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Friday, September 11, 2020

विचार की धुरी पर कविता | डॉ. वर्षा सिंह


कोई भी सर्जक तब तक सृजन नहीं कर सकता है जब तक कि उसमें भावनाओं का विपुल उद्वेग न हो। ये भावनाएं ही हैं जो परिस्थितियों, दृश्यों एवं संवेगों से प्रभावित होती हैं और सृजन के लिए प्रेरित करती हैं। मूर्तिकार मूर्तियां गढ़ता है, काष्ठकार काष्ठ की अनुपम वस्तुएं तराशता है और साहित्य सर्जक साहित्य की विभिन्न विधाओं में साहित्य रचता है। जीवन में अनेक तत्व हैं जो व्यक्ति को प्रभावित करते हैं- प्रेम, क्रोध, प्रतिकार, प्रतीक्षा, स्मृति, जन्म, मृत्यु, सहचार, आदि। ये तत्व मनुष्य के भीतर मनुष्यत्व को गढ़ते हैं। मनुष्यत्व मनुष्य के भीतर सभी संवेगों को जागृत रखता है। जिसके फलस्वरूप वह दूसरे के दुख में व्यथित होता है और दूसरे की प्रसन्नता में प्रफुल्लित हो उठता है। जीवन को एक उत्सव की तरह जीना भी मनुष्यत्व ही सिखाता है। साहित्य की श्रेष्ठता एवं गुणवत्ता इसी मनुष्यत्व पर टिकी होती है। वस्तुतः जीवन की समस्त चेष्टाएं दो भागों में बंटी होती हैं- स्वहित और परहित। इन दोनों के बीच मनुष्यत्व की एक बारीक सी रेखा होती है। जब यह रेखा मिट जाती है तो स्वहित और परहित एकाकार हो जाता है और यहीं मिलता है साहित्य का प्रस्थान बिन्दु। 
      दूसरे शब्दों में कहा जाए तो समष्टि और व्यष्टि का भेद मिट जाता है और व्यक्ति की भावनाएं सकल संसार के हित में विचरण करने लगती हैं तो एक श्रेष्ठ साहित्य का सृजन स्वयं होने लगता है। जब हम सकल संसार की बात करते हैं तो उसमें धर्म, जाति, वर्ग, लिंग, रंग के भेद मिट जाते हैं। धरती पर जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य समस्त सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं लैंगिक भिन्नताओं के बावजूद सिर्फ मनुष्य ही रहता है। इस यथार्थ को वही व्यक्ति महसूस कर सकता है जो माटी से जुड़ा हुआ हो, अपने अंतर्मन को तथा दूसरे के मन को भली-भांति समझ सकता हो। यूं तो यह गुण प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है किन्तु सुप्तावस्था में। साहित्य इस गुण को न केवल जागृत करता है वरन् परिष्किृत भी करता है। इसीलिए यह गुण पहले साहित्यकार को सृजन के लिए प्रेरित करता है, तदोपरांत पाठक को विचार और चिन्तन की अवस्था में पहुंचाता है।
काव्यकर्म साहित्य का सबसे कोमल कर्म है। इसमें भावानाओं का आवेग और संवेग हिलोरें लेता रहता है। इसीलिए साहित्य के क्षेत्र में प्रवृत्त होने वाले अधिकांश युवा साहित्यकार काव्य को अपनी अभिव्यक्ति एवं सृजन के पहले माध्यम के रूप में चुनते हैं। काव्य रस, छंद, लय और शाब्दिक प्रवाह के साथ आकार लेता है। इन सब में तारतम्य स्थापित करना ही काव्यकला है। जहां कला है वहां साधना तो होगी ही। इसीलिए काव्य के लिए भी साधना को आवश्यक माना गया है। काव्य मनोभावों की रसात्मक शाब्दिक अभिव्यक्ति है। जिस प्रकार एक चित्रकार दृष्य के अनुरूप रंगों को चुनता है और चित्र बनाता है, उसी प्रकार कवि मनोभावों के अनुरूप शब्दों को चुनता है और कविताएं रचता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘‘कविता क्या है?’’ शीर्षक निबन्ध में कविता को ‘जीवन की अनुभूति’ कहा है। वहीं जयशंकर प्रसाद ने सत्य की अनुभूति को कविता माना। जबकि पं. अम्बिकादत्त व्यास ने कहा कि ‘‘लोकोत्तरानंददाता प्रबंधः काव्यानाम् यातु’’ अर्थात् लोकोत्तर आनंद देने वाली रचना ही काव्य है। वस्तुतः काव्य का सीधा संबंध हृदय से होता है। काव्य में कही गईं बातें एक हृदय से उत्पन्न होती हैं और दूसरे हृदय को प्रभावित करती हैं। काव्य के दो पक्ष होते हैं - भाव पक्ष और कला पक्ष। अपनी हृदयगत भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कवि उसमें शब्द, शब्द-शक्ति, शब्द-गुण, छंद, अलंकार और गेयता जैसे कला तत्वों का सहारा लेता है जो कला पक्ष के रूप में काव्य को पूर्णता प्रदान करते हैं।

जब कोई व्यक्ति प्रेम में निमग्न होता है तब वह यही चाहता है कि उसका प्रिय उसके बारे में सोचे और उससे बातें करे। यदि बात न करना चाहे तो कम से कम संकेतों से ही अपने मनोभाव व्यक्त कर दे। ऐसे समय में कविता उसका सहारा बनती है।  श्रृंगार की लगभग सभी कविताओं में इसकी बानगी देखने को मिलती है।