाकाल. Show all posts

Wednesday, September 2, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 14 | मन का तिलस्म | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय मित्रों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "मन का तिलस्म" और अपने विचारों से अवगत कराएं ...और शेयर करें 🙏

हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏

दिनांक 02.09.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-

https://yuvapravartak.com/?p=40375

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

               मन का तिलस्म

                        -डॉ. वर्षा सिंह   

     अभी पिछले दिनों की ही बात है, मेरी एक सहेली ने मुझे मेरे जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने के लिए व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल किया। शुभकामनाएं देने के बाद घर-परिवार की अन्य चर्चाएं होने लगीं। बच्चों की बात चली तो वह बताने लगी कि इस कोरोनाकाल में जबसे ऑनलाईन पढ़ाई हो रही है, बच्चों का पढ़ाई में मन ही नहीं लग रहा है। बाहर जाने की छूट नहीं मिलने के कारण घर के भीतर खेले जा सकने वाले इनडोर गेम्स में भी मन नहीं लग रहा है। फिर और चर्चाएं आगे बढ़ीं तो वह बोली कि कहीं घूमने नहीं जा पाने के कारण ख़ुद उसका और उसके पतिदेव का मन भी कहीं किसी काम में नहीं लगता है।… यानी मन न लगने की समस्या से मेरी उस सहेली का पूरा परिवार ग्रसित हो गया है।

      यह मन नहीं लगने की समस्या इन दिनों आम है। जिससे भी बात करें वह गाहे बगाहे यह ज़रूर कह उठता है कि क्या बताऊं, फलां काम में मन ही नहीं लगता। मन… आख़िर यह मन है क्या ? मेरी विचार-श्रृंखला अनजाने ही मन के तिलस्म की गुत्थी को सुलझाने की दिशा में मुड़ गई। 

      कितने ही हिन्दी फ़िल्मों के गीत अचानक याद ही मुझे याद आने लगे। फ़िल्म "काजल" का मशहूर गीत " तोरा मन दर्पण कहलाए / भले, बुरे, सारे कर्मों को देखे और दिखाए" फिल्म "चित्रलेखा" का गीत "मन रे, तू काहे न धीर धरे"  फिल्म "धूपछांह" का गीत "मन की आँखें खोल, बाबा, मन की आँखें खोल" ।

        फ़िल्मों में मन पर केंद्रित गीतों की भरमार है। हिन्दी काव्य साहित्य में कवियों द्वारा मन के लगने, न लगने सहित मन की गति पर अनेक पद्य-पंक्तियां रची गई हैं। 

रामचरित मानस, विनयपत्रिका, कवितावली, दोहावली आदि के रचयिता तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में मन की अनेक दशाओं का वर्णन किया है -

कहं लौ कहौ कुचाल कृपानिधि, जानत हों गति मन की।

तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की।

तुलसीदास का एक और चर्चित पद है- 

मन पछितैहै अवसर बीते ।

दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते ॥

सहसबाहु, दसबदन आदि नप बचे न काल बलीते।हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥

इसी प्रकार मीराबाई ने अपना मन बरसाने में लगने की बात अपने इस पद में की है -

मेरो मन लाग्यो बरसाने में जहां विराजे राधा रानी।मन हट्यो दुनियादारी से जहां मिले खारा पानी।।

संत कबीर ने भी मन लगने की बात कुछ इस तरह से की है -

मन लागो मेरो यार फकीरी में ।

जो सुख पावो राम भजन में, सो सुख नाहीं अमीरी में ॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो,

साहिब मिले सबुरी में ॥

कबीर ने मन को सर्वोपरि बताते हुए कहा है -

मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।

कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत ।

अर्थात् जीवन में जय पराजय केवल मन की भावनाएं हैं।यदि मनुष्य मन में हार गया – निराश हो गया तो  पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है। ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकते हैं – यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?

भक्त कवि सूरदास सिर्फ़ एक मन से संतुष्ट नहीं हैं, वे और अधिक मन, यथा- दस-बीस मन चाहते हैं। उद्धव और गोपियों के संवाद का सुंदर चित्रण करते हुए वे कहते हैं -

ऊधो, मन न भए दस बीस।

एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥

तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥

अर्थात् इस संवाद में गोपियां उद्धव से कहती हैं कि उनके पास तो एक ही मन है, जो कृष्ण के विचारों में डूबा है, कृष्ण को समर्पित है। अतः दूसरी ओर ध्यान भी नहीं जा सकता, पुनः निर्गुण ब्रह्म की उपासना कैसे हो ! यदि दस-बीस मन रहता, तो अन्य विषयों का भी ध्यान आता।

   मन का अपना समूचा विज्ञान है यानी मनोविज्ञान। मनोविज्ञान को अंग्रेजी भाषा में  सायकॉलजी कहते है। इस शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के साइकी तथा लोगस शब्दों से हुई है । साइकी का अर्थ है आत्मा यानी सोल और  लोगस का अर्थ है अध्ययन या विचार –विमर्श । इस प्रकार 16 वीं शताब्दी में ग्रीस नामक देश में दार्शनिकों ने इसके शाब्दिक अर्थ के अनुसार इसे ‘आत्मा का अध्ययन करने वाला विज्ञान' माना । और इसी शाब्दिक अर्थ के कारण मनोविज्ञान को ‘आत्मा का ज्ञान’ के रूप में परिभाषित किया जाने लगा। जी हां, मन शब्द का प्रयोग कई अर्थों में किया जाता है, जैसे- आत्मा, चित्त, मनोभाव, मानस, मत इत्यादि और यदि मनोविज्ञान के नज़रिए से देखा जाए तो मन का तात्पर्य आत्मन्, स्व या व्यक्तित्व से है। यह एक अमूर्त सम्प्रत्यय है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। हवा की तरह इसे न तो हम देख सकते हैं और न ही हम इसका स्पर्श कर सकते हैं । दूसरे शब्दों में मस्तिष्क के विभिन्न अंगों की प्रक्रिया का नाम मन है। 

   प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रायड के अनुसार ‘मन से तात्पर्य व्यक्तित्व के उन कारकों से होता है जिसे हम अन्तरात्मा कहते हैं तथा जो हमारे व्यक्तित्व में संगठन पैदा करके हमारे व्यवहारों को वातावरण के साथ समायोजन करने में मदद करता है।' 

       एक अन्य मनोवैज्ञानिक रेबर के अनुसार- ‘‘मन का तात्पर्य परिकल्पिक मानसिक प्रक्रियाओं एवं क्रियाओं की सम्पूर्णता से है, जो मनोवैज्ञानिक प्रदत्त व्याख्यात्मक साधनों के रूप में काम कर सकती है। 

      अत: मन की मात्र कल्पना कर सकते हैं। इसको न तो देखा जा सकता है और न ही इसका स्पर्श किया जा सकता है। मन, किसी चीज का वह व्यक्तिगत, आत्मपरक अनुभव है जो प्रतिपल परिवर्तित होता रहता है। मन की संकल्पना जटिल है और यह विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग है। बौद्ध मत में मन के लिए संस्कृत के चित्त शब्द का उपयोग होता है और इसका अर्थ अत्यंत व्यापक है। इसमें संज्ञान, धारणा, अनुभव, मूर्त एवं अमूर्त विचार, भावनाएं, सुख-दुःख की अनुभूति, ध्यान, एकाग्रता और बुद्धि इत्यादि अर्थ समाविष्ट है। जब बौद्ध मत मन का उल्लेख करता है तो इसमें सभी प्रकार की मानसिक गतिविधियां निर्दिष्ट हैं।

      बचपन में मैंने एक कहानी पढ़ी थी - एक बार की बात है। बहुत से मेंढक जंगल से जा रहे थे। उन सभी का मन आपसी बातचीत में रमा हुआ था। तभी रास्ते में एक बड़ा सा गड्ढा मिला, जिसे नहीं देख पाने के कारण उनमें से दो मेंढक उस गड्ढे में गिर पड़े। गड्ढा बहुत गहरा था।

   साथी मेंढकों ने गड्ढे में गिरे उन दो मेंढकों को आवाज लगाकर कहा कि इतने गहरे गड्ढे से बाहर निकल पाना असंभव है। इसलिए अब तुम स्वयं को मरा हुआ मान लो। लेकिन गड्ढे में गिरे हुए वे दोनों मेंढक अपने उन साथियों की बात को अनसुना करके बाहर निकलने के लिए और ज़ोर से उछल-कूद करने लगे। थोड़ी देर तक उछल-कूद करने के बाद भी जब गड्ढे से बाहर नहीं निकल पाए तो एक मेंढक ने बाहर निकलने की आशा छोड़ दी और वह गड्ढे में और नीचे की तरफ लुढ़क गया। नीचे लुढ़कते ही वह मर गया।

लेकिन दूसरे मेंढक ने कोशिश जारी रखी और अंततः पूरा जोर लगाकर एक छलांग लगाने के बाद वह गड्ढे से बाहर आ गया। जैसे ही दूसरा मेंढक गड्ढे से बाहर आया तो बाकी मेंढक साथियों ने उससे पूछा - जब हम तुम लोगों से कह रहे थे कि गड्ढे से बाहर आना संभव नहीं है तो भी तुम छलांग क्यों मारते रहे ? तब उस मेंढक ने जवाब दिया- दरअसल मैं सुनता सबकी हूं, लेकिन करता अपने मन की हूं और इसीलिए जब मैं छलांग लगा रहा था तो आप लोगों की आवाज़ों को मैंने अपने मन में इस तरह से महसूस किया मानों आप सभी मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं और बाहर आ जाओ कह रहे हैं। इसलिए मैंने कोशिश जारी रखी और इसीलिए मैं बाहर आ सका। मेरा सिद्धांत है कि सुनो सबकी, करो मन की।

      मन की आवाज़ तभी हम सुन पाते हैं जब मन को कहीं केन्द्रित करते हैं यानी किसी कार्य विशेष में मन लगाते हैं।

        ऐसी ही एक और कहानी मुझे याद आ रही है - एक जंगल में एक कौवा रहता था। वह अक्सर अन्य पक्षियों के रंगबिरंगे पंखों को देखकर अपने काले रंग के प्रति बहुत उदास हो जाता था।

      एक दिन कुछ यूं हुआ कि जिस पेड़ पर कौवा बैठा था उसी पेड़ पर बगुला भी आ बैठा। कौए को चुपचाप देख बगुले ने कौए से उसकी उदासी का कारण पूछ लिया तब कौवे ने कहा- मैं जितना काला हूं, तुम उतने ही गोरे हो। मेरे इस काले रंग के कारण मुझे कोई पसन्द नहीं करता। मेरा जीवन व्यर्थ है।

 बगुले यह सुन कर कहा- अरे, मैं तो ख़ुद अपने गोरेपन से असंतुष्ट हूं। मुझसे ज़्यादा सुंदर तो तोता है उसके पंख हरे-हरे हैं, उसके चोंच लाल है। काश, मैं भी तोते की तरह रंगबिरंगा होता। 

कौए ने ही मन में सोचा कि बगुला कह तो सही रहा है। इससे तो ज़्यादा सुंदर तोता होता है। एक दिन कौए को रास्ते में तोता मिल गया। तब कौए ने तोते से कहा कि मैं एकदम काला हूं लेकिन तुम रंगबिरंगे बहुत सुंदर हो । कौए की बात सुन कर तोता ने कौवे से कहा- इस दुनिया में  सबसे सुंदर पक्षी तो मोर है। उसके पंख कितने रंग बिरंगे और चटकीले होते हैं । उसे देख कर मैं सोचता हूं कि काश, मैं भी मोर होता। तोते की बात सुन कर कौए ने मोर से मिलने की ठानी। वह जंगल में मोर को ढूंढने लगा लेकिन पूरे जंगल में उसे कहीं भी मोर दिखाई नहीं दिया। तब किसी ने कौए को बताया कि तुम्हें यदि मोर से मिलना है तो शहर जाओ। वहां चिड़ियाघर के अंदर तुम्हें मोर मिल जाएगा। मनुष्यों ने आजकल मोर को चिड़ियाघर में रखा है।

         यह बात सुन कर  कौवा मोर से मिलने जंगल से उड़कर शहर के चिड़ियाघर में जा पहुंचा। वहां उसने देखा कि मोर एक पिंजरे में बंद है। कौए ने मोर से कहा कि - मोर भाई तुम कितनी सुंदर हो, तुम्हारे हरे-नीले पंख कितने चटकीले हैं। मैं मन ही मन बहुत दुखी रहता हूं। सोचता हूं कि काश, मैं भी मोर होता तो कितना अच्छा होता।

    कौए की बात सुनकर मोर की आंखों से आंसू आ गए। वह बोला- हां, मैं सुंदर हूं लेकिन तुम्हारी तरह आज़ाद नहीं। मैं आसमान में उड़ नहीं सकता। पिंजड़े में बंद रहता हूं । तुम आज़ाद हो। अपने मन को समझाओ और अपने रंग से संतुष्ट रहो।

       तो मित्रों, मन नहीं लगता कहने से काम नहीं चलने वाला है। यदि ख़ुश और संतुष्ट रहना चाहते हैं तो मन लगाईए। क्योंकि कहते हैं न…. मन के हारे हार है मन के जीते जीत। सारा योरोप यूनान की फौजों से संत्रस्त था। अजेय समझी जाने वाली यूनानियों की धाक उन दिनों सब देशों पर छाई हुई थी और जिस पर भी आक्रमण होता वह हिम्मत हारकर बैठ जाता और अपनी पराजय स्वीकार कर लेता। 

      रोम के सेनापति सीजर ने देखा कि इस व्यापक पराजय का कारण लोगों में मानसिक दुर्बलता, आत्महीनता ही है, जिसके कारण उन सभी ने स्वयं को दुर्बल और यूनानियों को बलवान स्वीकार कर लिया है। इस मनःस्थिति को बदला जाना चाहिए। अतः सीजर ने यह संदेश प्रसारित करवाया कि यूनानी फौजें तभी तक अजेय हैं, जब तक हम उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं। यदि अपने मन में सोच लो कि हम अजेय हैं तो कोई हमें हरा नहीं सकता। सीजर के संदेश का रोम की जनता पर जादू जैसा असर हुआ और अजेय समझा जाने वाले यूनान को रोम ने परास्त कर दिया।

    मन का तिलस्म मन पर नियंत्रण रख कर ही बूझा जा सकता है। मन को लगाईए, मन को समझाईए, ताकि आप साबित कर सकें कि आप का मन आपकी कमज़ोरी नहीं, आपकी ताक़त है।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी काव्यपंक्तियां ….

मन तिलस्म है, जब तक उसको बूझा ना जाए।

सब सम्भव है यदि मन मुश्किल से ना घबराए।

              -----------------

सागर, मध्यप्रदेश

#PostForAwareness #विचारवर्षा

#युवाप्रवर्तक #मन #फ्रायड #रेबर #तिलस्म #मनोविज्ञान #कोरोना #कोरोनाकाल #मेंढक #कौआ

Wednesday, June 24, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 4 | सम्हलिए, संकट अभी टला नहीं है ! | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "सम्हलिए, संकट अभी टला नहीं है !" 🙏 अपने विचारों से अवगत कराएं और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 24.06.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-
http://yuvapravartak.com/?p=36964

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

सम्हलिए, संकट अभी टला नहीं है !
       - डॉ. वर्षा सिंह

      कल शाम की ही बात है मेरी कॉलोनी में मैंने बाहर के कुछ बच्चे देखे। वह बच्चे कॉलोनी से बाहर के हैं यह देखते ही मैं समझ गई क्योंकि उन बच्चों ने मास्क नहीं पहना हुआ था। जी हां, मेरी कॉलोनी के बच्चे जब भी घर से बाहर निकलते हैं वे हमेशा कोरोना संक्रमण के खतरे से बचने के उद्देश्य से मास्क जरूर पहनते हैं । उन बच्चों को देखकर मैं स्वयं पर काबू नहीं रख पाई और मैंने उन बच्चों को टोंक ही दिया । मैंने उनसे पूछा - "बच्चों, आप कहां रहते हो? यहां इस कॉलोनी के तो हो नहीं ।" तो बच्चे बोले- "आंटी हम पीछे वाले मैदान के बाजू में रहते हैं। मैंने कहा -"बेटा तुम जानते हो कि कोरोना महामारी का संक्रमण फैला हुआ है लेकिन तुमने मास्क नहीं पहना है, ऐसा क्यों ? क्या तुम्हें तुम्हारी मम्मी-पापा ने कोरोना के खतरे से बचने के लिए मास्क पहनना नहीं सिखाया?"
     तब उन बच्चों ने जो जवाब दिया उसे सुनकर मैं हैरान रह गई उनका कहना था कि उनके परिवार के बड़े भी घर से कहीं बाहर जाते हैं तो मास्क नहीं पहनते। वे कहते हैं कि लॉकडाउन में हमने वह सब कुछ कर लिया जो सरकार ने हमसे कहा लेकिन अब तो अनलॉक चल रहा है।अब कैसा मास्क और कैसी सोशल डिस्टेंसिंग? और कोरोना सभी को तो हो नहीं रहा है। किसी-किसी  मोहल्ले में एकाध-दो केस मिलते हैं । तो भला हम क्यों डरें ?
यह तो हुआ एक वाकया और अब देखें दूसरा वाकया... आज सुबह सवेरे समाचार पत्र खोलते ही सबसे पहले मेरी नजर पड़ी सब्जी मंडी की उस तस्वीर पर जिसमें बहुत सारी भीड़ दिखाई दे रही थी और लोग बगैर मास्क पहने डिस्टेंसिंग के नियम की धज्जियां उड़ाते दिखाई दे रहे थे। समाचार पत्र में भी इसी बात को लेकर चिंता प्रकट की गई थी कि लोग किस कदर लापरवाही बरत रहे हैं, न तो मास्क और न ही सोशल डिस्टेंसिंग का पालन। लोग मंडी में खांसते -छींकते एक दूसरे से सट कर खड़े हुए हैं मानो उन्हें इस तरह दुस्साहस करता देखकर कोरोनावायरस खुद ही भयभीत हो जाएगा। मुझे लगता है कि यह एक तरह की ढिठाई है, लापरवाही है और मूर्खता भी। क्योंकि कोरोना संक्रमण की विभीषिका का असर हम पूरे विश्व पटल पर देख रहे हैं । प्रतिदिन टीवी, समाचार पत्र, न्यूज़ पोर्टल आदि सभी सूचना माध्यमों पर कोरोनावायरस के बढ़ते हुए खतरे से हमें आगाह किया जाता है और उससे बचने के लिए मास्क पहने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की सलाह भी दी जाती है। इस तरह की ढिठाई, लापरवाही और नासमझी जानलेवा साबित हो सकती है स्वयं के लिए, परिवार के लिए भी .... और ख़ास तौर पर बच्चों के लिए तो यह बहुत बड़ा खतरा है। क्योंकि बच्चे वही करते हैं, वही सीखते हैं, जो वे अपने बड़ों को करता हुआ देखते हैं।
  इसलिए ज़रूरी है कि हम स्वयं उदाहरण बनें और बच्चों के सामने उसे पेश करें । यदि हम कोरोना संक्रमण की गंभीरता को समझते हुए उससे बचने के लिए मास्क पहनेंगे, सेनेटाइजर का उपयोग करेंगे और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करेंगे तो हमारी इस सावधानी को देखकर बच्चे भी उसका अनुसरण करेंगे और  तब हमें उन्हें समझाना नहीं पड़ेगा और न ही डांटना- फटकारना पड़ेगा। वे स्वयं नियमों का पालन करते हुए स्वयं की सुरक्षा करेंगे, घर परिवार की सुरक्षा करेंगे, समाज और देश की सुरक्षा करेंगे और कोरोनावायरस संक्रमण से बचे रहेंगे।
इतना ही नहीं अक्सर समाचारों में इस तरह की तस्वीरें भी प्रकाशित होती हैं जिसमें समाज के जिम्मेदार व्यक्ति बैठकें करते हैं और उनके द्वारा कोरोना संक्रमण से सुरक्षा के नियमों की अनदेखी की जाती है। वे न तो मास्क लगाते हैं और न ही सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हैं । ऐसे जिम्मेदार व्यक्तियों को भी यह समझना चाहिए कि वे लोगों के लिए यदि एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे तो लोग उनका अनुसरण करेंगे। उन्हें चाहिए कि वे स्वयं उन नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करें जिन नियमों का पालन करने की अपेक्षा वह दूसरों से करते हैं।
  तो लॉकडाउन के 4 चरणों के बाद  अब इस अनलॉक के समय में हमें यह नहीं समझना चाहिए कि कोरोना का खतरा टल गया है बल्कि सतर्क रहना चाहिए क्योंकि सतर्कता ही सुरक्षा की चाबी है।
और अंत में मेरा यह दोहा ...
बिना मास्क मत जाइए, घर से बाहर आप।
छोटी सी इक चूक से, मिले बड़ा संताप।।
                 ----------------   



कृपया इसे सुनने, देखने हेतुयूट्यूब पर इस लिंक पर जाएं....
https://youtu.be/yRs-7vXudNk

#PostForAwareness #विचारवर्षा
#युवाप्रवर्तक #कोरोनाकाल #मास्क #लॉकडाउन #अनलॉक1 #सम्हलिए #संकट #सतर्कता #वर्षासिंह_का_कॉलम #सुरक्षा #कोरोना

Wednesday, June 10, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 2 | मन तेरा मंदिर | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठको, "विचार वर्षा"...   मेरे इस कॉलम में आज पढ़िए "मन तेरा मंदिर" 🙏 अपने विचारों से अवगत कराएं और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक 10.06.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-
http://yuvapravartak.com/?p=34613

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

मन तेरा मंदिर

            - डॉ. वर्षा सिंह

मेरी एक  महिला मित्र की माता जी मोबाईल पर चर्चा के दौरान अपनी नाराज़गी प्रकट करते हुए मुझसे बोलीं कि 'कोरोना से बचाव के लिए किए गए लॉकडाउन में बाज़ार, स्कूल-कॉलेज, शादी समारोह बंद कर दिए थे, वो तो ठीक है लेकिन भगवान के मंदिर बंद नहीं करने चाहिए थे। यह भी नहीं सोचा कि भगवान और मंदिर को बंद कर दिया तो भक्तों की रक्षा कौन करेगा ? उनकी यह बात सुन कर मैंने उनसे कहा कि चाची जी, भगवान सिर्फ़ मंदिर में नहीं वे तो हमारे मन में मौज़ूद हैं, प्रकृति के कण-कण में मौजूद हैं। लेकिन चाची जी अपनी बात पर अड़ी रहीं। वे कुछ भी सुनने के मूड में नहीं थी। उनकी आस्था का केंद्र सिर्फ मंदिर और उसमें स्थित भगवान की प्रतिमा है।

चाची जी की भांति ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो कर्मकांडी पूजन को ही भगवान की सच्ची आराधना मानते हैं। जबकि भारतीय संस्कृति में ईश्वर की आराधना साकार और निराकार दोनों रूपों में की जाती है। साकार यानी मूर्ति स्थापित कर मंदिर में पूजा और निराकार यानी मन में ईश्वर का स्मरण, ध्यान और आराधना।

सन् 1935 की नितिन बोस द्वारा निर्देशित हिन्दी फ़िल्म "धूप छाँव" जिसमें निर्देशक नितिन बोस द्वारा हिन्दी फिल्मों में पार्श्व गायन की परंपरा आरंभ की थी, में संगीतकार रायचंद बोरल द्वारा के.सी. डे के स्वर में रिकॉर्ड किया गया एक गीत था ….

बाबा मन की आँखें खोल / मन की आँखें खोल बाबा / मतलब की सब दुनियादारी / मतलब के सब हैं संसारी / जग में तेरा हो हितकारी / तन मन का सब जोर लगाकर नाम हरि का बोल / बाबा मन की आँखें खोल…। इसी तरह 1978

में रिलीज़ फिल्म "भक्ति में शक्ति" में एक गीत था…

मन तेरा मंदिर, आखेँ दिया बाती / होठों की है थालीयाँ, बोल फुलबाती / रोम रोम जिव्हा तेरा नाम पुकारती / आरती ओ मैया आरती / ओ ज्योतावालीये माँ तेरी आरती….।

संत कबीर ने भी कहा है कि "मन न रँगाए रँगाए जोगी कपड़ा" अर्थात् गेरुआ वस्त्र धारण करने भर से योगी नहीं बना जाता, योगी बनने और ईश्वर को पाने के लिए पहले मन का मैल धोना पड़ता है। मंदिर के पट खोलने से अधिक महत्वपूर्ण है हृदय के पट खोलना।

इस कोरोनाकाल से पूर्व कितने ही धर्मपरायण व्यक्ति प्रतिदिन मंदिर जाते रहे हैं। भांति-भांति के प्रवचनकर्ताओं के सानिध्य का लाभ उठा कर धार्मिक आख्यान सुनते रहे हैं। इधर कोरोनाकाल में लॉकडाउन के दौरान दूरदर्शन पर पुनः प्रसारित रामायण, महाभारत जैसे धार्मिक सीरियल मन लगाकर देखते रहे हैं। किन्तु यदि उनसे पूछा जाए कि इन्हें देख-सुन कर आपने अपने जीवन में कौन सी शिक्षा ग्रहण की है तो वे निरुत्तरीत रह जाएंगे। सम्भवतः मंदिर जाने से ले कर प्रवचन, सीरियल आदि सारे उपक्रमों का उनके जीवन में "टाइम पास" जैसा ही स्थान है। मंदिर के पट यदि बंद रखे गए तो मानव जीवन की सुरक्षा हेतु ही। यह भी तो सोचिए कि यदि मानव ही नहीं रहे तो मंदिर में स्थापित ईश्वर की प्रतिमा का पूजन कौन करेगा। भगवान और भक्त अलग नहीं हैं एक दूसरे से। साकार रूप की आराधना संभव नहीं हो पाए तो निराकार रूप की आराधना करने में भला संकोच क्यों ? क्या हमारी आस्था सिर्फ़ पत्थरों, रेत-गारे से बने मंदिर तक ही सीमित है ?

नहीं… ईश्वर हमारे हृदय में, हमारे मन में स्थापित हैं और उनकी ऊर्जा हमारी चेतना में समाई हुई है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि मानव कल्याण हेतु ही मंदिरों को लॉकडाउन में बंद रखा गया। यदि हम सचमुच ईश्वर को मानते हैं, आस्तिक हैं तो मंदिर के बंद-खुले दरवाजों के इर्द गिर्द रख कर अपनी भक्ति को सीमित नहीं करना चाहिए बल्कि बगैर किसी तर्क-कुतर्क के संपूर्ण मानव जाति के कल्याण को दृष्टिगत रखते हुए "सर्वजनहिताय" के पथ का अनुसरण करना चाहिए।

और अंत में मेरा एक शेर .....

मंदिर हो कि मस्जिद हो, गिरजा हो कि गुरुद्वारा,
चाहत है अगर रब की, तू दिल में बना खिड़की।

                  ---------------


कृपया यूट्यूब पर देखने के लिए इस लिंक पर जाएं...
https://youtu.be/7bfS4E55fME

#PostForAwareness #विचारवर्षा
#युवाप्रवर्तक #कोरोनाकाल #कोरोना #लॉकडाउन #अनलॉक1 #सामाजिक_समीकरण #वर्षासिंह_का_कॉलम

Wednesday, June 3, 2020

बुधवारीय स्तम्भ | विचार वर्षा 1 | कोरोनाकाल और सामाजिक समीकरण | डॉ वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय पाठकों, मैंने अपने इस ब्लॉग को नाम दिया है ....."विचार वर्षा"... इसी नाम से मेरा नया कॉलम वेब पोर्टल 'युवा प्रवर्तक' में आज से आरंभ हुआ है। प्रति बुधवार को प्रकाशित होने वाले मेरे इस कॉलम का पहला लेख आपके सामने प्रस्तुत है कृपया पढ़ें 🙏 अपने विचार से अवगत कराएं और शेयर करें 🙏
हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक 🙏🌹🙏
दिनांक : 03.06.2020

मित्रों, आप मेरे इस कॉलम को इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं-
http://yuvapravartak.com/?p=34164

बुधवारीय स्तम्भ :

विचार वर्षा

कोरोनाकाल और सामाजिक समीकरण

- डॉ वर्षा सिंह

         यह कोरोना काल एक ऐसा समय है जब हमें अपनी जिंदगी के बारे में नए सिरे से सोचना होगा। देखा जाए तो यह मानव जीवन और सभ्यता का टर्निंग प्वाइंट है, जब कुछ नवीन मूल्यों को छोड़कर अपनी जड़ों की ओर लौटना जरूरी हो गया है। लेकिन यह लौटना लौटकर रुक जाने वाला नहीं है बल्कि यह नए रास्ते की ओर ले जाने वाला लौटना है।
         सबसे पहले बात करें सामाजिक मूल्यों की। पिछली सदी के उत्तरार्ध में सामाजिक मूल्यों में बड़ी तेजी से बदलाव आया और इस बदलाव ने जेनरेशन गैप को जन्म दिया। प्रौद्योगिक क्रांति और सूचनाओं के विस्फोट ने युवाओं को सिलिकॉन वैली पहुंचा दिया । अमूमन हर युवा के हाथ में मोबाइल टेबलेट लैपटॉप आ गया और वह आभासी दुनिया में समा था चला गया दूसरी ओर उन युवाओं के माता पिता अपनी परंपराओं को सहेजते हुए युवाओं को आभासी दुनिया में होते हुए देखते रहे। उनकी यह व्यवस्था उपजी बाजारवाद से जहां उन्होंने जाने- अनजाने अपनी संतान को बाज़ार का प्रोडक्ट बना दिया। हर माता-पिता को अपनी संतान पैकेज के रूप में दिखाई देने लगी। जब भावनाओं पर अर्थ तंत्र हावी हो जाता है तो संवेदनाओं के तार टूटने लगते हैं। यही हुआ जिसके फलस्वरूप उपजा एक शब्द "जेनरेशन गैप" यानी दो पीढ़ियों के बीच का फ़ासला।
       इस जेनरेशन गैप के लिए जिम्मेदार कौन है यह एक विवाद का विषय है ठीक वैसे ही जैसे पहले मुर्गी हुई या अंडा युवा पीढ़ी अपने माता पिता को दोषी मानती है और माता-पिता अपनी संतान को दोषी ठहराते हैं और पूरा समाज आधुनिक नजरिए को दोष देता है जबकि ध्यान से देखें तो हम पाएंगे कि बच्चे वही करते हैं जो उनके माता-पिता उन्हें करने के लिए प्रेरित करते हैं। बच्चे को पालने से उतरते ही स्कूल के हवाले कर दिया जाता है फिर कोचिंग के और फिर कैरियर प्लेसमेंट पैकेज के चक्रव्यूह में उतार दिया जाता है। यानी लगातार बच्चे मां बाप घर परिवार से दूर होते जाते हैं यदि उनके बीच कोई संबंध रह जाता है तो वह है अर्थ तंत्र का। ऐसी स्थिति में बच्चे अपने माता-पिता से तो दूर हो ही जाते हैं नाना -नानी, दादा -दादी के रिश्तो को भी सही ढंग से समझ ही नहीं पाते हैं । इस कोरोना काल में पूरा परिवार एक छत के नीचे जब एक बार फिर एकत्र हुआ तो ऐसे समय में बच्चों ने इन महत्वपूर्ण रिश्तो को समझा और महसूस किया । ठीक उसी प्रकार माता-पिता ने भी रिश्तों के महत्व को महसूस किया।
       जब पीढ़ियां साथ मिलकर रहती है तो उन्हें परस्पर एक दूसरे की भावनाओं को जानने समझने का अवसर मिलता है यदि पीढ़ियां परस्पर एक दूसरे की भावनाओं को समझने लगे तो जेनरेशन गैप जैसी कोई बात ही नहीं आएगी क्योंकि पीढ़ियों का अंतर जीवन में होने वाले परिवर्तन से ही उपजता है और परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है जो मानव जाति में होमोसेपियन्स काल से चली आ रही है। जब पहले व्यक्ति ने आग जलाना सीखा होगा, तब उसने अपने पूर्वजों को बेवकूफ ही समझा होगा। उसने सोचा होगा कि अरे मेरे पूर्वज आग जलाना भी नहीं जानते थे जबकि यह तो बहुत सरल-सी बात है? ठीक वैसे ही जैसे आज छोटे-छोटे बच्चे तक एंड्राइड मोबाइल बहुत आसानी से ऑपरेट कर लेते हैं, लेकिन जब उनके माता-पिता ऐसे मोबाइल्स के साथ दिक्कत महसूस करते हैं, तब बच्चों को लगता है कि अरे, हमारे माता-पिता तो पिछली पीढ़ी के हैं इसीलिए उनसे यह सारी चीजें ऑपरेट करते नहीं बन रही है। वे अपने माता पिता को बेवकूफ़ मानते हैं और अपने माता पिता के साथ एक उद्दंडता भरा व्यवहार करते हैं । यह जो सोच है, इसे बदलने का अवसर हमें कोरोना काल ने दिया। हर संकट कुछ न कुछ सिखा जाता है और कोरोनावायरस के  सामाजिक समीकरण ने सामाजिक ढांचे को, सामाजिक विकास की प्रक्रिया को और सामाजिक सामंजस्य को बदलने में अत्यंत प्रभावकारी भूमिका निभाई है। ज़रूरत है कि इस सीख को हम हमेशा याद रखें।
        और अंत में मेरी ये काव्यपंक्तियां ....
अहसासों की दहलीजों को, साफ करो फिर देखो,
हर पल अपने  साथ  हमेशा, नई  ख़बर  लाता है।
                           ----------------





Please see on YouTube in this Link....

#PostForAwareness #विचारवर्षा
#युवाप्रवर्तक #कोरोनाकाल #कोरोना #लॉकडाउन #अनलॉक1 #सामाजिक_समीकरण

Monday, June 1, 2020

आपदा का समय | सुख-दुख | डॉ.वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
सुख-दुख
              - डॉ.वर्षा सिंह

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।14.24।।

श्रीमद् भगवद्गीता के इस श्लोक का अर्थ है.....
जो धीर मनुष्य सुख-दुःख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है, जो मिट्टी के ढेला, पत्थर अथवा सोना प्राप्त होने पर सदैव समान व्यवहार करता है, जो प्रिय-अप्रिय स्थितियों में तथा अपनी निन्दा अथवा स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में तथा मित्र-शत्रु के पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है

इसी तरह एक और श्लोक है  वं....

उदये सविता रक्तो रक्त:श्चास्तमये तथा।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥

जिसका भावार्थ कुछ इस प्रकार है....

उदय होते समय सूर्य लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है, सत्य है महापुरुष सुख और दुःख में समान रहते हैं॥

 यदि दुख न हों तो सुख की कद्र कौन करेगा। दुख और आपदा का समय हमारे धैर्य और साहस की परीक्षा लेता है।  सेवाभावना से जनहित के कार्यों में संलग्न रह कर इस परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ जा सकता है।
                  ---------------------